पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- विधि व्यवसाय में आर्थिक रूप से संघर्षरत युवा अधिवक्ताओं को सहायता प्रदान करने तथा प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) को रोकने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय ने ‘युवा अधिवक्ता सहायता कोष’ के गठन का निर्देश दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी
- विधि व्यवसाय के प्रारम्भिक वर्ष प्रायः गंभीर आर्थिक कठिनाइयों से भरे होते हैं, विशेषकर प्रथम पीढ़ी के अधिवक्ताओं तथा आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के लिए।
- यदि आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे युवा अधिवक्ता बेहतर वित्तीय स्थिरता वाले अन्य व्यवसायों की ओर जाने के लिए विवश होते हैं, तो विधि व्यवसाय को “प्रतिभा पलायन” का सामना करना पड़ सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश
- युवा अधिवक्ता व्यावसायिक सहायता कोष: न्यायालय ने प्रत्येक राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश में “युवा अधिवक्ता व्यावसायिक सहायता कोष” स्थापित करने का निर्देश दिया है।
- इस कोष का संचालन संबंधित उच्च न्यायालय अथवा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा गठित किसी स्वायत्त निकाय के अधीन किया जाएगा।
- कोष के लिए वित्तीय संसाधन सफल वरिष्ठ अधिवक्ताओं तथा विधिक समुदाय के अन्य सदस्यों के स्वैच्छिक योगदान से प्राप्त किए जा सकते हैं।
- न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि न्यायालय शुल्क का एक भाग तथा न्यायिक कार्यवाहियों में लगाए गए व्यय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इस कोष में स्थानांतरित किया जाए।
- सहायता की अवधि: वित्तीय सहायता को समय के साथ क्रमिक रूप से कम किया जा सकता है तथा अधिवक्ता के सात वर्ष के अभ्यास पूर्ण होने के पश्चात इसे समाप्त किया जा सकता है।
भारत में प्रतिभा पलायन
- प्रतिभा पलायन से आशय उच्च कौशलयुक्त एवं शिक्षित व्यक्तियों के अपने देश को छोड़कर बेहतर अवसरों की खोज में किसी अन्य देश में प्रवास करने से है।
- भारत से इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) विशेषज्ञ तथा शिक्षाविद् प्रायः अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों की ओर प्रवास करते हैं।
- वर्ष 2015 से 2022 के बीच लगभग 13 लाख भारतीयों ने देश छोड़ा, जिनमें बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित पेशेवर शामिल थे।
- केवल वर्ष 2022 में 2.25 लाख भारतीयों ने अपनी नागरिकता त्याग दी, जो अब तक का सर्वाधिक दर्ज आंकड़ा है।
- प्रमुख गंतव्य: संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा तथा यूरोपीय देश कुशल भारतीय पेशेवरों के प्रमुख गंतव्य बने हुए हैं।
भारत से प्रतिभा पलायन के कारण
- आर्थिक कारक: विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम वेतन।
- अत्यधिक विशिष्ट कौशलों के लिए सीमित रोजगार अवसर।
- शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर: विश्वस्तरीय अनुसंधान अवसंरचना तक सीमित पहुँच।
- विदेशों में बेहतर प्रशिक्षण, अनुभव तथा करियर उन्नति के अवसर।
- उच्चतर डिग्रियों के लिए वैश्विक स्तर की शिक्षा को प्राथमिकता।
- जीवनशैली एवं जीवन-गुणवत्ता: बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, अवसंरचना एवं जीवन स्तर।
- वैश्विक पहचान तथा पेशेवर नेटवर्किंग के व्यापक अवसर।
- अपर्याप्त अनुसंधान वित्तपोषण एवं अवसंरचना: भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 0.64% है, जो वैश्विक औसत 1.79% से काफी कम है।
प्रमुख चिंताएँ
- कुशल मानव पूंजी की हानि: भारत सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण पर भारी निवेश करता है।
- उच्च कौशलयुक्त पेशेवरों के प्रवास से नवाचार एवं आर्थिक विकास के लिए आवश्यक प्रतिभा का नुकसान होता है।
- आर्थिक विकास की गति में कमी: कुशल पेशेवर उद्यमिता, अनुसंधान एवं तकनीकी प्रगति के प्रमुख आधार होते हैं।
- प्रतिभा पलायन घरेलू उत्पादकता को कम करता है तथा उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों एवं स्टार्ट-अप्स के विकास को धीमा करता है।
- स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्रों पर प्रभाव: बेहतर वेतन एवं कार्य परिस्थितियों के कारण चिकित्सकों, नर्सों तथा शिक्षकों का विदेशों की ओर प्रवास बढ़ रहा है।
- इससे देश में इन क्षेत्रों में मानव संसाधन की कमी उत्पन्न होती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी: प्रतिभाओं का निरंतर बहिर्गमन भारत को ज्ञान-आधारित क्षेत्रों में कम प्रतिस्पर्धी बना सकता है।
- अन्य देश भारत द्वारा मानव पूंजी पर किए गए निवेश का लाभ प्राप्त करते हैं, जबकि उसकी लागत वहन नहीं करते।
सरकारी पहलें
- प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (PMRF): वर्ष 2018 में प्रारम्भ की गई।
- शीर्ष अनुसंधान प्रतिभाओं को देश में बनाए रखने हेतु ₹70,000–80,000 मासिक फेलोशिप तथा प्रति वर्ष ₹2 लाख तक का अनुसंधान अनुदान प्रदान किया जाता है।
- चिकित्सा शिक्षा का विस्तार
- वर्ष 2013-14 में 387 मेडिकल कॉलेजों की तुलना में वर्ष 2025-26 तक उनकी संख्या बढ़कर 808 हो गई।
- स्नातक (UG) सीटों में 141% तथा स्नातकोत्तर (PG) सीटों में 144% की वृद्धि हुई।
- वज्र (VAJRA) योजना: विदेशों में कार्यरत वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों को भारतीय संस्थानों के साथ सहयोग हेतु आमंत्रित करती है।
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान (ANRF): अनुसंधान एवं विकास निवेश को बढ़ावा देने तथा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से स्थापित।
- केंद्रीय बजट 2024 में निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास हेतु ₹20,000 करोड़ का कोष निर्मित किया गया।
- राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग रूपरेखा (NIRF): विश्वविद्यालयों को अनुसंधान एवं शैक्षणिक मानकों में सुधार हेतु प्रोत्साहित करती है।
- रामानुजन फेलोशिप एवं INSPIRE फैकल्टी योजना: विदेशों में अनुभव प्राप्त कर चुके युवा भारतीय वैज्ञानिकों को भारत लौटने हेतु आकर्षित करती है।
- स्वदेश (SWADES) पहल: विदेशों से लौटने वाले कुशल भारतीय नागरिकों का डेटाबेस तैयार करने का उद्देश्य।
- लौटने वाली प्रतिभाओं के कौशलों का मानचित्रण कर भारत एवं भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियों की आवश्यकताओं से जोड़ा जाता है।
- अटल नवाचार मिशन (AIM): विद्यार्थियों, स्टार्ट-अप्स एवं उद्यमियों को सहयोग प्रदान कर जमीनी स्तर पर नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
- राष्ट्रीय क्वांटम मिशन: वर्ष 2023–31 के लिए ₹6,003.65 करोड़ आवंटित।
- वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान के माध्यम से क्वांटम प्रौद्योगिकियों के विकास को बढ़ावा देता है।
- राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM): वर्ष 2015 में प्रारम्भ।
- विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा सरकारी एजेंसियों को अत्याधुनिक सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियों से सशक्त बनाता है, जिन्हें राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (NKN) से जोड़ा गया है।
आगे की राह
- प्रतिभाओं की वापसी के लिए अनुकूल अवसर: अमेरिका जैसे देशों की वीज़ा एवं शैक्षणिक नीतियों में आए परिवर्तनों ने भारत के लिए प्रवासी भारतीय प्रतिभाओं को वापस आकर्षित करने का अवसर प्रदान किया है।
- आंध्र प्रदेश में गूगल के 15 अरब डॉलर के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हब जैसे निवेश लौटने वाली प्रतिभाओं के लिए सहयोग एवं अवसरों का संकेत देते हैं।
- शिक्षा एवं अनुसंधान में निवेश बढ़ाना: भारत शिक्षा पर अपने GDP का लगभग 3–4% व्यय करता है, जबकि वैश्विक औसत 4.9% है।
- इस व्यय को बढ़ाकर 5% करने से अंतर को कम करने में सहायता मिलेगी।
- अनुसंधान एवं विकास व्यय में वृद्धि: भारत को R&D पर व्यय को वर्तमान 0.64% से बढ़ाकर कम-से-कम GDP के 2% तक ले जाना चाहिए।
- विकसित अर्थव्यवस्थाओं की भाँति निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ाई जानी चाहिए।
- स्वतंत्रता एवं शैक्षणिक खुलापन: दीर्घकालिक प्रतिभा संरक्षण तथा नवाचार के लिए शैक्षणिक स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है।
- शोधकर्ताओं के निर्वासन तथा अकादमिक प्रतिबंध जैसी घटनाएँ संभावित वापसी करने वाली प्रतिभाओं को हतोत्साहित कर सकती हैं।
निष्कर्ष
- प्रतिभाओं को वापस लाना केवल प्रथम कदम है। भारत को ऐसा समग्र पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा जहाँ उत्कृष्ट प्रतिभाएँ फल-फूल सकें। इसके लिए सुदृढ़ संस्थागत ढाँचा, शैक्षणिक स्वायत्तता, पर्याप्त वित्तपोषण तथा नवाचार-समर्थ वातावरण सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
Source: TH
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संक्षिप्त समाचार 19-06-2026