ईरान–भारत सभ्यतागत संबंध 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • ईरान सरकार ने आगामी माह में होने वाले सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को औपचारिक निमंत्रण दिया है।

भारत–ईरान संबंधों का संक्षिप्त विवरण

  • सभ्यतागत संबंध: भारत और ईरान के बीच सभ्यतागत संबंध विश्व के सबसे प्राचीन संबंधों में से एक हैं।
    • लगभग 4,000 वर्ष पूर्व सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया सभ्यताओं के मध्य फ़ारस की खाड़ी के माध्यम से व्यापारिक संबंध स्थापित थे।
    • मुगल काल में फ़ारसी भाषा सदियों तक भारतीय उपमहाद्वीप की राजभाषा (दरबारी भाषा) रही।
    • भारत की लगभग 15% मुस्लिम जनसंख्या शिया समुदाय से संबंधित है, जिसके ईरान के साथ प्रत्यक्ष धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध हैं।
    • भारत और ईरान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध वर्ष 1950 में स्थापित हुए तथा इन्हें 1950 की मैत्री संधि , 2001 की तेहरान घोषणा , 2003 की नई दिल्ली घोषणा तथा इसके पश्चात हुए विभिन्न समझौतों के माध्यम से संस्थागत स्वरूप प्रदान किया गया।
  • संपर्क : वर्ष 2015 में भारत और ईरान ने ईरान के शहीद बेहेश्ती बंदरगाह (चाबहार बंदरगाह) के संयुक्त विकास हेतु एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
    • भारत चाबहार बंदरगाह की परिकल्पना को साकार करने के लिए ईरान के साथ निकट सहयोग जारी रखे हुए है।
  • ऊर्जा साझेदारी: वर्ष 1990 से 2018 के बीच ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा अथवा तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा।
    • ईरान ने भारत को मालभाड़े में छूट, अनुकूल भुगतान शर्तें तथा विशेष रूप से डॉलर के स्थान पर रुपये में भुगतान की सुविधा प्रदान की।
  • व्यापारिक संबंध: तेल व्यापार सहित द्विपक्षीय व्यापार अपने चरम पर लगभग 17 अरब अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष तक पहुँच गया था।
    • प्रतिबंधों के कारण तेल व्यापार में कमी आने के बावजूद गैर-तेल व्यापार महत्वपूर्ण बना रहा, जो वर्ष 2022-23 में 2.33 अरब अमेरिकी डॉलर रहा तथा इसमें भारत को व्यापार अधिशेष प्राप्त हुआ।
    • द्विपक्षीय व्यापार संयुक्त आयोग, जिसकी स्थापना वर्ष 1983 में हुई थी, सहयोग की समीक्षा एवं विस्तार हेतु प्रतिवर्ष अथवा द्विवार्षिक बैठक आयोजित करता रहा।
    • दोनों देशों के बीच दोहरे कराधान से बचाव समझौता (DTAA) भी प्रभावी रहा।
  • भारत के प्रति ईरान का समर्थन: वर्ष 1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित कश्मीर संबंधी OIC प्रस्ताव का समर्थन करने से मना कर दिया, जबकि उस प्रस्ताव को कई पश्चिमी देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • पाकिस्तान की पैन-इस्लामिक कूटनीतिक पहल के विरुद्ध भारत का समर्थन करना दोनों देशों के संबंधों की रणनीतिक गंभीरता का स्पष्ट प्रमाण था।

भारत के लिए ईरान का महत्व

  • मध्य एशिया का प्रवेश द्वार: ईरान भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया तथा वहाँ से रूस और यूरोप तक पहुँचने का ऐसा स्थलीय मार्ग प्रदान करता है, जो पाकिस्तान के क्षेत्र से होकर नहीं गुजरता।
    • पाकिस्तान और मध्य एशिया के मध्य स्थित ईरान, भारत की महाद्वीपीय पहुँच का प्रमुख आधार है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: ईरान के पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार तथा सबसे बड़े कच्चे तेल भंडारों में से एक है।
    • प्रतिबंधों से पूर्व ईरान भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था, जिससे भारत के ऊर्जा आयात में विविधता सुनिश्चित होती थी।
  • चाबहार बंदरगाह: चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है तथा पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह (जिसका विकास चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे – CPEC के अंतर्गत हुआ है) से लगभग 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
    • बंदरगाह से अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीयउत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) है, जिसका दक्षिणी टर्मिनल चाबहार बंदरगाह है।

अंतरराष्ट्रीयउत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC)

  • INSTC एक 7,200 किलोमीटर लंबा बहु-माध्यमीय परिवहन नेटवर्क है, जो मुंबई को तेहरान एवं बाकू के माध्यम से मॉस्को से जोड़ता है तथा इसमें समुद्री, रेल और सड़क मार्ग सम्मिलित हैं।
  • इसकी परिकल्पना वर्ष 2000 में की गई थी तथा इस पर भारत, ईरान और रूस ने हस्ताक्षर किए थे।
  • पूर्ण रूप से संचालित होने पर यह भारत और रूस के बीच माल परिवहन का समय 40 दिनों से घटाकर लगभग 20 दिन कर देगा तथा परिवहन लागत में लगभग 30% की कमी आएगी।

  • क्षेत्रीय सुरक्षा एवं स्थिरता: पश्चिम एशिया, फ़ारस की खाड़ी तथा अफगानिस्तान की स्थिरता में ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका है।
    • ईरान के साथ सहयोग भारत को आतंकवाद, उग्रवाद, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय संघर्षों जैसी चुनौतियों से निपटने में सहायता प्रदान करता है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: ईरान के साथ सक्रिय संबंध भारत को पश्चिम एशिया में इज़राइल, ईरान तथा खाड़ी देशों सहित सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को आगे बढ़ाने में सक्षम बनाते हैं।

भारत–ईरान संबंधों में चुनौतियाँ

  • ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध: अमेरिकी प्रतिबंधों ने द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, बैंकिंग प्रणाली को प्रभावित किया तथा भारत को ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद करने के लिए बाध्य किया।
    • उदाहरण: वर्ष मई 2019 में अमेरिका की “अधिकतम दबाव”नीति के अंतर्गत छूट समाप्त होने के बाद भारत ने ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद कर दिया।
  • ऊर्जा सहयोग में गिरावट: प्रतिबंधों तथा ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण के कारण भारत द्वारा ईरान से कच्चे तेल का आयात उल्लेखनीय रूप से घट गया।
    • प्रतिबंधों से पूर्व ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता था।
  • संपर्क परियोजनाओं की धीमी प्रगति: भू-राजनीतिक एवं वित्तीय बाधाओं के कारण चाबहार बंदरगाह तथा INSTC परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अपेक्षित गति नहीं आ सकी है।
  • प्रतिस्पर्धी साझेदारियों के बीच संतुलन: इज़राइल, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते रणनीतिक संबंधों के कारण ईरान के साथ संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
    • उदाहरण: भारत I2U2 (भारत–इज़राइल–संयुक्त अरब अमीरात–संयुक्त राज्य अमेरिका) का सदस्य होने के साथ-साथ संपर्क परियोजनाओं एवं क्षेत्रीय सहयोग के लिए ईरान के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों तथा प्रवासी भारतीयों के हितों के लिए चुनौती उत्पन्न करते हैं।
  • सीमित द्विपक्षीय व्यापार: वित्तीय प्रतिबंध, लॉजिस्टिक बाधाएँ तथा भू-राजनीतिक अनिश्चितताएँ भारत–ईरान व्यापार को उसकी वास्तविक क्षमता तक पहुँचने से रोक रही हैं।

आगे की राह

  • संतुलित कूटनीति अपनाना: भारत को ईरान के साथ उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद एवं उपयुक्त राजनयिक प्रतिनिधित्व बनाए रखते हुए क्षेत्रीय संघर्षों एवं महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न संवेदनशीलताओं का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना चाहिए।
  • क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को प्रोत्साहन: भारत को पश्चिम एशिया में संवाद, तनाव-न्यूनन, नौवहन की स्वतंत्रता तथा संप्रभुता के सम्मान का समर्थन करना चाहिए, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों के हित तथा दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति सुरक्षित रह सके।
  • संपर्क परियोजनाओं में तीव्रता: भारत को चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीयउत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के विकास को शीघ्र गति प्रदान करनी चाहिए, ताकि मध्य एशिया एवं यूरेशिया तक उसकी पहुँच अधिक सुदृढ़ हो सके।

निष्कर्ष

  • सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया निमंत्रण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पश्चिम एशिया में भारत को अत्यंत संतुलित एवं विवेकपूर्ण कूटनीति अपनानी होगी। भारत को एक ओर ईरान के साथ अपने गहरे सभ्यतागत एवं रणनीतिक संबंधों को बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर इज़राइल, खाड़ी देशों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपनी निरंतर सुदृढ़ होती साझेदारियों की भी प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।

Source: IE

 

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