डिजिटल खतरों पर प्रतिवेदन, 2025–26

पाठ्यक्रम: GS3/ साइबर सुरक्षा

संदर्भ

  • इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने डिजिटल खतरों पर प्रतिवेदन, 2025–26 का दूसरा संस्करण जारी किया है।

प्रमुख निष्कर्ष

  • उभरते हुए खतरे: जिन खतरों को पहले उभरते हुए अथवा कभी-कभार होने वाले खतरे माना जाता था, जैसे—सामाजिक अभियांत्रिकी, अभिगम प्रमाण-पत्रों की चोरी, आपूर्ति-शृंखला से समझौता तथा क्लाउड प्रणाली का दुरुपयोग, वे अब स्थापित साइबर आक्रमण विधियाँ बन चुकी हैं।
  • डिजिटल विश्वास का दुरुपयोग: साइबर हमलावर अब सीधे कूटशब्दों (पासवर्ड) अथवा वित्तीय लेन-देन को लक्ष्य बनाने के बजाय डिजिटल विश्वास का अधिकाधिक दुरुपयोग कर रहे हैं।
    • वे बायोमेट्रिक पंजीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय-निर्माण, साझेदार अनुप्रयोगों, तत्काल भुगतान प्रणालियों, अनुप्रयोग प्रोग्रामिंग अंतरापृष्ठ तथा तृतीय-पक्ष डिजिटल पारितंत्रों में विद्यमान कमजोरियों का लाभ उठा रहे हैं।
  • डीपफेक आधारित धोखाधड़ी का औद्योगीकरण: डीपफेक आधारित धोखाधड़ी अब औद्योगिक स्तर पर पहुँच चुकी है।
    • साइबर अपराधी वास्तविक समय में वरिष्ठ अधिकारियों के डीपफेक वीडियो, प्रतिकूल वृहद भाषा मॉडल  तथा पहचान से बचने वाले बहुरूपी आक्रमणों का उपयोग कर रहे हैं।
    • सामाजिक अभियांत्रिकी तथा व्यावसायिक ई-मेल समझौता अभियानों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
    • वहीं, अभिगम प्रमाण-पत्रों की चोरी तथा सत्र अपहरण प्रणालियों में प्रारंभिक प्रवेश प्राप्त करने के प्रमुख माध्यम बन गए हैं।
  • वित्तीय संस्थानों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी असंतुलन: प्रतिवेदन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता असंतुलन को वित्तीय संस्थानों के समक्ष उपस्थित प्रमुख जोखिमों में से एक बताया गया है।
    • जिन गतिविधियों के लिए पहले विशेषज्ञ दल, पर्याप्त संसाधन तथा कई सप्ताह का समय आवश्यक होता था, उन्हें अब सीमित संसाधनों वाले साइबर हमलावर भी मशीनों की गति से निष्पादित कर सकते हैं।
  • सिफारिश: प्रतिवेदन में समय-समय पर किए जाने वाले सुरक्षा उपायों के स्थान पर निरंतर जोखिम मूल्यांकन, समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र तथा सूचनाओं के अधिक प्रभावी आदान-प्रदान को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

भारत में साइबर धोखाधड़ी

  • राष्ट्रीय साइबर अपराध प्रतिवेदन पोर्टल के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में लगभग 28 लाख साइबर धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए, जिनसे लगभग 22,931 करोड़ रुपये की वित्तीय हानि हुई।
  • डिजिटल लेन-देन में वृद्धि: डिजिटल लेन-देन की संख्या में लगभग 38 गुना वृद्धि हुई है, जबकि इनके कुल मूल्य में तीन गुने से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
    • डिजिटल भुगतान पारितंत्र का यह विस्तार एकीकृत भुगतान अंतरापृष्ठ, तात्कालिक भुगतान सेवा तथा राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण जैसी प्रणालियों द्वारा समर्थित है।
  • धोखाधड़ी की बदलती प्रकृति: वर्तमान समय में अधिकांश धोखाधड़ी के मामलों में तकनीकी प्रणालियों से सीधे समझौता करना आवश्यक नहीं रह गया है।
    • इसके स्थान पर साइबर अपराधी फर्जी कॉल सेंटर, डीपफेक आधारित प्रतिरूपण धोखाधड़ी तथा म्यूल खातों के नेटवर्क जैसी रणनीतियों का उपयोग कर रहे हैं।
    • डिजिटल भुगतानों की तात्कालिक प्रकृति जोखिम को और बढ़ा देती है, क्योंकि ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप कर धन की पुनर्प्राप्ति की संभावना सीमित हो जाती है।

साइबर अपराधों की रोकथाम हेतु भारत सरकार की पहलें

  • भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल: सीईआरटी-इन साइबर सुरक्षा घटनाओं से निपटने हेतु देश की राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है।
    • यह सक्रिय एवं प्रतिक्रियात्मक दोनों प्रकार का साइबर सुरक्षा सहयोग प्रदान करती है तथा देश की साइबर अवसंरचना की सुरक्षा एवं सुदृढ़ता सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र: यह केंद्र महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना को साइबर खतरों से सुरक्षित रखने के लिए उत्तरदायी है।
    • यह महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान एवं अधिसूचना करता है तथा संबंधित संगठनों को उनकी साइबर सुरक्षा क्षमता बढ़ाने के संबंध में परामर्श प्रदान करता है।
  • महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध साइबर अपराध की रोकथाम योजना: गृह मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को इस योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।
    • इसका उद्देश्य साइबर फॉरेंसिक-सह-प्रशिक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संचालन तथा कनिष्ठ साइबर सलाहकारों की नियुक्ति में सहायता प्रदान करना है।
  • भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र : यह केंद्र विधि प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर अपराधों से समग्र एवं समन्वित ढंग से निपटने हेतु एक संस्थागत ढाँचा एवं पारितंत्र उपलब्ध कराता है।
    • आई4सी के अंतर्गत मेवात, जामताड़ा, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम तथा गुवाहाटी सहित सात क्षेत्रों के लिए संयुक्त साइबर समन्वय दल गठित किए गए हैं।
  • राष्ट्रीय साइबर अपराध प्रतिवेदन पोर्टल: इस पोर्टल की स्थापना नागरिकों को सभी प्रकार के साइबर अपराधों की शिकायत दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई है।
    • ऑनलाइन साइबर शिकायत दर्ज कराने में सहायता हेतु टोल-फ्री हेल्पलाइन संख्या 1930 संचालित की जा रही है।
    • वित्तीय धोखाधड़ी की तत्काल सूचना देने तथा धोखेबाजों द्वारा धन की निकासी को रोकने के लिए नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी प्रतिवेदन एवं प्रबंधन प्रणाली भी प्रारंभ की गई है।
  • साइबर स्वच्छता केंद्र (बॉटनेट सफाई एवं दुष्ट सॉफ़्टवेयर विश्लेषण केंद्र): इस पहल का उद्देश्य बॉटनेट एवं दुष्ट सॉफ़्टवेयर (मैलवेयर) संक्रमणों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनकी पहचान एवं सफाई हेतु आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराना है।
    • यह नागरिकों एवं संस्थाओं को साइबर सुरक्षा संबंधी सुझाव तथा सर्वोत्तम कार्य-पद्धतियाँ भी उपलब्ध कराता है।

स्रोत: PIB

 

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