पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- अंतर्राष्ट्रीय तुलनात्मक अनुभव और संवैधानिक सिद्धांत भारत में प्रस्तावित ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (ONOE) के संदर्भ में संघवाद, लोकतांत्रिक जवाबदेही एवं संस्थागत संरचना को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के बारे में
- इसका आशय लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव से है।
- इसका उद्देश्य चुनावी चक्रों का समन्वय करना है ताकि देशभर में चुनाव एक ही समय या अल्प अवधि में संपन्न हों।
- प्रस्ताव है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव प्रत्येक पाँच वर्ष में एक साथ कराए जाएँ।
- कार्यान्वयन के दो मॉडल :
- पूर्ण समन्वय : सभी लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव प्रत्येक पाँच वर्ष में एक साथ कराए जाएँ।
- दो-चक्र मॉडल : पाँच वर्ष के चक्र में चुनाव दो चरणों में कराए जाएँ, जिसमें राज्यों को समूहबद्ध किया जाए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 1951–1967: लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते थे। यह प्रणाली निम्न कारणों से विघटित हो गई:
- राज्य विधानसभाओं का समयपूर्व विघटन
- राजनीतिक अस्थिरता
- कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन
- परिणामस्वरूप, देशभर में चुनावी चक्र धीरे-धीरे असमान हो गए।
भारत का संवैधानिक ढाँचा
- भारत ने विधायी जवाबदेही पर आधारित संसदीय प्रणाली अपनाई।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि लोकतंत्र स्थिरता और जवाबदेही दोनों को अधिकतम नहीं कर सकता।
- भारत ने जवाबदेही को चुना, जिसका अर्थ है कि कार्यपालिका हर समय विधायिका के प्रति उत्तरदायी रहेगी।
- प्रमुख संवैधानिक प्रावधान :
- अनुच्छेद 75 और 164: कार्यपालिका की सामूहिक जिम्मेदारी विधायिका के प्रति।
- अनुच्छेद 83 और 172: विधायिकाओं का अधिकतम कार्यकाल पाँच वर्ष (गारंटी नहीं)।
- समयपूर्व विघटन एक लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय है, जिससे सरकार विश्वास खोने पर मतदाताओं से नया जनादेश प्राप्त कर सके।
- ONOE इस तर्क को बदल देता है और विघटन को लोकतांत्रिक तंत्र के बजाय प्रशासनिक असुविधा मानता है।
प्रमुख समितियाँ और रिपोर्टें
- भारत का विधि आयोग (1999): राजनीतिक अस्थिरता और व्यय कम करने हेतु एक साथ चुनावों की संभावना पर विचार सुझाया।
- संसदीय स्थायी समिति (2015): चुनावों के चरणबद्ध समन्वय की अनुशंसा की।
- नीति आयोग चर्चा पत्र (2017): दो-चरणीय चुनाव मॉडल प्रस्तावित किया।
- उच्च-स्तरीय समिति (2023): पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति ने संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से ONOE लागू करने की अनुशंसा की।
संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव
- यह प्रस्ताव संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 के रूप में विधायी रूप ले चुका है, जो पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की अनुशंसाओं पर आधारित है।
- मुख्य विशेषताएँ :
- प्रस्तावित अनुच्छेद 82A: राष्ट्रपति को ‘निर्धारित तिथि’ अधिसूचित करने का अधिकार देता है, जिससे सभी राज्य विधानसभा कार्यकाल लोकसभा के साथ संरेखित हों।
- राज्य विधानसभा कार्यकाल का संक्षिप्तीकरण: निर्धारित तिथि के बाद गठित विधानसभाओं का कार्यकाल राष्ट्रीय चुनावों के साथ समन्वय हेतु छोटा किया जा सकता है।
- ‘अवशिष्ट-कार्यकाल चुनाव’: यदि कोई विधायिका समयपूर्व विघटित होती है, तो नई निर्वाचित विधायिका केवल शेष कार्यकाल तक ही सेवा करेगी।
- चुनाव स्थगन: यदि एक साथ चुनाव कराना अव्यावहारिक हो, तो भारत निर्वाचन आयोग (ECI) राज्य चुनावों को स्थगित करने की अनुशंसा कर सकता है।
- प्रस्तावित संवैधानिक परिवर्तन: ONOE लागू करने हेतु निम्न संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन आवश्यक होंगे:
- अनुच्छेद 83: लोकसभा की अवधि
- अनुच्छेद 85: लोकसभा का विघटन
- अनुच्छेद 172: राज्य विधानसभाओं की अवधि
- अनुच्छेद 174: राज्य विधानसभाओं के सत्र
- अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन
- इसके अतिरिक्त जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में भी संशोधन आवश्यक होंगे।
ONOE के पक्ष में तर्क
- चुनावी व्यय में कमी: बार-बार चुनाव कराने से चुनाव प्रशासन, सुरक्षा बलों और प्रचार-प्रसार पर भारी व्यय होता है। एक साथ चुनाव कराने से सार्वजनिक व्यय कम हो सकता है।
- शासन दक्षता: बार-बार चुनाव कराने से आचार संहिता (MCC) का बार-बार लागू होना पड़ता है, जिससे नीतिगत निर्णय और विकास परियोजनाएँ विलंबित हो सकती हैं। ONOE शासन में निरंतरता सुनिश्चित कर सकता है।
- राजनीतिक ध्रुवीकरण में कमी: लगातार चुनावी चक्र राजनीतिक दलों को स्थायी चुनावी मोड में रखता है। एक साथ चुनाव से सरकारें नीतिनिर्माण और प्रशासन पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती हैं।
- प्रशासनिक सुविधा: चुनाव एक साथ कराने से चुनाव अधिकारियों, सुरक्षा कर्मियों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) की बार-बार तैनाती की आवश्यकता कम हो जाती है।
ONOE के विरुद्ध तर्क
- संघवाद के लिए खतरा: भारत एक संघीय व्यवस्था है और राज्यों की स्वतंत्र राजनीतिक गतिशीलता है। एक साथ चुनाव कराने से:
- क्षेत्रीय मुद्दों का महत्व कम हो सकता है।
- राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की तुलना में अधिक बल मिल सकता है।
- संवैधानिक चुनौतियाँ: संसदीय प्रणाली विधायिकाओं के समयपूर्व विघटन की अनुमति देती है। यदि सरकार गिरती है तो नए चुनाव कराए जाने चाहिए। चुनावों का समन्वय करने के लिए विधायिकाओं के कार्यकाल को घटाना या बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- मतदाता व्यवहार पर प्रभाव: शोध से संकेत मिलता है कि एक साथ चुनाव कराने से ‘राष्ट्रीय लहर प्रभाव’ उत्पन्न हो सकता है। मतदाता राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक ही दल को वोट दे सकते हैं। इससे संघीय चुनावों में अलग-अलग राजनीतिक विकल्प कम हो सकते हैं।
- लॉजिस्टिक कठिनाइयाँ: भारत सुरक्षा आवश्यकताओं, विशाल मतदाता जनसंख्या और प्रशासनिक सीमाओं के कारण चरणबद्ध चुनाव कराता है। एक साथ चुनाव कराने के लिए संसाधनों की भारी तैनाती आवश्यक होगी।
संघवाद संबंधी चिंताएँ
- मूल संरचना सिद्धांत: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संघवाद संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। अतः राज्यों के पास स्वतंत्र लोकतांत्रिक वैधता है।
- समन्वय का प्रभाव: ONOE प्रशासनिक सुविधा हेतु राज्यों के जनादेश को कम कर सकता है और संघीय स्वायत्तता को विकृत कर सकता है।
- उदाहरण: यदि कोई राज्य 2033 में अपनी विधानसभा का चुनाव कराता है, तो समन्वय के कारण उसका कार्यकाल 2034 में समाप्त हो सकता है, जिससे निर्वाचित सरकार का कार्यकाल केवल एक वर्ष रह जाएगा।
- ‘अवशिष्ट-कार्यकाल चुनाव’ की समस्या: प्रस्ताव का सबसे विवादास्पद तत्व मध्यावधि चुनाव है, जिसमें शेष कार्यकाल के लिए चुनाव कराए जाएँ।
- संवैधानिक मुद्दे: संविधान अवशिष्ट जनादेश की अवधारणा को मान्यता नहीं देता। यद्यपि प्रस्तावित संशोधन कहते हैं कि नई विधानसभा पुरानी का निरंतरता नहीं है, परंतु प्रणाली पूर्व चुनावी चक्रों को प्रभावी रूप से बनाए रखती है।
- संवैधानिक दुरुपयोग का जोखिम: प्रस्तावित अनुच्छेद 82A(5) भारत निर्वाचन आयोग को राज्य चुनाव स्थगित करने की अनुशंसा का अधिकार देता है, परंतु इसमें स्पष्ट सुरक्षा उपाय नहीं हैं।
- अनुच्छेद 356 के विपरीत, जिसमें संसदीय निगरानी और समय सीमा है, इस प्रावधान में स्पष्ट संस्थागत नियंत्रण का अभाव है।
इंडोनेशिया का केस स्टडी एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय अनुभव
- इंडोनेशिया ने 2019 में ऐतिहासिक एक साथ चुनाव कराए, जिसमें राष्ट्रपति, राष्ट्रीय संसद, क्षेत्रीय विधानसभाओं और स्थानीय परिषदों के चुनाव एक ही दिन संपन्न हुए।
- मुख्य परिणाम:
- लगभग 900 चुनाव कर्मियों की मृत्यु हुई और 5,000 से अधिक गंभीर रूप से बीमार पड़े, जिसका कारण अत्यधिक प्रशासनिक दबाव था।
- 2024 के चुनाव में भी स्थिति गंभीर रही, जिसमें 100 से अधिक मृत्यु और लगभग 15,000 बीमारियाँ दर्ज की गईं।
- जून 2025 में इंडोनेशिया के संवैधानिक न्यायालय ने निर्णय दिया कि 2029 से राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव अलग-अलग कराए जाएँगे, जिनके बीच लगभग दो से ढाई वर्ष का अंतर होगा।
- निहितार्थ: न्यायालय ने माना कि एक साथ चुनावों से प्रशासनिक भार, मतदाता थकान और लोकतांत्रिक भागीदारी की गुणवत्ता में कमी आती है।
- इंडोनेशिया का अनुभव दर्शाता है कि चुनावी दक्षता लोकतांत्रिक और प्रशासनिक स्थिरता से ऊपर नहीं हो सकती।
तुलनात्मक वैश्विक अनुभव
- कनाडा : संघीय और प्रांतीय चुनाव स्वतंत्र रूप से होते हैं। यह सुदृढ़ संघीय स्वायत्तता को दर्शाता है।
- ऑस्ट्रेलिया : समन्वय व्यावहारिक रूप से असंभव है। राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल निश्चित चार वर्ष है, जबकि संघीय प्रतिनिधि सभा का अधिकतम कार्यकाल तीन वर्ष है।
- जर्मनी : जर्मनी की राजनीतिक स्थिरता को प्रायः गलत समझा जाता है। लैंडर (राज्यों) में चुनाव जानबूझकर अलग-अलग समय पर कराए जाते हैं। स्थिरता, रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव(Constructive Vote of No Confidence) से आती है, जिसके अंतर्गत बुंडेस्टाग को चांसलर को हटाने से पहले उत्तराधिकारी का चुनाव करना होता है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका : निश्चित चुनावी चक्र राष्ट्रपति प्रणाली के कारण कार्य करता है, जहाँ कार्यपालिका का कार्यकाल विधायी विश्वास से स्वतंत्र होता है।
संभावित कार्यान्वयन मॉडल
- निश्चित-कार्यकाल वाली विधायिकाएँ : समयपूर्व विघटन रोकने के लिए पाँच वर्ष का निश्चित कार्यकाल लागू करना।
- रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव (Constructive Vote of No Confidence): सरकार को केवल तभी हटाया जा सके जब साथ ही नई सरकार का चुनाव हो।
- दो-चुनाव चक्र मॉडल : प्रत्येक 2.5 वर्ष में राज्यों को दो समूहों में बाँटकर चुनाव कराना।
निष्कर्ष
- एक राष्ट्र, एक चुनाव द्वारा प्रस्तुत प्रशासनिक दक्षता और लागत बचत का वादा संभवतः अतिरंजित है। इसके विपरीत, यह प्रस्ताव गहन संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न करता है, जैसे राज्यों के जनादेश का संक्षिप्तीकरण, संघवाद का कमजोर होना, संसदीय जवाबदेही का विकृतिकरण एवं दीर्घकालीन गैर-निर्वाचित शासन का जोखिम।
- तुलनात्मक अनुभव, विशेषकर इंडोनेशिया का असफल प्रयोग, यह दर्शाता है कि चुनावी समन्वय लोकतांत्रिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से भारी लागत थोप सकता है।
- भारत की संवैधानिक संरचना जिम्मेदारी, संघीय स्वायत्तता और सतत लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बल देती है। कोई भी सुधार जो इन मूलभूत सिद्धांतों को बाधित करता है, संविधान की मूल संरचना को कमजोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के प्रस्ताव से भारत की संसदीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं संघीय चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। विवेचना कीजिए। |
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