वैश्विक तनाव, वित्तीय संकट शांति स्थापना मिशनों के लिए खतरा: SIPRI 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने चेतावनी दी है कि भू-राजनीतिक तनाव और वित्तीय संकट शांति स्थापना मिशनों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र के अधीन संचालित मिशनों, को खतरे में डाल रहे हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • शांति स्थापना कर्मियों में तीव्र गिरावट: दिसंबर 2025 तक विश्वभर में केवल 78,633 अंतरराष्ट्रीय कर्मी शांति स्थापना मिशनों में तैनात थे। यह विगत 25 वर्षों में सबसे न्यूनतम स्तर है। 2016 से कर्मियों की संख्या लगभग 49% घट गई है।
  • शांति अभियानों की संख्या में कमी: 2025 में केवल 58 बहुपक्षीय शांति अभियान 34 देशों और क्षेत्रों में सक्रिय थे।
    • यह विगत वर्ष से कम है, जो संघर्ष प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के घटने को दर्शाता है।
  • संघर्ष क्षेत्रों में मिशनों का संकेंद्रण: अधिकांश कर्मी कुछ अत्यधिक अस्थिर क्षेत्रों में तैनात थे—मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान, सोमालिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और लेबनान।
    • उप-सहारा अफ्रीका में ही लगभग 70% शांति स्थापना कर्मी तैनात थे।

शांति स्थापना अभियानों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • वित्तीय संकट: SIPRI द्वारा पहचानी गई सबसे गंभीर चुनौती संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना को प्रभावित करने वाला वित्तीय संकट है। 2025 में लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर की कमी रही।
    • कई सदस्य राष्ट्रों ने समय पर योगदान नहीं दिया और बजट कटौती के कारण सैनिकों की तैनाती और परिचालन क्षमता में कमी आई।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भू-राजनीतिक गतिरोध: स्थायी सदस्यों के बीच बढ़ती विभाजन नई मिशनों की शुरुआत को कठिन बना रही है।
  • बहुपक्षवाद के लिए घटता राजनीतिक समर्थन: प्रमुख शक्तियाँ राष्ट्रीय हितों, द्विपक्षीय समझौतों और अस्थायी सैन्य गठबंधनों को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे संयुक्त राष्ट्र-नेतृत्व वाले सामूहिक सुरक्षा ढाँचे कमजोर हो रहे हैं।
    • इससे अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों की वैधता घटती है और सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ विखंडित होती हैं।
  • आधुनिक संघर्षों का परिवर्तित स्वरूप: आधुनिक संघर्ष अंतर-राज्यीय के बजाय आंतरिक होते हैं, जो आतंकवाद और विद्रोह से प्रेरित होते हैं तथा जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े होते हैं।
    • शांति सैनिक अब गैर-राज्य सशस्त्र समूहों, आतंकवादी संगठनों और हाइब्रिड युद्ध रणनीतियों का सामना कर रहे हैं।
    • पारंपरिक शांति स्थापना विधियाँ ऐसे वातावरण में प्रायः अपर्याप्त सिद्ध होती हैं।
  • मेज़बान राज्य का प्रतिरोध: कई सरकारें बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करती हैं और शांति सैनिकों की परिचालन स्वतंत्रता को सीमित करती हैं, जिससे मिशनों की प्रभावशीलता घटती है।
  • क्षेत्रीय विकल्पों की कमजोरी: 2014 के बाद से कोई बड़ा नया संयुक्त राष्ट्र-नेतृत्व वाला शांति मिशन स्थापित नहीं हुआ है।
    • अफ्रीकी संघ और पश्चिम अफ्रीकी राज्यों के आर्थिक समुदाय जैसी संगठन दीर्घकालिक शांति निर्माण के लिए पर्याप्त संसाधनों से वंचित हैं।

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन

  • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन वे अभियान हैं जिन्हें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने हेतु संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैनात किया जाता है।
  • प्रथम शांति मिशन 1948 में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य इज़राइल और उसके अरब पड़ोसियों के बीच युद्धविराम की निगरानी करना था।
  • इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा स्थापित किया और कार्य सौंपा गया।
  • यह सामूहिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है, जिसका उद्देश्य संघर्षों को रोकना, नागरिकों की रक्षा करना, राजनीतिक प्रक्रियाओं का समर्थन करना और देशों को संघर्ष से शांति की ओर ले जाना है।
  • प्रमुख संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन
    • MINUSTAH (हैती): राजनीतिक स्थिरीकरण, सुरक्षा और मानवीय सहायता हेतु (2004–2017)।
    • UNMISET (ईस्ट तिमोर): स्थिरता, शासन और सुरक्षा का समर्थन (2002–2005)।
    • UNMIL (लाइबेरिया): शांति निर्माण, निरस्त्रीकरण और संघर्षोत्तर पुनर्प्राप्ति में सहयोग (2003–2018)।
    • MINURCAT (मध्य अफ्रीकी गणराज्य एवं चाड): नागरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित (2007–2010)।
    • UNMOGIP (भारत–पाकिस्तान): जम्मू एवं कश्मीर में युद्धविराम स्थिति की निगरानी (1949 से)।
  • युगांडा सैन्य कर्मियों का शीर्ष योगदानकर्ता बना, इसके बाद नेपाल, बांग्लादेश और भारत का स्थान रहा।
  • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना बलों को 1988 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना के सिद्धांत

  • पक्षों की सहमति: शांति स्थापना अभियानों के लिए प्रमुख संघर्षरत पक्षों की स्वीकृति आवश्यक है।
  • निष्पक्षता: शांति सैनिकों को सभी पक्षों के बीच तटस्थ और निष्पक्ष रहना चाहिए।
  • बल का प्रयोग केवल आत्मरक्षा और जनादेश की रक्षा हेतु: बल का प्रयोग केवल आत्मरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा और मिशन के जनादेश को लागू करने के लिए किया जा सकता है।

स्रोत: SIPRI

 

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