संविधान का अनुच्छेद 142
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत एक दुर्लभ और असाधारण कदम उठाते हुए जनरेशन जेड (Gen Z) के नीट-यूजी प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी को निरस्त कर दिया।
संविधान का अनुच्छेद 142 क्या है?
- संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित किसी भी मामले में “पूर्ण न्याय” करने के लिए उसके द्वारा पारित डिक्री और आदेशों को लागू करने से संबंधित है।
- यद्यपि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त शक्तियाँ असाधारण प्रकृति की हैं, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से इनके दायरे और सीमा को परिभाषित किया है।
- प्रेम चंद गर्ग वाद (1962) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत पारित आदेश मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने चाहिए तथा वे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकते।
- अनुच्छेद 142 के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण निर्णय:
- अयोध्या वाद (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण के लिए एक न्यास गठित करने का निर्देश दिया तथा विवादित 2.77 एकड़ भूमि मंदिर के निर्माण के लिए प्रदान की।
- भोपाल गैस त्रासदी वाद (1991): सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (UCC) को त्रासदी के पीड़ितों के लिए 470 मिलियन डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया।
- राजमार्गों पर शराब बिक्री वाद (2016): सर्वोच्च न्यायालय ने शराब पीकर वाहन चलाने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया।
- चंडीगढ़ महापौर चुनाव वाद (2024): पीठासीन अधिकारी द्वारा जानबूझकर आठ मतपत्रों को अमान्य किए जाने का पता चलने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुलदीप कुमार को विजेता घोषित किया।
स्रोत: TH
ईवीएम में मतगणना हेतु मतों के समेकन की व्यवस्था(Totalisers for Vote Counting in EVMs)
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) में दर्ज मतों की गणना के लिए समेकक मशीनों को लागू करने की संभावना पर विचार करने को कहा है, ताकि मतदान केंद्र-वार मतदान के रुझान की गोपनीयता सुरक्षित रखी जा सके।
समेकक (Totalisers)
- समेकक एक इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है, जिसे परिणाम घोषित करने से पहले अनेक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में दर्ज मतों को एकत्रित करने के लिए तैयार किया गया है।
- यह लगभग 14 ईवीएम या मतदान केंद्रों की नियंत्रण इकाइयों को जोड़ सकती है तथा प्रत्येक उम्मीदवार के लिए केवल संयुक्त मत-योग प्रदर्शित करती है। इस प्रकार अलग-अलग मतदान केंद्रों के मतदान प्रतिरूप का खुलासा नहीं होता।
- इस प्रौद्योगिकी का विकास निम्नलिखित संस्थानों द्वारा किया गया है:
- भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु; तथा
- इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) क्या है?
- यह एक ऐसी मशीन है जिसका उपयोग चुनावों में डाले गए मतों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज करने और उनकी गणना करने के लिए किया जाता है।
- ईवीएम का प्रथम बार उपयोग वर्ष 1982 में केरल के परवूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 123 में से 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था।
- ईवीएम के दो प्रमुख भाग होते हैं—‘नियंत्रण इकाई’ और ‘मतदान इकाई’, जो 5 मीटर लंबी केबल से जुड़ी होती हैं।
- नियंत्रण इकाई निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त मतदान अधिकारी के पास होती है और इसे ईवीएम का मुख्य नियंत्रक माना जाता है।
- मतदान इकाई मतदान कक्ष में रखी जाती है, जहाँ मतदाता गुप्त रूप से मतदान करने के लिए प्रवेश करता है और अपनी पसंद के उम्मीदवार के नाम एवं चुनाव चिह्न के सामने दिए गए बटन को दबाता है।
- मतदान अधिकारी द्वारा ‘मतपत्र’ बटन दबाने के बाद ही मतदान इकाई सक्रिय होती है।
मतदाता सत्यापन योग्य कागजी लेखा-परीक्षा पथ (VVPAT)
- वीवीपैट एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली है, जिसे मतदान मशीनों के लिए इस प्रकार तैयार किया गया है कि मतदाता यह सुनिश्चित कर सके कि उसका मत सही उम्मीदवार के पक्ष में दर्ज हुआ है।
- इसमें उस उम्मीदवार का नाम, जिसके पक्ष में मत डाला गया है, तथा संबंधित दल या स्वतंत्र उम्मीदवार का चुनाव चिह्न अंकित होता है।
- जब कोई मत डाला जाता है, तो ईवीएम की मतदान इकाई से जुड़ी वीवीपैट मशीन मतदाता द्वारा चुने गए उम्मीदवार का विवरण दर्शाने वाली एक कागजी पर्ची मुद्रित करती है।
- यह पर्ची काँच के पीछे रहती है और सात सेकंड तक दिखाई देती है, जिससे मतदाता यह देख सकता है कि उसका मत सही ढंग से दर्ज हुआ है। इसके बाद पर्ची नीचे रखे गए डिब्बे में गिर जाती है।
- वीवीपैट मशीन की अवधारणा प्रथम बार वर्ष 2010 में सामने आई थी। हालाँकि, इसका प्रथम बार उपयोग वर्ष 2013 में नागालैंड के नोकसेन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में किया गया।
- ईवीएम से प्रिंटर और पर्ची-संग्रह डिब्बा जोड़ने की अनुमति देने के लिए निर्वाचन संचालन नियम, 1961 में वर्ष 2013 में संशोधन किया गया।
- वर्ष 2017 से चुनावों में 100% वीवीपैट का उपयोग शुरू हुआ और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव देश का प्रथम आम चुनाव बना, जिसमें 100% ईवीएम को वीवीपैट से जोड़ा गया।
स्रोत: TH
एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (iFMS)
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली ने डिजिटल पहलों की एक श्रृंखला शुरू किए जाने के साथ एक नए चरण में प्रवेश किया है। इन पहलों के माध्यम से उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला की अधिक प्रभावी और आँकड़ा-आधारित निगरानी संभव हो रही है।
iFMS के बारे में
- एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (iFMS) भारत में उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला की शुरुआत से अंत तक निगरानी और प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर का एक डिजिटल मंच है।
- इसे रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत उर्वरक विभाग के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित और तकनीकी रूप से समर्थित किया गया है।
- किसानों, भूमि और फसलों से संबंधित आँकड़ों के साथ इसके एकीकरण के माध्यम से इस प्रणाली को क्रमशः आँकड़ा-आधारित निगरानी एवं निर्णय-सहायता मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- iFMS को राज्य स्तर के किसान, भूमि और फसल संबंधी आँकड़ा-भंडारों के साथ एकीकृत किया जा रहा है। इनमें हरियाणा की मेरी फसल मेरा ब्यौरा (MFMB) तथा एग्रीस्टैक शामिल हैं।
- वाहन स्थान निगरानी प्रणाली (VLTS): यह उर्वरक प्रेषण और मार्ग में उपस्थित माल संबंधी जानकारी को वाहन के स्थान संबंधी आँकड़ों से जोड़ती है। इससे परिवहन के दौरान उर्वरक खेप की निगरानी बेहतर होती है तथा विलंब और असामान्य आवागमन के प्रतिरूपों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
- उर्वरक बिक्री रूपरेखा (FFS): यह पहल मोबाइल अनुप्रयोग आधारित उर्वरक बुकिंग प्रणाली को वर्तमान iFMS बिक्री-बिंदु (PoS) व्यवस्था से जोड़ती है।
- इलेक्ट्रॉनिक सब्सिडी प्रसंस्करण: उर्वरक सब्सिडी के प्रशासन में iFMS की केंद्रीय भूमिका है। सब्सिडी भुगतान को बिक्री-बिंदु नेटवर्क के माध्यम से दर्ज वास्तविक उर्वरक बिक्री से जोड़ा गया है।
स्रोत: PIB
भारत के चालू खाता घाटा में वृद्धि
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- भारत का चालू खाता घाटा (CAD) वित्त वर्ष 2027 की प्रथम तिमाही में बढ़कर 4.2 अरब डॉलर (सकल घरेलू उत्पाद का 0.5%) हो गया, जबकि एक वर्ष पहले यह 3.4 अरब डॉलर (सकल घरेलू उत्पाद का 0.4%) था। इसका मुख्य कारण व्यापारिक वस्तुओं के व्यापार घाटे में हुई तीव्र वृद्धि रही।
चालू खाता घाटा
- यह भुगतान संतुलन प्रणाली का एक घटक है, जो किसी देश और विश्व के अन्य देशों के बीच होने वाले सभी वित्तीय लेन-देन का लेखा-जोखा रखता है।
- यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी देश द्वारा वस्तुओं, सेवाओं और हस्तांतरणों का कुल आयात, उसके कुल निर्यात एवं बाहर किए गए हस्तांतरणों से अधिक हो जाता है।
- इसमें वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, विदेशों में किए गए निवेश से प्राप्त आय तथा एकतरफा हस्तांतरण, जैसे प्रेषण एवं अंतरराष्ट्रीय सहायता, शामिल होते हैं।
कारण
- व्यापार असंतुलन: जब कोई देश अन्य देशों से जितने उत्पादों और सेवाओं का आयात करता है, उनसे अधिक का निर्यात नहीं करता है, तो उसके व्यापार संतुलन में घाटा उत्पन्न होता है।
- निवेश का प्रवाह: पूँजी प्रवाह, जैसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और पोर्टफोलियो निवेश, आयात की माँग बढ़ाकर या घरेलू उपभोग एवं निवेश को वित्तपोषित करके चालू खाता घाटा उत्पन्न कर सकते हैं।
- विनिमय दर में उतार-चढ़ाव: मुद्रा के मूल्य में होने वाले परिवर्तन, अर्थात् मुद्रा का मूल्यह्रास या मूल्यवृद्धि, आयात और निर्यात की लागत तथा चालू खाते के संतुलन को प्रभावित करते हैं।
प्रभाव
- आर्थिक प्रभाव: निरंतर बना रहने वाला चालू खाता घाटा किसी देश की बाह्य वित्तीय स्थिति को कमजोर कर सकता है, जिससे वह बाहरी आर्थिक आघातों और मुद्रा के मूल्यह्रास के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
- नीतिगत चुनौतियाँ: चालू खाता घाटा नीति-निर्माताओं को राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों, व्यापार नीति तथा प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार के लिए संरचनात्मक उपाय अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
- व्यावसायिक वातावरण: चालू खाता घाटा विनिमय दर, ब्याज दर, मुद्रास्फीति और व्यापार नीतियों के माध्यम से कंपनियों को प्रभावित कर सकता है, जिससे उनकी लागत, मूल्य निर्धारण एवं प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है।
स्रोत: [TH]
भारतीय वायु सेना की सर्वोच्च रैंक प्राप्त करने वाली महिला
पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
संदर्भ
- भारतीय वायु सेना (IAF) और रक्षा बलों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में, एयर वाइस मार्शल शक्ति शर्मा ने इतिहास रचते हुए एयर वाइस मार्शल (या समकक्ष) के पद पर पहुँचने वाली प्रथम महिला अधिकारी (गैर-चिकित्सा शाखा) बनने का गौरव प्राप्त किया।
परिचय
- एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नति प्राप्त कर इतिहास रचने से पहले भी शर्मा तीनों सेनाओं में से सैनिक स्कूल की कमान संभालने वाली प्रथम महिला अधिकारी थीं। उन्होंने सैनिक स्कूल, कपूरथला की प्रधानाचार्य के रूप में कार्य किया।
- किसी महिला अधिकारी द्वारा यह उपलब्धि हासिल करने के प्रमुख कारणों में से एक भारतीय वायु सेना (IAF) द्वारा वर्ष 2010 में महिला अधिकारियों को आधिकारिक रूप से स्थायी कमीशन प्रदान करना है। इसके बाद से भारतीय वायु सेना ने महिला अधिकारियों की पदोन्नति और कैरियर विकास के अवसरों को सुव्यवस्थित किया है, जिसमें विभिन्न कैरियर पाठ्यक्रमों में उनकी भागीदारी भी शामिल है।
- थल सेना और नौसेना ने वर्ष 2008 में चयनित सैन्य शाखाओं, सेवाओं और विभागों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देना शुरू किया था। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2020 में इसे कई अन्य शाखाओं तक विस्तारित किया गया।
भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना में कमीशन प्राप्त अधिकारी के पदों के कंधे पर धारण किए जाने वाले पद-चिह्न

स्रोत: PIB
भारत में चंदन की खेती के पुनर्संवर्धन के प्रयास
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; पर्यावरण
समाचार में
- भारत में चंदन (Santalum album) की खेती के पुनर्संवर्धन करने के लिए नए सिरे से प्रयास किए जा रहे हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 में इसके सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्त्व को रेखांकित किया गया है।
चंदन (Santalum album)
- यह Santalaceae कुल का एक ऊँचा सदाबहार वृक्ष है, जिसकी विशेषता अर्द्ध-परजीवी जड़ें तथा अत्यधिक सुगंधित पीताभ-भूरे रंग की अंतःकाष्ठ होती है।
- यह 12 से 15 मीटर तक ऊँचा हो सकता है और आंशिक मूल-परजीवी होता है। यह प्रजाति मुख्यतः निम्नभूमि वाले उष्णकटिबंधीय वनों एवं वन क्षेत्रों में पाई जाती है।
- यह भारत, श्रीलंका, पूर्वी इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया का मूल निवासी है।
- इसकी खेती पारंपरिक दक्षिणी राज्यों से आगे बढ़कर तेलंगाना, गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश तथा उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक फैल गई है।
- चंदन को आईयूसीएन द्वारा संकटग्रस्त श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।
- भारत परंपरागत रूप से चंदन का एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक रहा है, लेकिन चंदन के घटते भंडार एवं उत्पादन ने इसकी स्थिति को कमजोर किया है, जिसके कारण भारत आयात पर अधिक निर्भर हो गया है।
- वर्ष 2024 तक चंदन के वृक्षारोपण का क्षेत्रफल अनुमानतः 23,000–30,000 हेक्टेयर था, जिसमें प्रत्येक वर्ष लगभग 600 हेक्टेयर की वृद्धि हो रही थी। आयुष मंत्रालय लगभग 3,275 हेक्टेयर क्षेत्र में चंदन के वृक्षारोपण को समर्थन दे रहा था।
- इसकी खेती मुख्यतः चंदन का तेल प्राप्त करने के लिए की जाती है और इसका व्यापक उपयोग अगरबत्ती, इत्र तथा सौंदर्य प्रसाधनों जैसे उत्पादों में किया जाता है।
- इसके औषधीय गुणों के कारण इसका व्यापक उपयोग होता है, जिसमें रोगाणुरोधी और कवकरोधी गुण भी शामिल हैं।
स्रोत: DTE
वेकफील्ड त्वरक(Wakefield Accelerators)
पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- वेकफील्ड त्वरक अभी प्रयोगात्मक चरण में हैं और कम दूरी में अत्यंत शक्तिशाली विद्युत क्षेत्र उत्पन्न कर सकते हैं। इससे भविष्य में कण त्वरकों का आकार काफी छोटा किया जा सकता है।
परिचय
- कण त्वरक एक ऐसी मशीन है जो विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन जैसे सूक्ष्म कणों को अत्यंत उच्च गति से गतिमान करती है।
- लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) यूरोप में स्थित एक विशाल कण त्वरक है। इसकी लंबाई लगभग 27 किलोमीटर है और यह प्रोटॉन को प्रकाश की गति के लगभग बराबर गति तक त्वरित कर सकता है।
- नवीन त्वरक तकनीकें आकार में काफी छोटी हो सकती हैं। ऐसी ही एक तकनीक वेकफील्ड त्वरक है।
वेकफील्ड त्वरक
- इसमें प्लाज्मा का उपयोग किया जाता है, जो मुक्त इलेक्ट्रॉनों और धनावेशित आयनों से युक्त गैस होती है।
- एक लेजर स्पंद या कण पुंज प्लाज्मा के अंदर से गुजरता है और इलेक्ट्रॉनों को एक ओर धकेलता है। धनावेशित आयन इलेक्ट्रॉनों को वापस अपनी ओर खींचते हैं।
- इलेक्ट्रॉन आगे-पीछे गति करते हैं, जिससे विद्युत क्षेत्रों की एक गतिशील तरंग उत्पन्न होती है, जिसे वेकफील्ड कहा जाता है।
- अन्य इलेक्ट्रॉनों को इस तरंग में उपयुक्त स्थान पर प्रविष्ट कराया जाता है। ये इलेक्ट्रॉन विद्युत तरंग पर “सर्फ” करते हुए ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।

- सीमा: वेकफील्ड त्वरक अभी भी सीमित क्षमता वाले हैं। वर्तमान वेकफील्ड त्वरक इलेक्ट्रॉनों को केवल कुछ दसियों गीगा-इलेक्ट्रॉन वोल्ट (GeV) तक त्वरित कर सकते हैं, जबकि लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) इससे लगभग 1,000 गुना अधिक ऊर्जा तक पहुँच सकता है।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 02-09-2026