पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी; पर्यावरण
संदर्भ
- गूगल, मेटा, अमेज़न और माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों ने देशभर में डेटा केंद्र स्थापित करने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
- सरकार का अनुमान है कि आगामी दशक में डेटा केंद्र लगभग 200 अरब डॉलर के निवेश को आकर्षित करेंगे।
भारत में डेटा केंद्र
- भारत में डेटा केंद्रों की क्षमता वर्ष 2020 के 520 मेगावाट से लगभग तीन गुना बढ़कर वर्तमान में लगभग 1.5 गीगावाट हो गई है।
- वर्ष 2030 तक इसके 6.5 गीगावाट तक पहुँचने की संभावना है, अर्थात केवल चार वर्षों में इसमें लगभग चार गुना वृद्धि होगी।
- इन केंद्रों से विद्युत की माँग वर्ष 2024 में लगभग 13 टेरावाट-घंटे से बढ़कर वर्ष 2030 तक लगभग 57 टेरावाट-घंटे होने की संभावना है।
- केंद्रीय विद्युत मंत्रालय का अनुमान है कि केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता वर्ष 2031-32 तक 26.3 गीगावाट की अतिरिक्त विद्युत माँग उत्पन्न करेगी।
- अधिकांश डेटा केंद्र मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे वर्तमान प्रौद्योगिकी केंद्रों के आसपास केंद्रित हैं। ये वही क्षेत्र हैं जहाँ जल संसाधनों और विद्युत ग्रिड पर दबाव पहले से ही अत्यधिक है।
डेटा केंद्रों के विस्तार से संबंधित चिंताएँ
- जल की खपत: 100 मेगावाट क्षमता वाला एक डेटा केंद्र प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर जल की खपत करता है। यह लगभग 6,500 परिवारों द्वारा प्रतिदिन उपयोग किए जाने वाले जल के बराबर है।
- भारत के डेटा केंद्रों ने वर्ष 2024-25 में अनुमानतः 150 अरब लीटर जल की खपत की। वर्ष 2030 तक इसके दोगुने से अधिक होकर 358 अरब लीटर प्रतिवर्ष होने की संभावना है।
- जल-संकटग्रस्त क्षेत्र: जल की खपत इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि डेटा केंद्र भारत के सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में केंद्रित हो रहे हैं।
- राजस्थान अपने वार्षिक भूजल पुनर्भरण का 147.11% जल निकालता है, जो देश में दूसरी सबसे ऊँची दर है।
- महाराष्ट्र की कई भूजल आकलन इकाइयों को अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
वर्ष 2024 की गर्मियों में कमजोर मानसूनी पुनर्भरण के कारण हैदराबाद की सतही जल आपूर्ति में 20% की कमी आई, जिसके कारण जल बोर्ड को जलापूर्ति का राशनिंग करना पड़ा।
- भारत का विद्युत ग्रिड पहले से ही रिकॉर्ड स्तर की माँग के कारण दबाव में है। वर्ष 2026 की प्रथम तिमाही में ही भारत ने 300 गीगावाट-घंटे नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग नहीं किया, क्योंकि ग्रिड इतनी विद्युत का वहन करने में सक्षम नहीं था।
- विगत पाँच वर्षों में भारत अपने वार्षिक विद्युत पारेषण लक्ष्यों का केवल लगभग 80% ही पूरा कर पाया है।
- नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी चुनौतियाँ: सौर ऊर्जा परियोजनाओं का निर्माण उन्हें उत्पादित विद्युत के पारेषण के लिए आवश्यक विद्युत लाइनों की तुलना में अधिक तेजी से हो रहा है। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि डेटा केंद्रों को विश्वसनीय और निर्बाध विद्युत की आवश्यकता होती है।
- यदि नवीकरणीय ऊर्जा इन केंद्रों तक नहीं पहुँच पाती है, तो उनकी विद्युत की आवश्यकता कोयले से पूरी करनी पड़ेगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन का भार बढ़ेगा, जबकि भारत इसे कम करने का प्रयास कर रहा है।
- सतही तापमान में वृद्धि: एक अध्ययन में पाया गया कि डेटा केंद्र 10 किलोमीटर के दायरे में भूमि की सतह के तापमान में औसतन 2°C की वृद्धि करते हैं, जबकि अत्यधिक मामलों में यह वृद्धि 9.1°C तक पहुँच सकती है।
- अध्ययन के अनुसार, विश्वभर में लगभग 34 करोड़ लोग इन प्रभावित क्षेत्रों के अंतर रहते हैं।
- शासन संबंधी अंतराल: विभिन्न राज्यों की डेटा केंद्र नीतियाँ विद्युत शुल्क में छूट, पारेषण शुल्क में छूट, स्टाम्प शुल्क में राहत और त्वरित स्वीकृति जैसी उदार प्रोत्साहन सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
- किसी भी प्रमुख राज्य नीति में डेटा केंद्रों के संचालन से पूर्व विद्युत ग्रिड पर प्रभाव का आकलन अनिवार्य नहीं किया गया है।
आगे की राह
- सरकारों को चरणबद्ध विद्युत एवं जल उपयोग मानक लागू करने चाहिए तथा इनके लिए बाध्यकारी मानदंड निर्धारित करने चाहिए।
- राष्ट्रीय स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऊर्जा दक्षता रेटिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे खरीदार और नियामक यह तुलना कर सकें कि कोई डेटा केंद्र या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल वास्तव में कितना ऊर्जा-कुशल है।
- राष्ट्रीय सततता रूपरेखा: इसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा की प्राप्ति, जल खपत के प्रकटीकरण, विद्युत ग्रिड पर प्रभाव के आकलन और तापीय भार के मूल्यांकन के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।
- इससे निवेशकों के लिए अपेक्षाओं का एक समान ढाँचा और उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा का एक समान आधार तैयार होगा।
- यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि पर्यावरणीय सीमाएँ आर्थिक सीमाएँ भी होती हैं और उनकी अनदेखी करने से भविष्य में कहीं अधिक बड़ी लागत उत्पन्न होती है।
निष्कर्ष
- विश्वभर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को तीव्रता से अपनाया जाना ऊर्जा क्षेत्र और पर्यावरण, दोनों में व्यापक परिवर्तन लाने वाला है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित डेटा केंद्रों से विद्युत और जल की माँग में कई गुना वृद्धि होने की संभावना है, जिससे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, संसाधनों पर बढ़ता दबाव और ई-कचरे जैसी चिंताएँ उत्पन्न हो रही हैं।
- साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण और जलवायु अनुकूलन को सक्षम बनाकर प्रभावी समाधान भी प्रदान कर सकती है।
- आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करने में है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ऊर्जा-गहन विस्तार को स्वच्छ और सतत ऊर्जा स्रोतों से संचालित किया जाए तथा इसकी क्षमता का उपयोग अधिक हरित एवं जलवायु-लचीले भविष्य के निर्माण के लिए किया जाए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 02-09-2026