शहरी सहकारी बैंक: भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लाइसेंसिंग प्रक्रिया पुनः प्रारंभ

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) वर्ष 2004 से जारी विराम के बाद शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए नए लाइसेंस जारी करने की अनुमति देने की तैयारी में है।

प्रस्ताव में क्या शामिल है?

  • न्यूनतम पूंजी आवश्यकता:आरबीआई ने नए आवेदकों के लिए ₹300 करोड़ की न्यूनतम पूंजी आवश्यकता का सुझाव दिया है, जो पहले शहरी सहकारी बैंकों के लिए निर्धारित पूंजी आवश्यकता की तुलना में काफी अधिक है।
  • पात्रता का मार्ग: बिल्कुल नए बैंक स्थापित करने की अनुमति देने के बजाय, प्राथमिकता रूपांतरण (Conversion) को दी जाएगी, जिसके अंतर्गत बड़े एवं सुचारु रूप से संचालित सहकारी ऋण समितियों को पूर्ण शहरी सहकारी बैंक (UCB) में परिवर्तित किया जाएगा।
  • वित्तीय सुदृढ़ता के मानदंड: केवल वित्तीय रूप से मजबूत संस्थाओं, जिनका शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (Net NPA) स्तर 3% से कम हो, को ही लाइसेंस दिए जाने का प्रस्ताव है।
  • सहायक पारितंत्र: इस परिवर्तन को सुगम बनाने के लिए आरबीआई ने एक अम्ब्रेला संगठन की स्थापना भी की है, जो इस क्षेत्र को पूंजी, प्रौद्योगिकी तथा साझा विशेषज्ञता के माध्यम से सहयोग प्रदान करेगा।

शहरी सहकारी बैंक (UCBs) क्या हैं?

  • शहरी सहकारी बैंक ( UCBs) सदस्य-स्वामित्व वाले तथा लोकतांत्रिक ढंग से संचालित बैंक हैं, जो शहरी एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे व्यापारियों, वेतनभोगी कर्मचारियों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को बैंकिंग सेवाएँ प्रदान करते हैं। ये उन ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं जो वाणिज्यिक बैंकों के लिए बहुत छोटे होते हैं, लेकिन साहूकारों पर निर्भर रहने के लिए अत्यधिक औपचारिक होते हैं।
  • ये सहकारिता के सिद्धांतों, अर्थात पारस्परिक सहयोग तथा “एक सदस्य, एक मत” के आधार पर कार्य करते हैं।

द्वैध नियंत्रण (Dual Control):

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI): बैंकिंग संबंधी विनियमन एवं पर्यवेक्षण।
  • राज्य के सहकारी समितियों के निबंधक (Registrar of Cooperatives): सदस्यता, चुनाव तथा सहकारी प्रबंधन से संबंधित विषय।

महत्त्व

  • वित्तीय समावेशन: शहरी सहकारी बैंक (UCBs) पारंपरिक रूप से छोटे व्यापारियों, स्व-रोज़गार वाले व्यक्तियों तथा परिवारों के लिए बैंकिंग सेवाओं का पहला माध्यम रहे हैं, जिन्हें वाणिज्यिक बैंक प्रायः पर्याप्त प्राथमिकता नहीं देते। इसलिए इनका सुविचारित विस्तार वित्तीय समावेशन को सार्थक रूप से बढ़ा सकता है।
  • क्षेत्रीय सुदृढ़ीकरण: मार्च 2025 तक सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में 1,457 बैंक थे, जिनकी कुल परिसंपत्तियाँ ₹7.38 लाख करोड़ थीं, किंतु इस क्षेत्र में परिसंपत्तियों एवं जमाओं का वितरण अत्यधिक असमान है।
  • केवल 7% शहरी सहकारी बैंकों में ₹1,000 करोड़ से अधिक की जमा राशि है, लेकिन इनके पास कुल जमाओं का 62.5% हिस्सा है। वहीं, आधे से अधिक UCBs, जिनकी प्रत्येक की जमा राशि ₹100 करोड़ से कम है, कुल जमाओं में केवल 5.6% का योगदान देते हैं।
  • विनियामक विश्वास: पिछले दो दशकों में स्तरीय विनियमन, सुदृढ़ पर्यवेक्षण तथा शासन सुधारों के कारण इस क्षेत्र की स्थिरता बढ़ी है, जिससे आरबीआई को लाइसेंसिंग प्रक्रिया पुनः प्रारंभ करने का विश्वास मिला है।
  • सहकारी मॉडल पर विश्वास: लाइसेंसिंग प्रक्रिया का पुनः प्रारंभ होना, अतीत की विफलताओं के बावजूद सहकारी बैंकिंग मॉडल में संस्थागत विश्वास को दर्शाता है।

चुनौतियाँ एवं चिंताएँ

  • उच्च प्रवेश बाधाएँ: उद्योग से जुड़े हितधारकों का तर्क है कि ₹300 करोड़ की न्यूनतम पूंजी की शर्त अधिकांश वास्तविक सहकारी समितियों को बाहर कर देगी, जिससे वित्तीय समावेशन का उद्देश्य प्रभावित होगा।
  • द्वैध नियंत्रण व्यवस्था: UCBs को अब भी RBI तथा राज्य के सहकारी समितियों के निबंधक के बीच अधिकार-क्षेत्र के ओवरलैप का सामना करना पड़ता है, जिससे पर्यवेक्षण एवं अनुपालन जटिल हो जाता है।
  • प्रौद्योगिकी संबंधी कमी: अनेक सहकारी संस्थानों के पास आधुनिक बैंकिंग एवं नियामकीय अनुपालन के लिए आवश्यक डिजिटल अवसंरचना का अभाव है।

आगे की राह

  • सहकारिता मंत्रालय–आरबीआई समन्वय: सहकारिता मंत्रालय एवं आरबीआई के बीच एक संयुक्त ढाँचा विकसित किया जाए, जिससे वित्तीय समावेशन के उद्देश्य और विवेकपूर्ण विनियामक सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन स्थापित हो तथा क्षेत्र को परस्पर विरोधी संकेत न मिलें।
  • अम्ब्रेला संगठन को सुदृढ़ बनाना: अम्ब्रेला संगठन की भूमिका का विस्तार करते हुए उसे तरलता सहायता, प्रौद्योगिकी तथा क्षमता निर्माण में अधिक सक्षम बनाया जाए, ताकि छोटी सहकारी समितियाँ समय के साथ पात्रता मानदंडों को पूरा कर सकें।
  • जमा बीमा का विस्तार: पूर्ण आरबीआई लाइसेंस प्राप्त न होने वाली अधिक सहकारी ऋण समितियों को भी जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम (DICGC) जैसी सुरक्षा के दायरे में लाया जाए, ताकि अंतरिम अवधि में जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

स्रोत: TH

 

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