भारत का कपास मिशन एवं चुनौतियाँ 

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन; जीएस-3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी 

सन्दर्भ

  • वर्ष 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कपास उत्पादकता मिशन (Mission for Cotton Productivity) को मंजूरी दी, जिसके लिए ₹5,659 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
  • यह मिशन 2026-27 से 2030-31 तक संचालित किया जाएगा।
  •  the Mission for Cotton Productivity with an outlay of Rs 5,659 crore, to run from 2026-27 to 2030-31. 

परिचय

  • कपास उत्पादकता मिशन का उद्देश्य कपास रेशा (Lint) की उत्पादकता को 2025-26 पर समाप्त त्रिवर्षीय अवधि (TE) में 441 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 2031 तक 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना है।
  • विशेषज्ञों का तर्क है कि जब तक अगली पीढ़ी की आनुवंशिक प्रौद्योगिकियों तथा विज्ञान-आधारित सुधारों को नहीं अपनाया जाता, तब तक भारत का कपास उत्पादकता मिशन उत्पादकता और निर्यात को पुनर्जीवित करने में कठिनाइयों का सामना कर सकता है।

भारत में बीटी कॉटन की शुरुआत 

  • वर्ष 2002 में सरकार ने आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) की स्वीकृति के बाद बीटी कपास (Bt Cotton) की वाणिज्यिक खेती को मंजूरी प्रदान की।
  • बोलवर्म (कपास की इल्ली) समूह के कीटों के प्रतिरोध हेतु cry1Ac जीन युक्त प्रथम बीटी संकर किस्मों को स्वीकृति दी गई थी।
  • वर्ष 2006 तक GEAC ने बोलगार्ड-II (Bollgard II) को स्वीकृति प्रदान कर दी, जो दो संयुक्त (Stacked) जीनों वाली दूसरी पीढ़ी की संकर किस्म थी।

बीटी कॉटन 

  • बीटी कॉटन में मृदा जीवाणु बैसिलस थुरिन्जिएन्सिस (Bt) से प्राप्त दो बाह्य (Alien) जीन होते हैं, जो फसल को ऐसा प्रोटीन विकसित करने में सक्षम बनाते हैं जो सामान्य कीट पिंक बॉलवर्म (Pink Bollworm) के लिए विषैला होता है।
  • अब तक भारत में खेती के लिए अनुमति प्राप्त एकमात्र आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (GM) फसल बीटी कॉटन ही है।

कपास उत्पादन पर प्रभाव:  

  • कपास उत्पादन 2002-03 में 13.6 मिलियन गांठ से बढ़कर 2013-14 में 39.8 मिलियन गांठ हो गया, जो 193% की वृद्धि दर्शाता है।
  • वार्षिक उत्पादन में 10% की दर से वृद्धि हुई तथा कपास का क्षेत्रफल 7.6 मिलियन हेक्टेयर (mha) से बढ़कर 11.9 मिलियन हेक्टेयर हो गया, अर्थात् 56% की वृद्धि हुई।
  • भारत विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक तथा दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक बन गया।
  • आगे की संकर किस्में:बोलगार्ड-II के बाद भारत ने अगली पीढ़ी की कपास किस्में यथा; बोलगार्ड-II विद राउंडअप रेडी फ्लेक्स तथा बोलगार्ड-III को विकसित किया। 
  • इन किस्मों में तीन संयुक्त (Stacked) जीन तथा शाकनाशी-सहिष्णु (Herbicide-Tolerant) गुण शामिल थे, जिन्हें कीटों में विकसित हो रहे प्रतिरोध तथा खरपतवार प्रबंधन की बढ़ती लागत से निपटने के लिए तैयार किया गया था। किन्तु इन्हें जारी नहीं किया गया।

कपास उत्पादन में गिरावट के कारण एवं संबंधित चिंताएँ

  • जीएम प्रौद्योगिकी के लिए नियामकीय बाधाएँ: नियामकीय अनिश्चितताओं तथा स्वीकृति में देरी के कारण नई पीढ़ी की कपास प्रौद्योगिकियों का वाणिज्यीकरण नहीं हो सका।
  • कपास बीजों पर मूल्य नियंत्रण: सरकार द्वारा बीज मूल्य की सीमा निर्धारित करने तथा प्रौद्योगिकी शुल्क (Trait Fee) में कमी करने से निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार के लिए प्रोत्साहन घट गया।
  • उत्पादकता में गिरावट: कीटों में प्रतिरोध क्षमता विकसित होने, जलवायु संबंधी दबाव तथा उन्नत प्रौद्योगिकियों तक सीमित पहुँच के कारण कपास की उत्पादकता स्थिर हो गई है।
  • आयात में वृद्धि: घरेलू उत्पादन वृद्धि की गति धीमी होने के कारण भारत एक प्रमुख निर्यातक से कपास आयातक देश बन गया है।

आगे की राह

  • जलवायु-अनुकूल कपास किस्मों का विकास: बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप सूखा-सहिष्णु, कीट-प्रतिरोधी तथा उच्च उत्पादकता वाली कपास किस्मों के विकास हेतु अनुसंधान में निवेश बढ़ाया जाए।
  • सार्वजनिक-निजी अनुसंधान एवं विकास साझेदारी को सुदृढ़ बनाना: उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास और प्रसार में तेजी लाने के लिए अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों तथा निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
  • बीजों की गुणवत्ता एवं उपलब्धता में सुधार: सुदृढ़ बीज उत्पादन एवं वितरण प्रणाली के माध्यम से प्रमाणित एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • विस्तार सेवाओं को सशक्त बनाना: कपास किसानों तक वैज्ञानिक ज्ञान, सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों तथा मौसम संबंधी परामर्श की अंतिम छोर तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित की जाए।
  • कपास मूल्य श्रृंखला में सुधार: कपास की गुणवत्ता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए जिनिंग, प्रसंस्करण, भंडारण एवं विपणन अवसंरचना का आधुनिकीकरण किया जाए।
  • कपास उत्पादकता मिशन का प्रभावी क्रियान्वयन: उत्पादकता एवं आय में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए परिणाम-आधारित क्रियान्वयन, नियमित निगरानी तथा वर्तमान कृषि योजनाओं के साथ समन्वय पर बल दिया जाए।

निष्कर्ष

  • भारत की कपास उत्पादकता को पुनर्स्थापित करने तथा वैश्विक वस्त्र अर्थव्यवस्था में उसकी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए प्रौद्योगिकीय नवाचार, सहायक नियामकीय व्यवस्था, जलवायु-अनुकूलन क्षमता तथा कुशल मूल्य श्रृंखलाओं का समन्वित विकास आवश्यक है।

स्रोत: IE

 

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