पाठ्यक्रम:जीएस-2/शासन; जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यूरिया हेतु राष्ट्रीय निवेश नीति (National Investment Policy for Urea (NIPU)-2026 को स्वीकृति प्रदान की है। इसका उद्देश्य वर्तमान खरीफ मौसम के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चिंताओं के बीच घरेलू यूरिया उत्पादन में निवेश को बढ़ावा देना है।
उर्वरक (Fertilisers)
- उर्वरक प्राकृतिक अथवा मानव-निर्मित यौगिक होते हैं, जो पौधों की स्वस्थ वृद्धि, बेहतर फसल उत्पादकता तथा मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराते हैं।
- पौधों के तीन प्रमुख पोषक तत्त्व नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) तथा पोटाश (K) हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से NPK कहा जाता है।
पोषक तत्त्वों के आधार पर उर्वरकों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जाता है:
- नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक: यूरिया, अमोनियम सल्फेट, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (CAN)
- फॉस्फेटयुक्त उर्वरक: डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP)
- पोटाशयुक्त उर्वरक: म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), सल्फेट ऑफ पोटाश (SOP)
- जटिल/संयुक्त उर्वरक: इनमें दो या अधिक प्रमुख पोषक तत्त्व होते हैं।
भारत की यूरिया नीति का विकास
राष्ट्रीय निवेश नीति, 2012
- भारत में यूरिया क्षेत्र में नए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय निवेश नीति, 2012 की घोषणा की गई। नए परियोजनाओं को सुविधाजनक बनाने हेतु इसमें 2013 तथा अक्टूबर 2014 में संशोधन किए गए।
राष्ट्रीय निवेश नीति, 2012 की उपलब्धियाँ:
- 6 नए यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए।
- इनमें से 4 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के संयुक्त उद्यम (JVCs) के माध्यम से तथा 2 निजी कंपनियों द्वारा स्थापित किए गए।
- वर्तमान में 33 यूरिया निर्माण इकाइयाँ संचालित हैं।
स्थापित/पुनर्मूल्यांकित क्षमता (RAC):
- 2014-15: 207.54 लाख मीट्रिक टन (LMT)
- 2026-27: 269.42 लाख मीट्रिक टन (LMT)
2015 का संशोधन:
- यह 25 मौजूदा गैस-आधारित संयंत्रों पर लागू किया गया।
- इससे 2014-15 के स्तर की तुलना में प्रतिवर्ष 20–25 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त उत्पादन जुड़ा।
उत्पादन क्षमता:
- 2014-15: 225 लाख मीट्रिक टन
- 2023-24: 314.07 लाख मीट्रिक टन
- 2025-26: 293.30 लाख मीट्रिक टन
उर्वरक सब्सिडी
- किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार बड़े पैमाने पर उर्वरक सब्सिडी प्रदान करती है।
कुल उर्वरक सब्सिडी:
- 2024-25: ₹1,77,162.06 करोड़
- 2025-26: ₹2,17,281.10 करोड़
- केंद्रीय बजट 2026-27: ₹1.71 लाख करोड़ का प्रावधान।
यूरिया सब्सिडी:
- 2024-25: ₹1,24,319.50 करोड़
- 2025-26: ₹1,42,175.74 करोड़
- पोषक-तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS):
- फॉस्फेटयुक्त उर्वरक: ₹74,999.99 करोड़
- पोटाशयुक्त उर्वरक: ₹52,810 करोड़
जैविक उर्वरक:
- 2024-25: ₹32.56 करोड़
- 2025-26: ₹105.37 करोड़
- सब्सिडी वाले उर्वरकों का वितरण प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली के माध्यम से पॉइंट ऑफ सेल (PoS) उपकरणों द्वारा किया जाता है, जिसमें लाभार्थियों का प्रमाणीकरण आधार, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), मतदाता पहचान-पत्र तथा अन्य स्वीकृत पहचान दस्तावेजों से किया जाता है।
यूरिया हेतु राष्ट्रीय निवेश नीति (NIPU)-2026 की प्रमुख विशेषताएँ (National Investment Policy for Urea (NIPU)-2026)
- घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा: नई गैस-आधारित यूरिया इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे आयातित यूरिया पर निर्भरता कम हो सके।
- पारदर्शी लागत संरचना: नीति में स्थिर लागत एवं परिवर्ती लागत को अलग-अलग निर्धारित किया गया है, जिससे पारदर्शिता एवं दक्षता बढ़ेगी।
- इक्विटी पर सुनिश्चित प्रतिफल (RoE): इसमें 12% (न्यूनतम) से 16% (अधिकतम) तक का व्यवहार्य प्रतिफल निर्धारित किया गया है, ताकि सार्वजनिक एवं निजी निवेश आकर्षित किया जा सके।
- विदेशी विनिमय जोखिम में कमी: चार वर्ष बाद स्थिर लागतों को प्रचलित विनिमय दर पर भारतीय रुपये में परिवर्तित किया जाएगा, जिससे निवेशकों के लिए विनिमय दर की अस्थिरता कम होगी।
उर्वरकों के संतुलित उपयोग हेतु सरकारी पहलें
एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन (INM)
- यह जैविक खाद, रासायनिक उर्वरकों एवं जैव-उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
- इससे उर्वरकों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है, दीर्घकाल में मृदा की उर्वरता बनी रहती है, पर्यावरणीय क्षरण कम होता है तथा सतत कृषि को बढ़ावा मिलता है।
नैनो यूरिया
- इसे पारंपरिक यूरिया के विकल्प के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- हालांकि, वैज्ञानिक प्रभावशीलता, खेत स्तर पर भिन्न परिणाम तथा किसानों द्वारा सीमित स्वीकृति के कारण इसका उपयोग अभी सीमित है।
सतत एवं हरित कृषि
- फोर्टिफाइड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM), तरल FOM तथा फॉस्फेट-समृद्ध जैविक खाद जैसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- इनका उपयोग वित्तीय वर्ष 2025-26 में 2024-25 की तुलना में सात गुना बढ़ गया।
चुनौतियाँ
- पश्चिम एशिया संकट, एल-नीनो से जुड़ी जलवायु परिस्थितियों के कारण उर्वरकों की बढ़ती मांग तथा रासायनिक उर्वरकों के निरंतर उपयोग ने यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
- मांग और आपूर्ति के अंतर को पूरा करने के लिए आयातित यूरिया पर निरंतर निर्भरता।
- उर्वरक सब्सिडी के कारण सरकारी राजकोष पर बढ़ता वित्तीय बोझ।
- यूरिया के अत्यधिक उपयोग से पोषक तत्त्वों का असंतुलन तथा मृदा स्वास्थ्य में गिरावट।
- जैविक एवं जैव-उर्वरकों का सीमित उपयोग।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान तथा भू-राजनीतिक जोखिम।
- उर्वरक उत्पादन में अधिक ऊर्जा दक्षता की आवश्यकता।
आगे की राह
- घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए NIPU-2026 का शीघ्र एवं प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन (INM) तथा पोषक-तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- जैविक, जैव-उर्वरकों तथा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नैनो उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड, परिशुद्ध कृषि (Precision Farming) तथा जन-जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाई जाए।
- उर्वरकों के आयात स्रोतों में विविधता लाई जाए तथा रणनीतिक भंडार विकसित किए जाएँ।
- ऊर्जा-कुशल एवं निम्न-कार्बन उर्वरक उत्पादन तकनीकों को प्रोत्साहित किया जाए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 28-07-2026