भारत की ऊर्जा रूपांतरण: हरित परिवर्तन वर्तमान में भी कोयले पर क्यों निर्भर है? 

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा

संदर्भ

  • पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष की गंभीरता और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक कच्चे तेल तथा एलएनजी की कीमतों में वृद्धि ने एक बार पुनः भारत के बाह्य ऊर्जा आघातों के प्रति संवेदनशीलता को उजागर किया है।
  • भारत के जीवाश्म ईंधन आयात का लगभग आधा हिस्सा होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिसमें सऊदी अरब से कच्चा तेल और क़तर से एलएनजी आयात शामिल हैं।

भारत के ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • मार्च 2026 तक नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित विद्युत क्षमता का 42.4% हिस्सा थी, जबकि 2005 में यह मात्र 0.72% थी।
  • कोयले का हिस्सा 2005 में 58.7% से घटकर 2026 में 42.2% रह गया।
  • 2017 से नवीकरणीय ऊर्जा नई क्षमता वृद्धि में सबसे बड़ा योगदानकर्ता रही है।
    • तथापि, स्थापित क्षमता का अर्थ वास्तविक विद्युत उत्पादन नहीं होता।
  • अप्रैल 2026 में नवीकरणीय ऊर्जा ने केवल 15.8% विद्युत उत्पन्न की, जबकि कोयले का योगदान लगभग 71.8% रहा।
    • यह दर्शाता है कि नवीकरणीय ऊर्जा को कोयले के साथ जोड़ा जा रहा है, न कि उसे प्रतिस्थापित किया जा रहा है।

कोयला अब भी क्यों प्रमुख है?

  • आधारभूत आवश्यकता : कोयला उद्योगों, रेल और शहरी केंद्रों के लिए निरंतर एवं विश्वसनीय विद्युत प्रदान करता है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिरता: सौर और पवन ऊर्जा मौसम एवं समय पर निर्भर करती है।
  • भंडारण अवसंरचना की कमी: भारत में पर्याप्त बैटरी भंडारण और पंप्ड हाइड्रो प्रणाली का अभाव है।
  • ग्रिड सीमाएँ: वर्तमान प्रसारण प्रणाली बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा को समाहित करने में सक्षम नहीं है।
  • कोयला संयंत्रों की धीमी सेवानिवृत्ति: बहुत कम पुराने कोयला संयंत्र बंद किए गए हैं।
    • परिणामस्वरूप, जब भी नवीकरणीय उत्पादन घटता है, कोयला संतुलन स्रोत के रूप में कार्य करता है।

भारत में ऊर्जा रूपांतरण की आवश्यकता

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का 85% से अधिक आयात करता है। आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता अर्थव्यवस्था को भू-राजनीतिक व्यवधानों और मूल्य अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • जलवायु प्रतिबद्धताएँ: पेरिस समझौते और COP26 में घोषित पंचामृत लक्ष्यों के अंतर्गत भारत ने संकल्प लिया है:
    • 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त करना
    • उत्सर्जन तीव्रता को कम करना
    • 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना
  • मुद्रास्फीति दबाव में कमी: तेल और कोयले की वैश्विक कीमतों में वृद्धि सीधे बिजली दरों, परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन एवं राजकोषीय घाटे को प्रभावित करती है।
  • सतत आर्थिक विकास: स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र सौर निर्माण, हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण और ईवी पारिस्थितिकी तंत्र में रोजगार उत्पन्न करता है।
  • पर्यावरण संरक्षण: कोयला आधारित विद्युत वायु प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और सार्वजनिक स्वास्थ्य भार में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
    • अतः ऊर्जा रूपांतरण सतत विकास के लिए आवश्यक है।

भारत के ऊर्जा रूपांतरण में चिंताएँ, चुनौतियाँ और मुद्दे

  • क्षमता बनाम उत्पादन अंतर: नवीकरणीय स्थापित क्षमता और वास्तविक उत्पादन में असमानता है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिर प्रकृति: भंडारण प्रणाली, लचीले ग्रिड और मांग प्रबंधन के बिना सौर एवं पवन ऊर्जा निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर सकती।
  • ऊर्जा भंडारण की उच्च लागत: बैटरी भंडारण महंगा है और तकनीकी रूप से आयात पर निर्भर है।
  • ग्रिड आधुनिकीकरण चुनौतियाँ: भारत की प्रसारण अवसंरचना को नवीकरणीय एकीकरण, राज्यों के बीच प्रसारण और स्मार्ट ग्रिड प्रबंधन हेतु बड़े सुधारों की आवश्यकता है।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) की वित्तीय कठिनाई: राज्य विद्युत वितरण कंपनियाँ भारी घाटे, विलंबित भुगतान और कमजोर वित्तीय स्थिति का सामना कर रही हैं। इसका प्रभाव नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद पर पड़ता है।
  • मुख्य क्षेत्रों की कोयला निर्भरता: इस्पात, सीमेंट और भारी उद्योग अब भी कोयले पर अत्यधिक निर्भर हैं।
  • भू-राजनीतिक संवेदनशीलता: घरेलू विद्युत दरें भी अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक जीवाश्म ईंधन बाजारों से जुड़ी रहती हैं क्योंकि कोयला विद्युत उत्पादन की सीमांत लागत निर्धारित करता है।

संबंधित सरकारी प्रयास और पहल

  • राष्ट्रीय सौर मिशन: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत प्रारंभ किया गया, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा के प्रसार को बढ़ावा देना है।
  • पीएम-कुसुम योजना: कृषि क्षेत्र में सौर पंपों और विकेन्द्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करती है।
  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर परियोजना: नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण हेतु प्रसारण अवसंरचना को सुदृढ़ करने पर केंद्रित।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू स्तर पर सौर मॉड्यूल और उन्नत रसायन बैटरियों के निर्माण को प्रोत्साहित करती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत-नेतृत्व वाली पहल जो वैश्विक सौर सहयोग को बढ़ावा देती है।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों का तीव्र अपनाना और निर्माण (FAME): विद्युत गतिशीलता को समर्थन देती है और तेल पर निर्भरता कम करती है।

आगे की राह: और आवश्यक कदम

  • ऊर्जा भंडारण अवसंरचना का विस्तार: बैटरी भंडारण, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज और ग्रिड-स्तरीय बैकअप प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश आवश्यक है।
  • विद्युत ग्रिड का आधुनिकीकरण: भारत को स्मार्ट ग्रिड, लचीले प्रसारण नेटवर्क और वास्तविक समय विद्युत संतुलन प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी।
  • क्रमिक कोयला रूपांतरण रणनीति: अचानक बंद करने के बजाय, भारत को अक्षम संयंत्रों को सेवानिवृत्त करना चाहिए, वर्तमान संयंत्रों की दक्षता बढ़ानी चाहिए और कोयला-निर्भर क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत रूपांतरण सुनिश्चित करना चाहिए।
  • घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करना: सौर मॉड्यूल, लिथियम बैटरियों और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं में आयात निर्भरता कम करना ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
  • हरित गतिशीलता को प्रोत्साहन देना: ईवी अवसंरचना और सार्वजनिक परिवहन का विस्तार तेल आयात को कम कर सकता है।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) का सुधार: वित्तीय रूप से स्थिर वितरण कंपनियाँ नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद को बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: भारत को परमाणु ऊर्जा, जैव ऊर्जा, अपतटीय पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन का विस्तार करना चाहिए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत की ऊर्जा रूपांतरण से जुड़ी संरचनात्मक चुनौतियों का परीक्षण कीजिए तथा एक विश्वसनीय और सतत निम्न-कार्बन ऊर्जा प्रणाली के निर्माण हेतु आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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