पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत अभी भी नवाचार के प्रमुख प्रेरक तत्वों में पीछे है—जैसे अनुसंधान एवं विकास (R&D) की कम तीव्रता, निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी, वैश्विक स्तर पर तकनीकी प्रभाव का अभाव तथा अनुसंधान से बाजार तक रूपांतरण की कमजोर व्यवस्था।
- इस स्थिति में व्यापक प्रणालीगत परिवर्तन की आवश्यकता है, विशेष रूप से उद्योग-नेतृत्व वाले निवेश में वृद्धि तथा अनुसंधान, उद्यमिता और पूंजी के बीच सुदृढ़ संबंधों की स्थापना।
नवाचार-प्रेरित अर्थव्यवस्था के बारे में
- नवाचार-प्रेरित अर्थव्यवस्था वह होती है जिसमें आर्थिक विकास मुख्यतः ज्ञान, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता द्वारा संचालित होता है, न कि पारंपरिक कारकों जैसे श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों द्वारा।
- ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में अनुसंधान एवं विकास निवेश, तकनीकी नवाचार तथा उच्च कौशलयुक्त मानव पूंजी उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता के प्रमुख प्रेरक बन जाते हैं।
- भारत के लिए नवाचार-आधारित विकास महत्वपूर्ण है क्योंकि यह—
- उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि करता है;
- कम लागत वाले श्रम लाभ से प्रौद्योगिकी-आधारित लाभ की ओर संक्रमण को संभव बनाता है;
- उच्च मूल्य वर्धित विनिर्माण तथा डीप-टेक उद्योगों को प्रोत्साहित करता है;
- उच्च कौशलयुक्त रोजगार का सृजन करता है;
- 2047 तक विकसित भारत (विकसित भारत) के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक बनता है।
भारत में नवाचार अर्थव्यवस्था के प्रमुख प्रेरक
- अनुसंधान एवं विकास (R&D): अनुसंधान संस्थानों, प्रयोगशालाओं तथा औद्योगिक अनुसंधान में निवेश।
- मानव पूंजी:वैज्ञानिकों, अभियंताओं और कुशल पेशेवरों की उपलब्धता।
- स्टार्टअप और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र:प्रौद्योगिकी स्टार्टअप, वेंचर कैपिटल और इनक्यूबेशन केंद्रों का विकास।
- उद्योग–शैक्षणिक सहयोग:विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच साझेदारी।
- बौद्धिक संपदा संरक्षण:प्रभावी पेटेंट प्रणाली और प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण के तंत्र।
भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की संरचनात्मक कमजोरियाँ
- कम अनुसंधान एवं विकास व्यय:
- भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 0.65% ही R&D पर व्यय करता है, जो प्रमुख नवाचार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है, जैसे—
- दक्षिण कोरिया: लगभग 4–5%
- जापान: लगभग 3%
- संयुक्त राज्य अमेरिका: लगभग 3%
- चीन: लगभग 2.4%
- नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाएँ मुख्यतः निजी क्षेत्र के अनुसंधान निवेश पर निर्भर करती हैं, जबकि भारत में अनुसंधान का अधिकांश वित्तपोषण अभी भी सरकार द्वारा किया जाता है।
- यह भारतीय कंपनियों में दीर्घकालिक तथा उच्च जोखिम वाली तकनीकी नवाचार परियोजनाओं के प्रति सीमित रुचि को दर्शाता है।
- भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 0.65% ही R&D पर व्यय करता है, जो प्रमुख नवाचार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है, जैसे—
- वैश्विक पेटेंट उपस्थिति की सीमितता: यद्यपि पेटेंट आवेदनों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी वैश्विक नवाचार में भारत की उपस्थिति अभी भी सीमित है।
- घरेलू पेटेंट आवेदन (लगभग):
- चीन: लगभग 18 लाख
- संयुक्त राज्य अमेरिका: लगभग 6 लाख
- भारत: लगभग 1,10,000
- अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट सहयोग संधि (PCT) आवेदन, 2024:
- चीन: 70,000 से अधिक
- संयुक्त राज्य अमेरिका: 54,000 से अधिक
- जापान: 48,000 से अधिक
- भारत: 4,547
- यहाँ तक कि स्विट्ज़रलैंड, जो एक छोटा देश है, ने भी 5,300 से अधिक आवेदन दाखिल किए।
- यह दर्शाता है कि पैमाने और व्यावसायीकरण क्षमता अभी भी भारत के लिए प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
- घरेलू पेटेंट आवेदन (लगभग):
- मानव पूंजी संबंधी बाधाएँ: वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 के अनुसार—
- ज्ञान-गहन क्षेत्रों में रोजगार के मामले में भारत का स्थान: 95वाँ
- पूर्णकालिक समकक्ष शोधकर्ताओं की संख्या में स्थान: 80वाँ
- नवाचार में लैंगिक अंतर: उन्नत डिग्री प्राप्त महिलाओं के रोजगार के मामले में भारत 119 अर्थव्यवस्थाओं में 101वें स्थान पर है।
- इस अंतर को कम करने के लिए सरकार ने विदुषी (WIDUSHI) कार्यक्रम और WISE-KIRAN योजना जैसी पहलें शुरू की हैं, किंतु अब तक इनका प्रभाव सीमित रहा है।
- इस अंतर को कम करने के लिए सरकार ने विदुषी (WIDUSHI) कार्यक्रम और WISE-KIRAN योजना जैसी पहलें शुरू की हैं, किंतु अब तक इनका प्रभाव सीमित रहा है।
- अनुसंधान से बाजार तक की कमी: भारत की नवाचार श्रृंखला की सबसे बड़ी कमजोरी अनुसंधान का व्यावसायीकरण है। यद्यपि विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों से वैज्ञानिक प्रकाशनों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र अभी भी कमजोर है।
- मुख्य चुनौतियाँ—
- विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच सीमित सहयोग
- डीप-टेक के लिए अविकसित वेंचर कैपिटल पारिस्थितिकी तंत्र
- प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग और व्यावसायीकरण की कमजोर संरचनाएँ
- अनुसंधान परियोजनाओं में उच्च जोखिम और लंबी परिपक्वता अवधि
- संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे नवाचार में अग्रणी देशों में शैक्षणिक संस्थान–उद्योग–वित्त के बीच सुदृढ़ संबंध होते हैं, जो भारत में अभी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुए हैं।
- मुख्य चुनौतियाँ—
- औद्योगिकीकरण चरण का अभाव: दक्षिण कोरिया या ताइवान जैसे पूर्वी एशियाई देशों के विपरीत, भारत ने श्रम-प्रधान विनिर्माण आधारित व्यापक औद्योगिकीकरण का अनुभव नहीं किया।
- इसके परिणामस्वरूप—
- अर्थव्यवस्था मुख्यतः सेवा क्षेत्र और कृषि पर निर्भर बनी हुई है।
- कई नवयुगीन यूनिकॉर्न कंपनियाँ प्लेटफॉर्म-आधारित व्यवसाय हैं, जो गहन तकनीकी नवाचार के बजाय श्रम उपलब्धता पर आधारित हैं।
- इसके परिणामस्वरूप—
नवाचार-प्रेरित अर्थव्यवस्था के लिए भारत के प्रयास
- नवाचार के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण में वृद्धि: भारत ने अनुसंधान और नवाचार के लिए वित्तपोषण में उल्लेखनीय वृद्धि की है—
- पूर्व में ₹1,00,000 करोड़ का अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष घोषित किया गया।
- केंद्रीय बजट में डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए ₹20,000 करोड़ का कोष घोषित किया गया।
- कर प्रोत्साहनों के विस्तार तथा डिजिटल अवसंरचना में निवेश को बढ़ाया गया।
- अटल टिंकरिंग लैब्स के लिए वित्तपोषण को ₹500 करोड़ से बढ़ाकर ₹3,200 करोड़ कर दिया गया, जो जमीनी स्तर पर नवाचार और युवाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान को दर्शाता है।
- ये पहलें “युवा शक्ति द्वारा संचालित विकसित भारत” की व्यापक दृष्टि के अनुरूप हैं।
- ये पहलें “युवा शक्ति द्वारा संचालित विकसित भारत” की व्यापक दृष्टि के अनुरूप हैं।
- नवाचार के लिए नियामकीय सुधार: कई सुधार अनुसंधान के व्यावसायीकरण और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किए गए हैं—
- औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन कार्यक्रम के अंतर्गत डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए तीन वर्ष की पात्रता शर्त को समाप्त किया गया।
- शांति अधिनियम, 2025 (SHANTI Act) पारित किया गया, जो परमाणु ऊर्जा और विकिरण के शांतिपूर्ण उपयोग से संबंधित पेटेंट की अनुमति देता है।
- परमाणु प्रौद्योगिकी से संबंधित पेटेंटिंग पर लगाए गए प्रतिबंधों में शिथिलता प्रदान की गई।
- इन उपायों का उद्देश्य सामरिक प्रौद्योगिकियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना है।
भारत में संकेतकों में सुधार
- वैश्विक नवाचार रैंकिंग: वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) 2025 में भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर है, जो विगत दशक में निरंतर सुधार को दर्शाता है।
- पेटेंट आवेदन में वृद्धि: पेटेंट आवेदनों की संख्या 2020–21 में लगभग 59,000 से बढ़कर 2024–25 में 1,10,000 से अधिक हो गई है।
- कुल आवेदनों में घरेलू आवेदनों का हिस्सा लगभग 62% है।
भारत के लिए उभरते अवसर
- अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स: भारत का वाणिज्यिक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र तीव्र गति से विस्तार कर रहा है, जिसमें निजी कंपनियाँ उपग्रह प्रक्षेपण और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं।
- डीप-टेक नवाचार : RDI कोष निम्नलिखित क्षेत्रों में नवाचार को उल्लेखनीय रूप से गति प्रदान कर सकता है—
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता
- क्वांटम कंप्यूटिंग
- सेमीकंडक्टर
- उन्नत सामग्री
- जैव प्रौद्योगिकी
- भविष्य की प्रौद्योगिकी मानक: आगामी 6G वैश्विक मानक भारत की नवाचार क्षमता की एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
- भारतीय मूल के मानक-आवश्यक पेटेंट (Standard Essential Patents – SEPs) की संख्या यह संकेत देगी कि भारत केवल प्रौद्योगिकी उपभोक्ता है या वास्तव में प्रौद्योगिकी निर्माता बन चुका है।
आगे की राह
- निजी क्षेत्र के अनुसंधान निवेश में वृद्धि: उद्योगों को नवाचार निवेश में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
- उद्योग–शैक्षणिक सहयोग को सुदृढ़ करना: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालयों तथा विश्वविद्यालय-आधारित स्टार्टअप (spin-offs) को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- डीप-टेक के लिए जोखिम पूंजी का विस्तार: दीर्घकालिक वेंचर कैपिटल निवेश को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- मानव पूंजी का विकास: शोधकर्ताओं की संख्या बढ़ाना, STEM शिक्षा को सुदृढ़ करना तथा लैंगिक समावेशन को प्रोत्साहित करना।
- पेटेंट की गुणवत्ता और वैश्विक पहुँच में सुधार: व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करना तथा अंतर्राष्ट्रीय पेटेंटिंग को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
- भारत की नवाचार यात्रा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। सरकारी पहलों ने वित्तपोषण, नियामकीय सुधारों और संस्थागत समर्थन के माध्यम से आधारभूत ढाँचा तैयार किया है। हालाँकि, वास्तविक परिवर्तन इस बात पर निर्भर करेगा कि उद्योग क्षेत्र दीर्घकालिक और गहन अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने के लिए कितना आगे आता है।
- भारत के समक्ष अब चुनौती नीतिगत महत्वाकांक्षा की नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन और पारिस्थितिकी तंत्र की परिपक्वता की है। अनुसंधान, उद्योग और बाजार के बीच के अंतर का समापन यह निर्धारित करेगा कि भारत भविष्य में वैश्विक प्रौद्योगिकी नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरेगा या मुख्यतः प्रौद्योगिकी उपभोक्ता बना रहेगा।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में प्रमुख बाधाओं पर चर्चा कीजिए तथा उद्योग की भागीदारी, अनुसंधान के व्यावसायीकरण और तकनीकी नेतृत्व को सुदृढ़ करने हेतु उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH