पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- ‘उद्योग’ के अर्थ को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण ने औद्योगिक संबंध कानून के अंतर्गत आने वाली संस्थागत गतिविधियों के दायरे को सीमित किया है। इससे श्रमिक संरक्षण, वेतन वृद्धि और भारत की विनिर्माण संबंधी आकांक्षाओं को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
भारत में ‘उद्योग’ की परिभाषा के बारे में
- ‘उद्योग’ की परिभाषा यह निर्धारित करती है कि कौन-से प्रतिष्ठान और श्रमिक सामूहिक सौदेबाजी, विवाद समाधान, बर्खास्तगी से संरक्षण तथा अन्य श्रम अधिकारों के कानूनी ढाँचे के अंतर्गत आएँगे।
- इसलिए यह भारत में श्रम संबंधी न्यायशास्त्र के विकास का एक केंद्रीय तत्व रहा है।
अतीत से वर्तमान तक
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947: पूर्ववर्ती वैधानिक ढाँचे में ‘उद्योग’ की व्यापक परिभाषा दी गई थी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक बैंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (1978) मामले में इसकी व्याख्या के दायरे का पर्याप्त विस्तार किया।
- न्यायालय ने ‘त्रिस्तरीय परीक्षण’ अपनाया, जिसके अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन या वितरण के लिए नियोक्ता एवं कर्मचारियों के व्यवस्थित सहयोग से संबंधित गतिविधियों को, निर्दिष्ट अपवादों के अधीन, व्यापक रूप से ‘उद्योग’ की अवधारणा में शामिल किया गया।
- हालिया न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस विषय पर बाद में की गई विचार-विमर्श प्रक्रिया, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य भंडारण निगम/जय बीर सिंह से संबंधित मुकदमेबाजी भी शामिल है, ने पूर्ववर्ती व्यापक व्याख्या की पुनः समीक्षा की है।
- वर्तमान दृष्टिकोण का महत्त्व यह है कि संप्रभु, धर्मार्थ, सामाजिक और परोपकारी गतिविधियों को ‘उद्योग’ की आधिकारिक अवधारणा में पूर्व की तरह व्यापक रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- इससे उन संस्थागत क्षेत्रों में कमी आ सकती है जहाँ श्रमिक सामूहिक रूप से वेतन और रोजगार की शर्तों पर बातचीत कर सकते हैं।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: यह तीन प्रमुख श्रम कानूनों, अर्थात् औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 तथा औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 को समेकित करती है।
- इसमें ‘उद्योग’ की परिभाषा औद्योगिक संबंधों के लिए एक समान वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।
मुद्दे और चिंताएँ
- अधिक श्रम अनौपचारिकता का जोखिम: केवल लगभग 23.6% श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी हैं, जबकि मात्र 11% श्रमिकों के पास लिखित अनुबंध के साथ वेतनभोगी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा दोनों उपलब्ध हैं।
- अधिक संकीर्ण औद्योगिक वर्गीकरण नियोक्ताओं को ऐसी कानूनी संरचनाओं के माध्यम से गतिविधियों को पुनर्गठित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जो औद्योगिक विनियमन के दायरे से बाहर हों।
- इससे औपचारिक और अनौपचारिक रोजगार के बीच का अंतर बढ़ सकता है तथा सामूहिक सौदेबाजी और रोजगार सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
- वेतन एवं श्रम हिस्सेदारी में गिरावट: ग्रामीण क्षेत्रों में औसत मासिक आय वर्ष 2017-18 में लगभग ₹9,107 से घटकर वर्ष 2023-24 में ₹8,842 रह गई।
- ग्रामीण पुरुषों और महिलाओं दोनों की वास्तविक मजदूरी भी वर्ष 2023-24 में छह वर्ष पूर्व की तुलना में कम रही।
- श्रम की हिस्सेदारी में गिरावट से आय का हस्तांतरण श्रम से पूँजी की ओर हो सकता है।
- चूँकि सामान्यतः श्रमिकों की उपभोग करने की प्रवृत्ति अधिक होती है, इसलिए कमजोर वेतन समग्र माँग को कम कर सकता है। इससे क्षमता का कम उपयोग और निवेश में कमी आ सकती है तथा अर्थव्यवस्था में एक नकारात्मक चक्र उत्पन्न हो सकता है।
- ‘श्रम लागत लाभ’ का मिथक: श्रम संरक्षण में छूट को प्रायः इस आधार पर उचित ठहराया जाता है कि सस्ता श्रम वैश्विक उत्पादन नेटवर्क को आकर्षित करेगा।
- हालाँकि, विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता केवल मजदूरी पर निर्भर नहीं करती।
- भारत का विनिर्माण-से-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात लगभग 16–17% पर बना हुआ है, जबकि वियतनाम में यह लगभग 25% और चीन में 28% है।
- पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के उत्पादन केंद्रों को पैमाने एवं दायरे की अर्थव्यवस्थाओं का लाभ मिलता है। इनमें स्थापित आपूर्तिकर्ता नेटवर्क, परीक्षण, रसद, अभियांत्रिकी, पैकेजिंग और व्यापार-वित्त संबंधी क्षमताएँ शामिल हैं।
- अवसंरचना एवं उत्पादकता संबंधी बाधाएँ: भारत में रसद लागत अपेक्षाकृत अधिक है। विभिन्न आकलनों के अनुसार यह सकल घरेलू उत्पाद के 7.8–8.9% से लेकर 7.97% तक है, जबकि कुछ उद्योग आकलन इसे 13–14% तक बताते हैं। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय औसत लगभग 8% है।
- भारत की रसद लागत वियतनाम की तुलना में अनुमानतः 4–5 प्रतिशत अंक अधिक है। यह स्पष्ट श्रम-लागत लाभ को भी समाप्त कर सकती है।
- कमजोर प्रोत्साहन तंत्र एवं कम मजदूरी: दीर्घकालिक रोजगार के लिए कमजोर प्रोत्साहन कंपनियों को कार्यस्थल पर प्रशिक्षण, कार्य-विशिष्ट ज्ञान और संगठनात्मक क्षमताओं में निवेश करने से हतोत्साहित कर सकते हैं।
- उच्च उत्पादकता के बिना कम मजदूरी प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
- परिधान, चमड़ा, वस्त्र और जूते के वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2002 में 0.9% से बढ़कर वर्ष 2013 में 4.5% हो गई थी, लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट आई, जबकि वियतनाम एवं बांग्लादेश की हिस्सेदारी 5% से अधिक हो गई।
- यह दर्शाता है कि केवल मजदूरी को कम रखना उत्पादकता वृद्धि और औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का विकल्प नहीं हो सकता।
आगे की राह: श्रमिक संरक्षण के साथ उत्पादकता एवं औपचारिकीकरण का संयोजन
- भारत को मजदूरी में अत्यधिक कटौती की प्रतिस्पर्धा के बजाय संतुलित श्रम नीति अपनाने की आवश्यकता है।
- अनुपालन व्यवस्था को सरल बनाते हुए सामूहिक सौदेबाजी और सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- कंपनियों को कार्यस्थल पर प्रशिक्षण और कौशल विकास प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- लिखित अनुबंध, हस्तांतरणीय सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शी रोजगार अभिलेखों के माध्यम से रोजगार के औपचारिकीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- बेहतर बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे, विद्युत व्यवस्था और डिजिटल सीमा-शुल्क प्रणाली के माध्यम से रसद लागत को कम किया जाना चाहिए।
- घरेलू आपूर्तिकर्ता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किए जाने चाहिए तथा पैमाने और दायरे की अर्थव्यवस्थाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि श्रम सुधार मजदूरी को दबाने के बजाय उत्पादकता से जुड़ी वेतन वृद्धि को बढ़ावा दें।
निष्कर्ष
- भारत की विनिर्माण संबंधी चुनौती मूलतः उत्पादकता, अवसंरचना, कौशल, औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र और समग्र माँग से संबंधित है, न कि केवल श्रम लागत से।
- इसलिए श्रम कानूनों में सुधार करते समय श्रमिक गरिमा और उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मकता के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
- एक सतत औद्योगीकरण रणनीति को औपचारिक रोजगार और उत्पादकता का एक साथ विस्तार करना चाहिए, ताकि आर्थिक विकास से होने वाले लाभ उच्चतर वेतन, अधिक उपभोग एवं बढ़े हुए निवेश में परिवर्तित हो सकें।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: ‘उद्योग’ की परिभाषा की परिवर्तित न्यायिक व्याख्या का श्रम संरक्षण, औपचारिकीकरण और भारत की औद्योगीकरण रणनीति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: BL
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