पाठ्यक्रम: जीएस-2/ अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
सन्दर्भ
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के प्रति तुर्किये के समर्थन के कारण भारत-तुर्किये संबंध निम्न स्तर पर पहुँच गए थे।
- एक वर्ष बाद दोनों देश कूटनीतिक संवाद और सुरक्षा सहयोग के माध्यम से अपने संबंधों को पुनः सुदृढ़ करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
पृष्ठभूमि
- कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन: वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद से तुर्किये के राष्ट्रपति ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बार-बार कश्मीर मुद्दा उठाया। तुर्किये ने पाकिस्तान के रुख का समर्थन करते हुए कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में वार्ता की वकालत की।
- पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद तुर्किये ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना करते हुए इसे “अकारण आक्रामकता” (Unprovoked Aggression) बताया।
- पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा तुर्किये निर्मित ड्रोन के उपयोग की रिपोर्टों ने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ा दिया।
कूटनीतिक एवं आर्थिक प्रभाव:
भारत ने इसके उत्तर में निम्न कदम उठाए—
- साइप्रस और ग्रीस के साथ अपने संबंधों को और सुदृढ़ किया।
- एक तुर्की कंपनी के साथ एयर इंडिया के विमान रखरखाव अनुबंध को रद्द कर दिया।
- अनेक शैक्षणिक समझौता ज्ञापनों (MoUs) को स्थगित किया तथा तुर्किये जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में 37% की कमी दर्ज की गई।
साइप्रस का मुद्दा
- पृष्ठभूमि: साइप्रस वर्ष 1960 तक ब्रिटिश उपनिवेश था, जिसके बाद उसे स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
- उसके संविधान को ग्रीक साइप्रियट (बहुसंख्यक) तथा तुर्की साइप्रियट (अल्पसंख्यक) समुदायों के बीच शक्ति-संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।
- समय के साथ शासन व्यवस्था को लेकर दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने लगा।
- ग्रीक साइप्रियट एनोसिस (Enosis) अर्थात ग्रीस के साथ विलय के पक्षधर थे, जबकि तुर्की साइप्रियट तकसीम (Taksim) अर्थात द्वीप के विभाजन की माँग कर रहे थे।
- तख्तापलट (Coup): ग्रीस समर्थित तख्तापलट के माध्यम से साइप्रस का ग्रीस में विलय कराने का प्रयास किया गया।
- इसके प्रत्युत्तर में तुर्किये ने 1960 की गारंटी संधि (Treaty of Guarantee) के अंतर्गत अपने अधिकारों का हवाला देते हुए साइप्रस पर सैन्य हस्तक्षेप किया।
- तुर्किये ने द्वीप के लगभग 37% उत्तरी भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
- वर्ष 1974 से साइप्रस, तुर्किये समर्थित उत्तरी साइप्रस और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त साइप्रस गणराज्य के बीच विभाजित है। यही विवाद ‘साइप्रस प्रश्न’ के नाम से जाना जाता है।
- वर्ष 1974 से साइप्रस वास्तविक रूप से दो भागों में विभाजित है—
- दक्षिण में साइप्रस गणराज्य, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है तथा जो वर्ष 2004 से यूरोपीय संघ का सदस्य है।
- उत्तर में उत्तरी साइप्रस का तुर्की गणराज्य (TRNC), जिसे केवल तुर्किये ही मान्यता देता है।
दोनों देशों के बीच हालिया सहभागिता
- कूटनीतिक संवाद का पुनरारम्भ: चार वर्ष के अंतराल के बाद अप्रैल 2026 में भारत और तुर्किये ने विदेश कार्यालय परामर्श (Foreign Office Consultations) पुनः प्रारम्भ किया। इसमें व्यापार एवं निवेश, पर्यटन, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, ऊर्जा सहयोग, आतंकवाद-रोधी सहयोग तथा सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
- सुरक्षा सहयोग: तुर्किये ने भगोड़े मादक पदार्थ तस्कर सलीम डोला को भारत प्रत्यर्पित करने में सहयोग किया। दोनों देश अन्य प्रत्यर्पण अनुरोधों पर भी सहयोग कर रहे हैं।
- आर्थिक यथार्थ: तुर्किये ने यह स्वीकार किया कि भारत उसका एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक भागीदार है, जिसके साथ वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार 10 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
- भारत, तुर्किये से मशीनरी, संगमरमर तथा कृषि उत्पादों का एक महत्त्वपूर्ण आयातक है।
- तुर्की कंपनियाँ भारत के अवसंरचना एवं निर्माण क्षेत्र में अवसर तलाश रही हैं।
- पर्यटन एवं निवेश संबंध भी दोनों देशों के लिए आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
तुर्किये के साथ पुनः जुड़ने में भारत की रुचि
- सामरिक भौगोलिक स्थिति: तुर्किये यूरोप, पश्चिम एशिया, कॉकसस तथा मध्य एशिया के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करता है। यह भारत की संपर्क, व्यापार एवं ऊर्जा सुरक्षा संबंधी रणनीतियों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- महत्त्वपूर्ण आर्थिक भागीदार: दोनों देशों के बीच वार्षिक व्यापार 10 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है। भारत तुर्किये को रसायन, वस्त्र, ऑटोमोबाइल, मशीनरी तथा औषधियों का निर्यात करता है।
- व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा: तुर्किये के साथ संबंध बनाए रखने से भारत को भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) तथा अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच रणनीतिक लचीलापन प्राप्त होता है।
- इस्लामी विश्व में प्रभाव: तुर्किये के साथ रचनात्मक संबंध भारत को पश्चिम एशियाई एवं इस्लामी देशों के साथ अपने संबंध और अधिक सुदृढ़ करने में सहायता करते हैं।
- तुर्किये का आश्वासन: तुर्किये ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ उसका सैन्य सहयोग पूर्व से चले आ रहे समझौतों का हिस्सा था, न कि कोई नई सहायता। साथ ही उसने यह भी कहा कि भारत के साथ उसका कोई द्विपक्षीय विवाद नहीं है।
आगे की राह
- उच्च-स्तरीय संवाद को संस्थागत स्वरूप देना: विदेश कार्यालय परामर्श, मंत्रिस्तरीय यात्राओं तथा सामरिक संवाद को नियमित बनाया जाना चाहिए ताकि गलतफहमियाँ दूर हों और आपसी विश्वास बढ़े।
- आर्थिक सहयोग का विस्तार: दोनों देशों को व्यापार, निवेश, पर्यटन, अवसंरचना सहयोग तथा उद्योग-से-उद्योग साझेदारी को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे आर्थिक संबंध राजनीतिक मतभेदों से प्रभावित न हों।
- जन-से-जन संपर्क को प्रोत्साहन: शैक्षणिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कूटनीति, पर्यटन तथा शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाकर दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों की मजबूत नींव रखी जा सकती है।
निष्कर्ष
- भारत–तुर्किये के बीच वर्तमान निकटता इस व्यावहारिक समझ को दर्शाती है कि दोनों देशों के लिए आर्थिक एवं भू-राजनीतिक हित, दीर्घकालिक दूरी बनाए रखने की लागत से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
- हालांकि, इस संबंध सुधार की स्थायित्व काफी हद तक कश्मीर एवं पाकिस्तान के प्रति तुर्किये के भविष्य के दृष्टिकोण तथा दोनों देशों की मतभेदों को सीमित रखते हुए सहयोग के क्षेत्रों का विस्तार करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
स्रोत: IE