18वाँ सिविल सेवा दिवस

पाठ्यक्रम:  GS2/ शासन

संदर्भ

  •  18वें सिविल सेवा दिवस समारोह में उपराष्ट्रपति ने “अधिक शक्ति के साथ अधिक जिम्मेदारी भी आती है” के विचार का उल्लेख करते हुए सिविल सेवकों से आह्वान किया कि वे नैतिक शासन, सत्यनिष्ठा और लोक सेवा के मूल्यों को बनाए रखते हुए ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य की प्राप्ति करें।

सिविल सेवा दिवस

  •  सिविल सेवा दिवस प्रत्येक वर्ष 21 अप्रैल को मनाया जाता है। यह दिन 1947 में उस अवसर की स्मृति में मनाया जाता है जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने नई दिल्ली के मेटकाफ हाउस में सिविल सेवकों के प्रथम बैच को संबोधित किया था।
  •  उन्होंने सिविल सेवकों को “स्टील फ्रेम ऑफ़ इंडिया” कहा और देश की एकता एवं अखंडता बनाए रखने में उनकी भूमिका पर बल दिया।

सिविल सेवाओं से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 309 संसद एवं राज्य विधानसभाओं को भर्ती तथा सेवा शर्तों के विनियमन का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 310 के अनुसार, संघ और राज्यों के सिविल सेवक क्रमशः राष्ट्रपति या राज्यपाल के ‘इच्छाधीन पद’ पर कार्य करते हैं।
  • अनुच्छेद 311 सिविल सेवकों को मनमाने ढंग से बर्खास्त किए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 312 अखिल भारतीय सेवाओं (जैसे IAS, IPS, IFoS) के सृजन की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
  • अनुच्छेद 315 से 323 संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) तथा राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) की स्थापना का प्रावधान करते हैं।

भारत में सिविल सेवाओं का इतिहास

  • लॉर्ड कॉर्नवालिस को भारत में सिविल सेवाओं का जनक माना जाता है।
  • लॉर्ड वेलेजली ने 1800 में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की।
  • 1806 में इसे इंग्लैंड के हेलीबरी स्थित ईस्ट इंडिया कॉलेज द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
  • 1853 से पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक सिविल सेवकों की नियुक्ति करते थे।
  • 1853 के चार्टर अधिनियम ने आश्रय-प्रथा समाप्त कर खुली प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत की।
  • 1855 में लंदन में प्रथम ICS परीक्षा आयोजित हुई।
  • 1864 में सत्येंद्रनाथ टैगोर प्रथम भारतीय बने जिन्होंने ICS उत्तीर्ण किया।


सिविल सेवाओं में शक्ति और उत्तरदायित्व के नैतिक आयाम

  • सिविल सेवाओं में शक्ति का स्वरूप :  सिविल सेवक महत्वपूर्ण अधिकार, प्रशासनिक विवेकाधिकार तथा सार्वजनिक संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं, जिनका नागरिकों के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
    •  यह स्थिति इस दायित्व को जन्म देती है कि शक्ति का प्रयोग केवल जनकल्याण एवं राष्ट्रीय हित के लिए ही किया जाए।
  • निर्णय-निर्माण में निष्पक्षता : सिविल सेवकों को वैध नीतिगत निर्देशों और अनुचित बाह्य दबावों के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए।
    •  प्रशासनिक कार्यवाहियों में न्यायसंगतता, वस्तुनिष्ठता तथा तटस्थता परिलक्षित होनी चाहिए, जिससे सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित हो सके।
  • भारतीय चिंतन में नैतिक आधार : तिरुवल्लुवर के उपदेशों के अनुसार “अरम” (धर्म/नैतिकता) सार्वजनिक जीवन का सर्वोच्च गुण है।
    •  यह राज्य की नैतिक वैधता तथा सतत सामाजिक-आर्थिक विकास दोनों को सुनिश्चित करता है।

सिविल सेवकों के समक्ष चुनौतियाँ 

  • राजनीतिक पक्षपात : कभी-कभी सिविल सेवकों की तटस्थता में कमी के कारण महत्वपूर्ण कार्यों के निर्वहन में राजनीतिक पक्षपात उत्पन्न हो जाता है।
    •  इसका प्रमुख कारण तथा परिणाम दोनों ही रूपों में नौकरशाही के विभिन्न पहलुओं, जैसे पदस्थापन एवं स्थानांतरण, में बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप है।
  • विशेषज्ञता का अभाव : सामान्यवादी (Generalist) पृष्ठभूमि वाले करियर नौकरशाहों में तकनीकी चुनौतियों से निपटने हेतु आवश्यक विशेषज्ञता का अभाव हो सकता है।
  • लालफीताशाही : अत्यधिक प्रक्रियात्मक औपचारिकताएँ निर्णय-निर्माण में विलंब उत्पन्न करती हैं तथा समयबद्ध सेवा वितरण में बाधा डालती हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ : उच्च दबाव वाले कार्य वातावरण तथा लंबे कार्य-घंटे सिविल सेवकों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
  • नवाचार के प्रति प्रतिरोध : कठोर प्रशासनिक संस्कृति नए प्रयोगों एवं नवाचारों को अपनाने में बाधा उत्पन्न करती है।
  • पुराने नियम एवं प्रक्रियाएँ : कई सेवा नियम औपनिवेशिक काल की विरासत हैं, जो आधुनिक प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं।

नौकरशाही की दक्षता बढ़ाने हेतु प्रशासनिक सुधार

  • मिशन कर्मयोगी राष्ट्रीय कार्यक्रम : यह भारत सरकार द्वारा 2020 में प्रारंभ किया गया एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य सिविल सेवाओं को ‘नियम-आधारित’ से ‘भूमिका-आधारित’ तथा नागरिक-केंद्रित कार्यप्रणाली में परिवर्तित करना है।
  • सिविल सेवाओं में लेटरल एंट्री : प्रशासन में विशेषज्ञता लाने तथा प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने के लिए लेटरल एंट्री की व्यवस्था की गई है।
  • ई-गवर्नेंस पहल :केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (CPGRAMS)
    • प्रदर्शन मूल्यांकन हेतु SPARROW प्रणाली
    • सेवा अभिलेखों का डिजिटलीकरण
    • ये सभी पहल प्रशासनिक पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं दक्षता को सुदृढ़ करने में सहायक हैं।

निष्कर्ष
 

  • सिविल सेवाओं की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपनी शक्ति का उपयोग नैतिक जिम्मेदारी, निष्पक्षता एवं जनकल्याण के अनुरूप करें।
  •  मूल्य-आधारित प्रशासनिक ढांचा प्रभावी शासन, नागरिक विश्वास एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करेगा।

स्रोत: AIR

 

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