पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण; अपशिष्ट प्रबंधन
संदर्भ
- ‘शहरी खनन’ अर्थात त्यागे गए उत्पादों से धातुओं की पुनर्प्राप्ति की अवधारणा भारत की संसाधन सुरक्षा और चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है।
ई-अपशिष्ट के बारे में
- ई-अपशिष्ट त्यागे गए विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा उनके घटकों को कहा जाता है।
- इसमें तांबा, एल्युमिनियम, सोना, चाँदी और पैलेडियम जैसी मूल्यवान सामग्रियों के साथ-साथ सीसा, पारा तथा कुछ स्थायी रसायनों जैसे हानिकारक पदार्थ भी पाए जाते हैं।
- इस प्रकार, ई-अपशिष्ट की दोहरी प्रकृति है:
- शहरी खदान: यह मूल्यवान और महत्वपूर्ण सामग्रियों का एक सघन द्वितीयक स्रोत है।
- खतरनाक अपशिष्ट: असुरक्षित तरीके से विखंडन और प्रसंस्करण करने पर यह मृदा, वायु और जल को प्रदूषित कर सकता है तथा श्रमिकों को विषैले पदार्थों के संपर्क में ला सकता है।
वर्तमान स्थिति: वैश्विक एवं भारत
- वैश्विक स्तर पर ई-अपशिष्ट का उत्पादन औपचारिक पुनर्चक्रण क्षमता की तुलना में अधिक तीव्रता से बढ़ रहा है।
- वैश्विक ई-अपशिष्ट निगरानी रिपोर्ट, 2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में विश्वभर में 6.2 करोड़ टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न हुआ, जिसमें से केवल लगभग 22.3 प्रतिशत को औपचारिक रूप से एकत्रित और पुनर्चक्रित किया गया।
- चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत विश्व में ई-अपशिष्ट का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- भारत में वित्त वर्ष 2023-24 में 62 लाख टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न हुआ, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर 1.4 करोड़ टन से अधिक होने का अनुमान है।
- वैश्विक ई-अपशिष्ट निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ई-अपशिष्ट का उत्पादन वर्ष 2020 में लगभग 27.6 लाख टन से बढ़कर वर्ष 2024 में लगभग 61.9 लाख टन हो गया है और वर्ष 2030 तक इसके 1.4 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है।
प्रमुख चिंताएँ एवं चुनौतियाँ
- आर्थिक व्यवहार्यता: उन्नत पुनर्चक्रण के लिए संग्रहण, पृथक्करण, उन्नत पुनर्प्राप्ति तकनीक, सुरक्षित आँकड़ा-विनाश तथा पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप प्रसंस्करण की आवश्यकता होती है।
- इसलिए, अधिकतम पुनर्विक्रय मूल्य प्राप्त करने के लिए पुराने उपकरणों को सीधे बेचने की तुलना में पुनर्चक्रण अधिक महँगा प्रतीत हो सकता है।
- अनौपचारिक पुनर्चक्रण: अनौपचारिक तरीके से उपकरणों को तोड़ना और अपरिष्कृत विधियों से सामग्री निकालना व्यावसायिक तथा पर्यावरणीय जोखिम उत्पन्न कर सकता है और साथ ही सामग्री की पुनर्प्राप्ति की दक्षता को भी कम करता है।
- रणनीतिक संसाधनों की हानि: त्यागे गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से धातुओं की पुनर्प्राप्ति न कर पाने से आयातित खनिजों पर भारत की निर्भरता बढ़ती है और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के प्रति देश की संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
- आँकड़ा-सुरक्षा संबंधी जोखिम: सुरक्षित रूप से आँकड़े नष्ट किए बिना पुराने उपकरणों का पुनः उपयोग या पुनर्विक्रय गंभीर साइबर सुरक्षा और निजता संबंधी जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
- जीवन-चक्र मूल्यांकन का अभाव: न्यूनतम मूल्य पर खरीद की प्रक्रिया में प्रायः पर्यावरणीय लागत, संसाधन सुरक्षा, घरेलू औद्योगिक क्षमता और भविष्य की देनदारियों की अनदेखी की जाती है। इसे प्रत्येक लेन-देन की ‘दूसरी लेखा-पुस्तिका’ के रूप में देखा जा सकता है।
संबंधित उपाय
- वैश्विक स्तर पर:
- बेसल अभिसमय खतरनाक अपशिष्ट के सीमापार आवागमन को विनियमित करता है। भारत इसका एक पक्षकार है।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व के अंतर्गत उत्पादकों को उपभोक्ता द्वारा उपयोग किए जाने के बाद उत्पादों के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।
- कई अर्थव्यवस्थाएँ जीवन-चक्र लागत निर्धारण, चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों तथा मरम्मत के अधिकार से संबंधित व्यवस्थाओं की ओर बढ़ रही हैं।
- भारत:
- ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 ने उत्पादकों के दायित्वों तथा ई-अपशिष्ट प्रबंधन प्रमाण-पत्रों की औपचारिक व्यवस्था के माध्यम से विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ किया है।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ई-अपशिष्ट प्रबंधन को विनियमित और नियंत्रित करता है तथा अधिकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं की निगरानी करता है।
- भारत का राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन महत्वपूर्ण खनिजों की खोज, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और पुनर्प्राप्ति को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
- ‘मानक मंथन’ के अंतर्गत ‘ई-अपशिष्ट प्रबंधन—दिशानिर्देश’ विषय पर भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा जागरूकता बढ़ाने तथा हितधारकों के बीच संवाद को सुगम बनाने पर ध्यान दिया गया है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था और संसाधन दक्षता को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलें शहरी खनन को औद्योगिक नीति में एकीकृत कर सकती हैं।
आगे की राह
- न्यूनतम मूल्य पर खरीद की व्यवस्था से हटकर जीवन-चक्र एवं मूल्य-आधारित खरीद की ओर बढ़ना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय और रणनीतिक लाभों को भी शामिल किया जाए।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए तथा इसका मूल्यांकन केवल सस्ते अनुपालन प्रमाण-पत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक पुनर्प्राप्ति के परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।
- एकीकृत संग्रहण, पृथक्करण और पुनर्चक्रण अवसंरचना का विकास किया जाए तथा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को औपचारिक व्यवस्था में शामिल किया जाए।
- मरम्मत, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण को ध्यान में रखकर उत्पादों के अभिकल्पन को बढ़ावा दिया जाए तथा इसके लिए मरम्मत के अधिकार से संबंधित व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए।
- ई-अपशिष्ट से महत्वपूर्ण खनिजों और बहुमूल्य धातुओं की पुनर्प्राप्ति के लिए स्वदेशी तकनीकों का विकास किया जाए।
- त्यागे गए सूचना प्रौद्योगिकी उपकरणों के लिए मजबूत आँकड़ा-शोधन और अनुरेखण व्यवस्था अनिवार्य की जाए।
- द्वितीयक कच्चे माल की सुनिश्चित माँग सृजित करने के लिए सार्वजनिक खरीद व्यवस्था का उपयोग किया जाए।
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