पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- भारत के कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। यह परिवर्तन बढ़ती उत्पादकता, किसानों के लिए सुदृढ़ सहायता प्रणालियों तथा क्षेत्र की बढ़ती लचीलापन एवं अनुकूलन क्षमता के रूप में परिलक्षित हो रहा है।
भारत में कृषि क्षेत्र
- कृषि अब भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है और लगभग 46.1% कार्यबल को आजीविका प्रदान करती है।
- पशुधन एवं मत्स्य क्षेत्र में 5–6% की स्थिर वृद्धि बनी हुई है, जिससे ग्रामीण आय को सुदृढ़ता प्राप्त हो रही है तथा कृषि क्षेत्र में विविधीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।
- कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन (GVA) वर्ष 2025–26 में बढ़कर ₹52.08 लाख करोड़ होने का अनुमान है।
- कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के लिए बजटीय आवंटन वर्ष 2026–27 में बढ़कर ₹1,40,528.78 करोड़ हो गया है।
- कृषि निर्यात वर्ष 2024–25 में बढ़कर 51.1 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जबकि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़कर 20.4% हो गई, जो मूल्यवर्धित कृषि क्षेत्र में वृद्धि का संकेत है।

कृषि क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- जल संकट एवं सिंचाई: भारत में कृषि अत्यंत सीमा तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, जिसके कारण सूखे तथा वर्षा के अनियमित वितरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से जल-संकट वाले क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं तक पहुँच एवं जल प्रबंधन प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
- ऋण एवं वित्त तक सीमित पहुँच: छोटे एवं सीमांत किसानों को ऋण तथा अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुँच प्राप्त करने में प्रायः कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- छोटी जोत का आकार: औसत किसान के पास छोटी कृषि जोत होने के कारण भूमि का विखंडन तथा अलाभकारी कृषि पद्धतियाँ देखने को मिलती हैं। इससे किसानों के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों एवं प्रौद्योगिकियों को अपनाना कठिन हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता कम रहती है।
- पुरानी कृषि पद्धतियाँ: भारत में किसानों का एक बड़ा वर्ग अभी भी पारंपरिक एवं प्राचीन कृषि पद्धतियों का उपयोग करता है।
- बाजार की अस्थिरता एवं मूल्य उतार-चढ़ाव: पर्याप्त बाजार संपर्क, बिचौलियों तथा समय पर मूल्य संबंधी जानकारी के अभाव के कारण भारतीय किसानों को प्रायः कृषि उपज की कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
- मृदा क्षरण: रासायनिक-आधारित गहन कृषि के कारण भारत की कुल भूमि का लगभग 30% भाग किसी न किसी रूप में क्षरित हो चुका है। यूरिया एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग तथा मृदा में जैविक पदार्थों की कमी से नाइट्रोजन असंतुलन उत्पन्न हुआ है, जिससे मृदा की उर्वरता एवं पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएँ प्रभावित हुई हैं।
- बढ़ती कृषि लागत: हरित क्रांति आधारित कृषि मॉडल में घटते प्रतिफल की स्थिति उभर रही है। बढ़ती कृषि लागत से उत्पादकता में होने वाली वृद्धि पीछे छूट रही है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की ऋणग्रस्तता तथा किसान आत्महत्याओं जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आती हैं।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा तथा चरम मौसमी घटनाओं के कारण कृषि उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।

आगे की राह
- कृषि विविधीकरण: अनाज-आधारित कृषि से बागवानी, डेयरी, पशुधन, मत्स्यपालन, रेशम उत्पादन, मधुमक्खी पालन तथा कृषि-वनीकरण की ओर संक्रमण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे किसानों की आय बढ़ाने तथा कुछ चुनिंदा फसलों पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलेगी।
- सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार: जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने के लिए ड्रिप एवं स्प्रिंकलर तकनीकों के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के उपयोग को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- किसान उत्पादक संगठनों एवं सहकारिताओं का सशक्तिकरण: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों तथा स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को सशक्त बनाकर कृषि उपज के एकत्रीकरण, सौदेबाजी की क्षमता, ऋण तक पहुँच तथा बाजार संपर्क को बेहतर बनाया जा सकता है।
- खाद्य प्रसंस्करण एवं भंडारण अवसंरचना को बढ़ावा देना: फसल कटाई के बाद होने वाली क्षति को कम करने तथा उपभोक्ता द्वारा भुगतान किए गए मूल्य में किसानों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन नेटवर्क, भंडारण सुविधाओं तथा लॉजिस्टिक्स के विकास को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- कृषि-प्रौद्योगिकी एवं नवाचार को प्रोत्साहन: ऐसे स्टार्ट-अप, कृषि-प्रौद्योगिकी नवाचारों तथा डेटा-आधारित कृषि समाधानों को समर्थन दिया जाना चाहिए, जो उत्पादन, दक्षता एवं बाजार तक किसानों की पहुँच को बढ़ाने में सहायक हों।
स्रोत: PIB
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