पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- भारत के कृषि कार्यबल में अब महिलाओं की हिस्सेदारी काफी अधिक हो गई है, जिसका प्रमुख कारण पुरुषों का गैर-कृषि कार्यों की ओर बढ़ता पलायन है।
कृषि का नारीकरण
- यह कृषि क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और नेतृत्वकारी भूमिका को दर्शाता है।
- भारत में महिलाएँ लंबे समय से कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं, चाहे वे कृषक के रूप में कार्य करें या कृषि श्रमिक के रूप में।
वर्तमान स्थिति एवं प्रवृत्तियाँ
- कृषि देश के लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करती है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान केवल लगभग 17-18 प्रतिशत है।
- वर्तमान में भारत के कृषि श्रम में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत है। इसका प्रमुख कारण पुरुषों का बढ़ती संख्या में गैर-कृषि रोजगार की ओर स्थानांतरण है।
- इसके परिणामस्वरूप कृषि का नारीकरण हुआ है। महिलाओं पर कृषि संबंधी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं, लेकिन भूमि और संसाधनों पर उनका नियंत्रण अभी भी सीमित है।
- पूरे एशिया में भी पुरुषों के पलायन और औद्योगीकरण ने कृषि में महिलाओं के महत्त्व को बढ़ाया है। नेपाल और चीन में भी कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है, जबकि भूमि का स्वामित्व प्रायः पुरुषों के हाथों में केंद्रित रहता है।
प्रमुख कारण
- पुरुषों का पलायन: ग्रामीण निर्धनता, कृषि जोतों के घटते आकार तथा कृषि आय में अनिश्चितता के कारण परिवार के पुरुष सदस्य गैर-कृषि रोजगार की खोज में महानगरीय केंद्रों की ओर पलायन कर रहे हैं।
- इसके परिणामस्वरूप महिलाओं को पारिवारिक कृषि कार्यों के साथ-साथ घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है।
- मशीनीकरण और श्रमसाध्य कार्य: पुरुष मुख्यतः भारी कृषि मशीनों, जैसे ट्रैक्टर और फसल कटाई मशीनों, के संचालन के लिए उत्तरदायी होते हैं। वहीं महिला श्रमिकों को अभी भी खेतों में किए जाने वाले शारीरिक श्रम तथा दोहराए जाने वाले कार्यों तक सीमित रखा जाता है।
- आर्थिक विवशता: परिवार की आर्थिक कठिनाइयों के कारण महिलाएँ प्रायः घरेलू आय बढ़ाने के लिए आसपास के खेतों में दिहाड़ी कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करने लगती हैं।
लाभ
- आर्थिक सशक्तीकरण: ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ कृषि कार्य तथा स्वयं सहायता समूहों में भागीदारी के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं और घरेलू व्ययों का प्रबंधन कर सकती हैं।
- बेहतर पारिवारिक कल्याण: विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं की आय का अधिक हिस्सा बच्चों की शिक्षा, परिवार की स्वास्थ्य देखभाल और पोषण पर खर्च होने की संभावना रहती है।
- सतत कृषि: महिलाओं ने पारिस्थितिकी संबंधी पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित किया है, जो प्राकृतिक खेती, बीज संरक्षण, फसल विविधता तथा एकीकृत पशु प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
महिला किसानों के समक्ष चुनौतियाँ
- भूमि स्वामित्व अधिकारों और ऋण से संबंधित समस्याएँ: सामाजिक, सांस्कृतिक और संरचनात्मक बाधाएँ महिलाओं को भूमि के स्वामित्व संबंधी अधिकार प्राप्त करने से रोकती हैं।
- वित्तीय संस्थानों से कृषि ऋण प्राप्त करने के लिए भूमि को प्रतिभूति के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है। इसके कारण महिलाएँ प्रायः अत्यधिक ब्याज दरों पर अनौपचारिक साहूकारों से ऋण लेने के लिए विवश होती हैं।
- बाजार से जुड़ाव का अभाव: सामाजिक मान्यताएँ महिलाओं की आवाजाही को सीमित करती हैं, जिसके कारण वे कृषि उपज मंडियों (कृषि उपज बाजार समितियों) में सीधे सौदेबाजी करने या उचित बाजार मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करती हैं।
- कार्य का तिहरा भार: महिलाएँ कार्य के “तिहरे भार” से प्रभावित होती हैं—कृषि कार्य, घरेलू जिम्मेदारियाँ और बच्चों का पालन-पोषण। इसके परिणामस्वरूप उनके पास समय की कमी तथा स्वास्थ्य पर अत्यधिक दबाव उत्पन्न होता है।
- मजदूरी में असमानता: समान अवधि तक खेतों में कार्य करने के बावजूद महिला कृषि श्रमिकों की दैनिक मजदूरी प्रायः पुरुष कृषि श्रमिकों की तुलना में कम होती है।
विभिन्न पहल
- सरकार ने महिला किसानों, बागवानी, दलहन तथा प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने हेतु अनेक योजनाएँ शुरू की हैं।
- संशोधित ब्याज सहायता योजना के अंतर्गत 7 प्रतिशत ब्याज दर पर 3 लाख रुपये तक के अल्पकालिक किसान ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं।
- जनवरी 2025 से बिना प्रतिभूति वाले ऋण की सीमा बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दी गई है तथा महिलाओं की ऋण तक पहुँच बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
- एकीकृत बागवानी विकास मिशन किसानों, विशेषकर महिलाओं, को बागवानी उत्पादन तथा फसल कटाई के बाद की आधारभूत संरचना के विकास में सहायता प्रदान करता है।
- दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, जिसके लिए वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जलवायु-अनुकूल दलहन उत्पादन, भंडारण तथा सुनिश्चित खरीद को समर्थन देता है। इसमें महिला किसानों के लिए कम से कम 20 प्रतिशत वित्तीय सहायता निर्धारित की गई है।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अंतर्गत पात्र भूमिधारी किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। इसमें महिला लाभार्थियों की हिस्सेदारी कुल लाभ का 25 प्रतिशत से अधिक है, जिससे महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा में सुधार होता है।
- कृषि अवसंरचना कोष का उद्देश्य कृषि संबंधी आधारभूत संरचना को बढ़ावा देना है। यह मुख्यतः फसल कटाई के बाद की सुविधाओं, जैसे भंडारण और परिवहन व्यवस्था, पर केंद्रित है। इससे किसानों को हानि कम करने, उपज का भंडारण करने और बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
- इस पहल के अंतर्गत महिला किसानों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
- कृषि विपणन अवसंरचना योजना, जो कृषि विपणन के लिए एकीकृत योजना का हिस्सा है, ग्रामीण भंडारगृहों और गोदामों के विकास तथा उन्नयन में सहायता करती है।
- महिला किसानों, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के प्रवर्तकों, किसान उत्पादक संगठनों तथा पूर्वोत्तर और पहाड़ी क्षेत्रों के लाभार्थियों को 33.33 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है, जबकि मैदानी क्षेत्रों के किसानों को 25 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है।
- नमो ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत वर्ष 2023-24 से 2025-26 तक महिला स्वयं सहायता समूहों को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए 1,261 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
- योजना के अंतर्गत 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता, अधिकतम 8 लाख रुपये तक, तथा महिलाओं को कृषि ड्रोन सेवाएँ प्रदान करने के लिए किसान, ड्रोन संचालक और सहायक के रूप में प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न होते हैं।
- कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन के अंतर्गत साझा आधार पर कृषि यंत्र उपलब्ध कराने वाले केंद्रों के माध्यम से महिलाओं की कृषि प्रौद्योगिकी तक पहुँच सुगम बनाई जाती है। पात्र महिला किसानों को ड्रोन की खरीद के लिए 5 लाख रुपये तक की 50 प्रतिशत वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है।
- राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन प्रशिक्षण, कौशल विकास और क्षमता निर्माण के माध्यम से वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देता है। इससे महिलाओं को शहद तथा अन्य मधुमक्खी उत्पादों के माध्यम से अतिरिक्त आय और रोजगार प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
- दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन: यह योजना स्वयं सहायता समूहों, औपचारिक वित्तीय सहायता, स्वरोजगार तथा विविध कृषि-आधारित आजीविकाओं के माध्यम से महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में कार्य करती है।
निष्कर्ष
- कृषि का नारीकरण भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हो रहे एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। महिलाएँ कृषि उत्पादन की रीढ़ के रूप में तीव्रता से उभर रही हैं, लेकिन भूमि स्वामित्व, आय, संस्थागत मान्यता और निर्णय लेने की शक्ति के मामले में वे अभी भी वंचित हैं।
- चुनौती यह है कि महिलाओं को केवल कृषि श्रमिकों तक सीमित रखने के बजाय स्वतंत्र किसान, संसाधनों की स्वामी और निर्णय-निर्माता बनाया जाए। इसके लिए संयुक्त भूमि स्वामित्व, सुलभ एवं बिना प्रतिभूति वाला ऋण, लैंगिक रूप से संवेदनशील कृषि विस्तार सेवाएँ, उद्यमिता को समर्थन, महिलाओं के अनुकूल एवं श्रमभार कम करने वाली कृषि मशीनरी, सामूहिक संस्थाओं तथा सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- ऐसे उपाय कृषि के नारीकरण को केवल ग्रामीण संकट के लक्षण के रूप में देखने के बजाय इसे महिला सशक्तीकरण, समावेशी कृषि विकास, खाद्य सुरक्षा और सतत ग्रामीण विकास के अवसर में परिवर्तित कर सकते हैं।
स्रोत : DTE
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