सारनाथ यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल

पाठ्यक्रम: जीएस-1/इतिहास एवं संस्कृति

सन्दर्भ

  • उत्तर प्रदेश स्थित भारत के प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल (अंकित) किया गया है।

परिचय

  • यह निर्णय दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र की बैठक के दौरान लिया गया।
  • विश्व धरोहर सूची में 45 स्थलों के साथ भारत, विश्व में छठे तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है।
  • इससे पहले वर्ष 2024 में महाराष्ट्र और तमिलनाडु में स्थित मराठा सैन्य परिदृश्य (Maratha Military Landscapes) को इस सूची में शामिल किया गया था।

विश्व धरोहर अभिसमय

  • यूनेस्को ने 1972 में विश्व सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण संबंधी अभिसमय (World Heritage Convention) को अपनाया, जो 1975 में प्रभावी हुआ।
  • भारत ने 1977 में इस अभिसमय का अनुमोदन (Ratification) किया।
  • अभिसमय का उद्देश्य:
    • विश्व की असाधारण सार्वभौमिक महत्ता (Outstanding Universal Value – OUV) वाली सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों की पहचान करना, उनका संरक्षण करना, उनका संवर्धन करना, उन्हें प्रस्तुत करना तथा भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना।
    • धरोहर स्थलों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सहायता को बढ़ावा देना।
  • प्रमुख विशेषताएँ: 
    • यह विश्व धरोहर स्थलों की पहचान एवं संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।

धरोहर स्थलों को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:

  • सांस्कृतिक धरोहर: स्मारक, भवनों के समूह, पुरातात्त्विक स्थल एवं सांस्कृतिक परिदृश्य।
  • प्राकृतिक धरोहर: प्राकृतिक विशेषताएँ, भूवैज्ञानिक संरचनाएँ, संकटग्रस्त प्रजातियों के आवास तथा असाधारण प्राकृतिक सौन्दर्य वाले क्षेत्र।
  • मिश्रित धरोहर: ऐसे स्थल जिनका सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक दोनों दृष्टियों से महत्त्व हो।
  • जो देश इस अभिसमय का अनुमोदन करते हैं, उन्हें राज्य पक्ष (States Parties) कहा जाता है और वे अपने क्षेत्र में स्थित धरोहर स्थलों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
  • इस अभिसमय का क्रियान्वयन विश्व धरोहर समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें यूनेस्को महासम्मेलन द्वारा निर्वाचित 21 राज्य पक्ष शामिल होते हैं।

 कार्य:

  • स्थलों को विश्व धरोहर सूची में शामिल करना।
  • संकटग्रस्त विश्व धरोहर सूची (List of World Heritage in Danger) का रख-रखाव करना।
  • सूचीबद्ध स्थलों के संरक्षण की स्थिति की निगरानी करना।
  • वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु विश्व धरोहर कोष (World Heritage Fund) का प्रबंधन करना।

विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के मानदंड:

  • किसी स्थल में असाधारण सार्वभौमिक महत्ता (OUV) होनी चाहिए।
  • उसे चयन के 10 मानदंडों में से कम-से-कम एक को पूरा करना चाहिए, जिनमें 6 सांस्कृतिक एवं 4 प्राकृतिक मानदंड हैं।
  • वह मानव की रचनात्मक प्रतिभा की उत्कृष्ट कृति का प्रतिनिधित्व करता हो।

सारनाथ का परिचय

  • स्थान: यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट स्थित है।
  • यह बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। (अन्य: लुंबिनी, बोधगया और कुशीनगर)

ऐतिहासिक महत्त्व:

  • बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश (लगभग 528 ईसा पूर्व) दिया।
  • इस घटना को धम्मचक्रप्रवर्तन (Dhammachakrapravartana) अथवा धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।
  • इसी के साथ बौद्ध संघ (भिक्षु समुदाय) की स्थापना हुई तथा आर्य अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांतों की आधारशिला रखी गई।

स्मारक एवं संरचनाएँ:

  • धमेख स्तूप: इसका निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था और यह बुद्ध के प्रथम उपदेश की स्मृति में बनाया गया।
  • चौखंडी स्तूप: यह उस स्थान को चिह्नित करता है जहाँ बुद्ध अपने प्रथम शिष्यों से मिले थे।
  • अशोक स्तंभ: इसकी स्थापना सम्राट अशोक ने कराई थी। इसका सिंह शीर्ष वर्तमान में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
  • मठ एवं अवशेष: यहाँ प्राचीन विहारों, मंदिरों तथा मूर्तियों के अवशेष विद्यमान हैं।

सम्राट अशोक का योगदान:

  • सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सारनाथ का भ्रमण किया।
  • उन्होंने यहाँ स्तूपों, मठों का निर्माण कराया तथा धर्म के प्रचार हेतु शिलालेख स्थापित किए।
  • सारनाथ का अशोक सिंह शीर्ष वर्ष 1950 में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया।

महत्त्व

  • विश्व धरोहर का दर्जा भारत की बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूप में पहचान को और सुदृढ़ करेगा तथा जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया आदि देशों के साथ भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करेगा।
  • यह मान्यता अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सेतु के रूप में भारत की बौद्ध विरासत को बढ़ावा देने के प्रयासों को और सशक्त करेगी तथा धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता को भी वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करेगी।

स्रोत: TH

 

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