भारत–ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम आपूर्ति समझौता

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS 3/ ऊर्जा सुरक्षा

संदर्भ

  • हाल ही में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने भारत–ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग समझौता (2015) के अंतर्गत ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम के भारत को निर्यात हेतु आवश्यक ‘प्रशासनिक व्यवस्था’ को अंतिम रूप प्रदान किया है।

‘प्रशासनिक व्यवस्था’ का क्या अर्थ है?

  • प्रशासनिक व्यवस्था नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के क्रियान्वयन को प्रभावी बनाती है तथा इसके अंतिम रूप दिए जाने से निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त होती हैं—
    • ऑस्ट्रेलिया की निजी यूरेनियम खनन कंपनियाँ भारतीय संस्थाओं के साथ वाणिज्यिक अनुबंध संपन्न कर सकेंगी।
    • भारत के परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति देने वाले हालिया नीतिगत सुधारों के पश्चात भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियाँ यूरेनियम की खरीद में भाग ले सकेंगी।
    • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा उपाय समझौते के अंतर्गत यूरेनियम निर्यात की निगरानी की जाएगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आयातित यूरेनियम का उपयोग केवल IAEA के सुरक्षा उपायों के अधीन नागरिक परमाणु प्रतिष्ठानों में ही हो।
  • व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि यह उन प्रक्रियात्मक बाधाओं को समाप्त करता है, जिन्होंने पूर्व में वाणिज्यिक स्तर पर यूरेनियम व्यापार को बाधित किया था।

विकास का महत्त्व

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा: भारत की ऊर्जा आवश्यकता तीव्र गति से बढ़ रही है तथा हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने हाइड्रोकार्बन आपूर्ति की संवेदनशीलताओं को उजागर किया है।
    • परमाणु ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण विश्वसनीय आधारभूत विद्युत उपलब्ध कराता है, आयातित तेल एवं गैस पर निर्भरता को कम करता है, वैश्विक ऊर्जा आघातों के प्रति भारत की लचीलापन बढ़ाता है तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाता है।
    • भारत–ऑस्ट्रेलिया समझौता भारत के दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को सुदृढ़ करता है।
  • विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों तक पहुँच: ऑस्ट्रेलिया के पास विश्व के ज्ञात यूरेनियम भंडारों का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा है तथा वह विश्व के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों में से एक है।
    • यह भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विस्तार हेतु दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करेगा तथा आपूर्ति शृंखला के विविधीकरण में भी योगदान देगा।
  • भारत की स्वच्छ ऊर्जा पहल को गति: वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने, गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता के विस्तार तथा विश्वसनीय निम्न-कार्बन विद्युत उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा अत्यंत आवश्यक है।
    • परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की उत्कृष्ट पूरक है, क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत निरंतर उपलब्ध आधारभूत विद्युत प्रदान करने में सक्षम नहीं होते।

भारत NPT का हस्ताक्षरकर्ता न होने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया उसे यूरेनियम का निर्यात क्यों कर सकता है?

  • भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। तथापि, अनेक महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग को संभव बनाया।
    • भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (2008): इस समझौते ने भारत के परमाणु क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को समाप्त किया तथा वैश्विक परमाणु सहयोग का मार्ग प्रशस्त किया।
    • IAEA सुरक्षा उपाय समझौता: भारत ने IAEA के साथ एक समझौता किया, जिसके अंतर्गत उसके नागरिक परमाणु प्रतिष्ठान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के अधीन बने रहेंगे।
    • परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) की छूट (2008): भारत के NPT का सदस्य न होने के बावजूद NSG ने उसे असैन्य परमाणु व्यापार के लिए विशेष छूट प्रदान की।
    • इसके परिणामस्वरूप भारत ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते करने में सक्षम हुआ।
      • परमाणु अप्रसार के प्रति भारत का सुदृढ़ रिकॉर्ड तथा उत्तरदायी परमाणु आचरण ने भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विश्वास अधिक सुदृढ़ किया।

भारत–ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग का विकास

  • 2009: भारत और ऑस्ट्रेलिया ने ऊर्जा संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की, क्योंकि दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा को साझा प्राथमिकता के रूप में स्वीकार किया।
    • दोनों देशों ने परमाणु अप्रसार तथा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
  • 2014: भारत और ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
    • यह समझौता वर्ष 2015 में प्रभावी हुआ।
  • 2018 एवं उसके पश्चात: ऑस्ट्रेलिया ने सख्त निगरानी वाली व्यवस्थाओं के अंतर्गत भारत को सीमित मात्रा में यूरेनियम का निर्यात प्रारम्भ किया।
    • प्रारंभिक खेपों ने भारत की नियामक व्यवस्था के प्रति विश्वास को सुदृढ़ किया।
  • 2026: प्रशासनिक व्यवस्था को औपचारिक रूप से अंतिम रूप दिया गया, जिससे बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक यूरेनियम निर्यात का मार्ग प्रशस्त हुआ।

भारत के लिए सामरिक महत्त्व

  • ऊर्जा सुरक्षा: यह ईंधन आयात के स्रोतों में विविधता लाकर भू-राजनीतिक व्यवधानों के जोखिम को कम करता है।
  • जलवायु प्रतिबद्धताएँ: यह निम्न-कार्बन विद्युत उत्पादन की दिशा में भारत के संक्रमण को गति प्रदान करता है।
  • सामरिक साझेदारी: यह भारत–ऑस्ट्रेलिया व्यापक सामरिक साझेदारी को अधिक सुदृढ़ करता है।
  • हिंद-प्रशांत सहयोग: यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समान विचारधारा वाले लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता: यह महत्त्वपूर्ण खनिजों एवं परमाणु ईंधन के लिए सुरक्षित और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण में योगदान देता है।

भारत का परमाणु ऊर्जा दृष्टिकोण

  • परमाणु ऊर्जा विभाग परमाणु विद्युत उत्पादन के विस्तार, स्वदेशी रिएक्टरों के विकास, अंतरराष्ट्रीय असैन्य परमाणु सहयोग, दीर्घकालिक ईंधन सुरक्षा तथा विकसित होती नीतियों के अनुरूप जहाँ अनुमति हो वहाँ सार्वजनिक–निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
  • कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आपूर्ति संबंधी हालिया समझौते भारत की दीर्घकालिक ईंधन सुरक्षा को अधिक सुदृढ़ करते हैं।

निष्कर्ष

  • भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य यूरेनियम निर्यात हेतु ‘प्रशासनिक व्यवस्था’ का अंतिम रूप दिया जाना भारत के असैन्य परमाणु कार्यक्रम की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • यह भारत–ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग समझौता (2015) के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करता है, यूरेनियम के वाणिज्यिक व्यापार को सुगम बनाता है तथा IAEA के सुरक्षा उपायों का पूर्ण अनुपालन करते हुए भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
  • ऑस्ट्रेलिया के लिए यह भारत के उत्तरदायी परमाणु रिकॉर्ड में विश्वास की अभिव्यक्ति है तथा दोनों देशों के मध्य सामरिक साझेदारी को अधिक सशक्त बनाता है।

अतिरिक्त जानकारी

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)

  • इसकी स्थापना वर्ष 1957 में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंतर्गत एक स्वायत्त संगठन के रूप में की गई थी।
  • यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की विशिष्ट एजेंसी नहीं है; बल्कि यह अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद —दोनों को प्रस्तुत करती है।
  • मुख्यालय: वियना, ऑस्ट्रिया।
  • उद्देश्य: परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना तथा उसके सैन्य उद्देश्यों हेतु दुरुपयोग को रोकना।
  • यह सुरक्षा उपायों एवं निरीक्षण के माध्यम से यह सुनिश्चित करती है कि नागरिक परमाणु सामग्री का उपयोग परमाणु हथियारों के निर्माण हेतु न किया जाए।
  • भारत ने भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते (2008) के पश्चात अपने नागरिक परमाणु प्रतिष्ठानों के लिए वर्ष 2008 में IAEA के साथ भारत-विशिष्ट सुरक्षा उपाय समझौते पर हस्ताक्षर किए।

परमाणु अप्रसार संधि (NPT)

  • इस संधि को वर्ष 1968 में हस्ताक्षर हेतु खोला गया तथा यह वर्ष 1970 में प्रभावी हुई।
  • उद्देश्य:
    • परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना।
    • परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना।
    • वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना।
  • यह संधि पाँच मान्यता प्राप्त परमाणु-हथियार संपन्न राज्यों (NWS) को मान्यता प्रदान करती है, अर्थात्—
    • संयुक्त राज्य अमेरिका,
    • रूस,
    • यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन),
    • फ्रांस, तथा
    • चीन।

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(NSG)

  • यह एक स्वैच्छिक समूह है, जिसकी स्थापना वर्ष 1975 में भारत के 1974 के शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट के पश्चात की गई थी।
  • वर्तमान में NSG में 48 सहभागी सरकारें सदस्य हैं।
  • समूह के सभी निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
  • उद्देश्य: परमाणु सामग्री, उपकरणों एवं प्रौद्योगिकी के निर्यात को नियंत्रित करके यह सुनिश्चित करना कि परमाणु निर्यात का उपयोग परमाणु हथियार कार्यक्रमों को बढ़ावा देने में न हो।
  • भारत NSG का सदस्य नहीं है तथा इसकी सदस्यता प्राप्त करने के प्रयास निरंतर जारी रखे हुए है।
  • वर्ष 2008 में NSG ने भारत को एकबारगी विशेष छूट प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप NPT का सदस्य न होने के बावजूद NSG के सदस्य देशों को भारत के साथ असैन्य परमाणु व्यापार करने की अनुमति प्राप्त हुई।

स्रोत: TH

 

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