पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- लद्दाख स्वतंत्र भारत में नियमित जनगणना के अंतर्गत जाति की गणना करने वाला प्रथम क्षेत्र बनेगा। यह गणना जनगणना 2027 के अंतर्गत की जाएगी।
परिचय
- भौगोलिक परिस्थितियों और मौसम के कारण लद्दाख तथा अन्य बर्फीले क्षेत्रों में देश के बाकी हिस्सों की तुलना में कई महीने पहले जनगणना की जा रही है।
- इन क्षेत्रों को “बर्फ से प्रभावित गैर-समकालिक क्षेत्र” के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जहाँ सामान्य फरवरी अवधि के दौरान घर-घर जाकर जनगणना करना कठिन हो जाता है।
जनगणना क्या है?
- जनगणना किसी विशिष्ट क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या से संबंधित जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक आँकड़ों के नियमित एवं व्यवस्थित संकलन को कहा जाता है।
- यह सरकारों, व्यवसायों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए सार्वजनिक सेवाओं की योजना बनाने, वित्तीय संसाधनों के आवंटन तथा सूचित निर्णय लेने जैसे विभिन्न उद्देश्यों हेतु महत्वपूर्ण आँकड़े उपलब्ध कराती है।
- संचालन: भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त द्वारा।
- जनगणना 2027: वर्ष 2011 की जनगणना तक आँकड़ों का संकलन कागजी प्रपत्रों के माध्यम से किया जाता था तथा लेआउट मानचित्रों के रेखाचित्र भी मैन्युअल रूप से तैयार किए जाते थे। बाद में इन कागजी अभिलेखों को स्कैनिंग के माध्यम से डिजिटल रूप में परिवर्तित किया जाता था। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होने के साथ-साथ असंगतियों की संभावना से भी प्रभावित थी।
- जनगणना 2027 में प्रत्येक गृह सूचीकरण ब्लॉक (HLB) के अंतर्गत डिजिटल लेआउट मानचित्र तैयार किए जाएंगे तथा सभी भवनों का जियो-टैगिंग किया जाएगा।
- जनगणना के दोनों चरणों, अर्थात् गृह सूचीकरण और जनसंख्या गणना, को 1 अप्रैल 2026 से 28 फरवरी 2027 के बीच पूरा किया जाएगा।
- दूसरे चरण में स्वतंत्र भारत में प्रथम बार जाति के आधार पर भी जनसंख्या की गणना की जाएगी।
भारत में जनगणना
- भारत में जनगणना वर्ष 1871 से नियमित रूप से आयोजित की जाती रही है। प्रथम पूर्ण जनगणना वर्ष 1881 में आयोजित की गई थी।
- संवैधानिक प्रावधान: भारत की जनगणना जनगणना अधिनियम, 1948 के प्रावधानों के अंतर्गत आयोजित की जाती है, जो भारत सरकार को समय-समय पर जनसंख्या संबंधी सर्वेक्षण कराने का अधिकार प्रदान करता है।
- आवृत्ति: भारत में जनगणना दशकीय आधार पर, अर्थात प्रत्येक दस वर्ष में, आयोजित की जाती है। सबसे हाल की जनगणना वर्ष 2011 में आयोजित की गई थी।
जाति-आधारित जनगणना
- जाति-आधारित जनगणना: इसके अंतर्गत राष्ट्रीय जनगणना के दौरान लोगों की जातीय संबद्धता के आधार पर उनकी गणना की जाती है। इस आँकड़े का उपयोग विभिन्न जाति समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने, असमानताओं की पहचान करने तथा सकारात्मक कार्रवाई से संबंधित नीतियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है।
- पृष्ठभूमि: वर्ष 2011 में सरकार ने प्रथम बार सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) कराई थी; हालांकि, इसके परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए।
- जाति संबंधी आँकड़ों में अनेक विसंगतियाँ पाई गईं, क्योंकि जनसंख्या के एक बड़े वर्ग ने अपनी जाति की पहचान अलग-अलग तरीकों से दर्ज कराई थी।
- इसी कारण जनगणना 2027 को स्वतंत्रता पश्चात नियमित जनगणना के अंतर्गत होने वाली प्रथम जाति-गणना कहा जा रहा है।
- संवैधानिक मान्यता: स्वतंत्रता के बाद संविधान ने अनुच्छेद 16(4) और 340 के माध्यम से सकारात्मक कार्रवाई को संस्थागत रूप प्रदान किया तथा कुछ समूहों की सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की स्थिति को मान्यता दी।
- हालाँकि, इन वर्गीकरणों का आधार प्रायः अनुभवजन्य आँकड़ों के बजाय “विशेषज्ञ आकलन” रहा है, जैसा कि मंडल आयोग के मामले में देखा गया।
- राष्ट्रीय स्तर पर जाति-आधारित जनगणना की बार-बार उठती माँगों के बावजूद इसे लागू नहीं किया जा सका। हालांकि, बिहार ने वर्ष 2023 में अपनी स्वतंत्र जाति-आधारित जनगणना आयोजित की।
जाति-आधारित जनगणना के अंतिम उपलब्ध आँकड़े
- वर्ष 1931 की जनगणना को व्यापक जाति-गणना के रूप में व्यापक रूप से अंतिम ऐसी जनगणना माना जाता है, जिसके निष्कर्ष स्वतंत्रता से पहले प्रकाशित किए गए थे।
- वर्ष 1947 के बाद आयोजित जनगणनाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का विवरण दर्ज करना जारी रखा गया, लेकिन अन्य जाति समूहों की गणना बंद कर दी गई।
- परिणामस्वरूप, भारत की जातीय संरचना से संबंधित किसी भी चर्चा में वर्ष 1931 के आँकड़े ही संदर्भ-बिंदु बन गए, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की जनसंख्या के अनुमान भी शामिल हैं।
जाति-आधारित जनगणना के पक्ष में तर्क
- लक्षित कल्याण के लिए सटीक आँकड़े: यह विभिन्न जाति समूहों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित सटीक आँकड़े उपलब्ध करा सकती है, जिससे सरकार हाशिए पर स्थित समुदायों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से लक्षित कर सकेगी।
- असमानताओं की पहचान: इससे शिक्षा, रोजगार और संसाधनों तक पहुँच के क्षेत्र में विद्यमान असमानताओं की पहचान करने में सहायता मिलेगी।
- सकारात्मक कार्रवाई को सुदृढ़ करना: इससे आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों को सटीक और अद्यतन आँकड़ों पर आधारित करने में सहायता मिलेगी तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकेगा।
- सामाजिक न्याय: जनगणना ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के उत्थान के लिए बेहतर नीतियों को प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा।
- नीतियों का मूल्यांकन एवं सुधार: इन आँकड़ों का उपयोग विभिन्न जाति समूहों पर विद्यमान नीतियों के प्रभाव का आकलन करने के लिए किया जा सकता है, जिससे बेहतर नीतिगत सुधार और अधिक प्रभावी शासन को बढ़ावा मिलेगा।
जाति-आधारित जनगणना के विरोध में तर्क
- जातिगत विभाजन को प्रोत्साहन : इससे जातीय पहचान अधिक सुदृढ़ हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक विभाजन गहरा सकता है और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के बजाय भेदभाव को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- विकास की अपेक्षा जाति पर अधिक ध्यान: आलोचकों का तर्क है कि जाति पर अत्यधिक ध्यान देने से गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे अधिक व्यापक मुद्दों से ध्यान हट सकता है, जो सभी समुदायों को प्रभावित करते हैं।
- गलत प्रतिनिधित्व: कुछ लोगों का मानना है कि जाति-आधारित आँकड़े सटीक नहीं हो सकते, क्योंकि जातीय पहचान की प्रकृति परिवर्तनशील होती है और लोग अपनी जाति को सार्वजनिक रूप से बताने में संकोच कर सकते हैं।
- राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जोखिम: कुछ लोगों को आशंका है कि जाति-आधारित गणना विभिन्न समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ाकर राष्ट्रीय एकीकरण को कमजोर कर सकती है, बजाय इसके कि एक समावेशी राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा मिले।
निष्कर्ष
- जाति-गणना को वर्ष 2011 में आयोजित सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) की तरह अलग से किए जाने वाले सर्वेक्षण के बजाय मुख्य जनगणना में ही शामिल किया गया है।
- व्यक्तियों द्वारा दिए गए स्वतंत्र एवं विविध जाति-संबंधी उत्तरों को सुव्यवस्थित और मानकीकृत आँकड़ों में परिवर्तित करना वर्ष 2011 की तरह ही इस प्रक्रिया की केंद्रीय चुनौती बनी हुई है।
- जनगणना 2027 स्वतंत्रता पश्चात नियमित जनगणना के अंतर्गत भारत को प्रथम आधिकारिक, राष्ट्रव्यापी जातिवार जनसंख्या गणना उपलब्ध कराएगी। यह आँकड़ा भविष्य में कल्याणकारी नीतियों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण से संबंधित बहसों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
स्रोत: TH