पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने खराब ऋणों के वर्गीकरण, परिभाषा एवं वसूली से संबंधित नियमों को वैश्विक रूप से स्वीकृत मानकों के अनुरूप करने हेतु सख्त किया है, जो 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे।
गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) अथवा खराब ऋण क्या है?
- यह उस ऋण को संदर्भित करता है जिसमें उधारकर्ता द्वारा 90 दिनों से अधिक समय तक मूलधन या ब्याज का भुगतान नहीं किया गया हो।
- इसे तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
- उप-मानक परिसंपत्तियाँ (12 माह तक बकाया),
- संदिग्ध परिसंपत्तियाँ (12 माह से अधिक बकाया एवं वसूली अनिश्चित),
- हानि परिसंपत्तियाँ (अधिकांशतः अवसूली योग्य नहीं मानी जाती)।
खराब ऋणों को प्रेरित करने वाले कारक
- वित्तीय अस्थिरता: रोजगार समाप्ति, व्यवसायिक हानि या आय में अचानक कमी के कारण NPA उत्पन्न हो सकते हैं।
- उच्च ब्याज दरें: पुनर्भुगतान का भार बढ़ाती हैं, जिससे EMI चुकाना कठिन हो जाता है।
- अत्यधिक ऋण ग्रहण: उचित योजना के अभाव में कई ऋणों का प्रबंधन कठिन हो जाता है।
- आक्रामक ऋण वितरण एवं कमजोर जाँच: उच्च वृद्धि काल में जोखिम मूल्यांकन के बिना ऋण प्रदान करना।
- आर्थिक मंदी एवं क्षेत्रीय दबाव: अवसंरचना, ऊर्जा एवं दूरसंचार क्षेत्रों में मांग में कमी से डिफॉल्ट बढ़े।
- बाजार उतार-चढ़ाव: व्यवसायों के नकदी प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
- जानबूझकर चूक : प्रवर्तकों द्वारा धन का दुरुपयोग या भुगतान करने की क्षमता के बावजूद चूक।
- अप्रत्याशित घटनाएँ: चिकित्सा आपातकाल, दुर्घटनाएँ या आर्थिक संकट उधारकर्ताओं को डिफॉल्ट की ओर धकेल सकते हैं।
प्रभाव
- बैंकिंग क्षेत्र की दुर्बलता: उच्च NPA से बैंकों की आय घटती है, हानि बढ़ती है तथा अधिक प्रावधान करना पड़ता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति कमजोर होती है।
- व्यवसायों को ऋण प्रवाह में कमी: बैंक अधिक सतर्क हो जाते हैं, जिससे व्यवसाय एवं अवसंरचना परियोजनाओं को ऋण सीमित हो जाता है।
- उधारी की लागत में वृद्धि: NPA से होने वाली हानि की भरपाई हेतु ऋण दरों में वृद्धि, जिससे निवेश एवं पूंजी निर्माण प्रभावित होता है।
- सरकारी वित्त पर प्रभाव: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण हेतु करदाताओं के धन का उपयोग, जिससे राजकोषीय भार बढ़ता है।
- निवेशक विश्वास में कमी: बैंकिंग अस्थिरता निवेश प्रवाह को प्रभावित करती है तथा FDI आकर्षण कम करती है।
- रोजगार एवं आय स्तर पर प्रभाव: ऋण में कमी से उद्योगों का विस्तार बाधित होता है, जिससे रोजगार, आय एवं उपभोग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सरकार एवं RBI द्वारा उठाए गए कदम
- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC): वर्ष 2016 में लागू, जो ऋण चूक के मामलों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करता है; 2026 संशोधन द्वारा प्रक्रिया को अधिक त्वरित एवं प्रभावी बनाने का प्रयास।
- ऋण वसूली अधिकरण (DRTs) का सुदृढ़ीकरण: अधिकार क्षेत्र ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख किया गया, जिससे उच्च मूल्य मामलों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
- SARFAESI अधिनियम 2002: बैंकों को न्यायालय की अनुमति के बिना गिरवी रखी संपत्तियों के अधिग्रहण एवं विक्रय द्वारा वसूली का अधिकार।
- तनावग्रस्त परिसंपत्ति प्रबंधन इकाइयाँ: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा विशेष इकाइयों एवं शाखाओं की स्थापना, जिससे NPA खातों की निगरानी एवं वसूली में सुधार हुआ।
- व्यवसाय संवाददाताओं की तैनाती एवं ‘फीट-ऑन-स्ट्रीट’ मॉडल: वसूली प्रक्रिया को सुदृढ़ करने में सहायक।
- बैड बैंक की स्थापना: वर्ष 2021 में नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) को ₹6,000 करोड़ की पूंजी के साथ लाइसेंस प्रदान किया गया, जिससे तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के प्रबंधन एवं समाधान में सहायता मिल सके।
RBI के नवीनतम मास्टर निर्देश
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने खराब ऋणों के वर्गीकरण, वसूली एवं प्रावधान से संबंधित नियमों को वैश्विक मानकों के अनुरूप संशोधित किया है।
- मुख्य परिवर्तन इस प्रकार हैं:
- कठोर NPA वर्गीकरण: यदि किसी उधारकर्ता का एक भी ऋण गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बन जाता है, तो उसके सभी ऋणों को NPA माना जाएगा।
- तथापि, वर्गीकरण अभी भी 90 दिनों की बकाया अवधि के नियम पर आधारित रहेगा।
- उधारकर्ता केवल तभी “मानक परिसंपत्ति” की स्थिति में लौट सकता है, जब वह सभी ऋण सुविधाओं के अंतर्गत देय राशि का पूर्ण भुगतान कर दे।
- स्वचालन की अनिवार्यता: बैंकों को NPA की पहचान हेतु मैनुअल प्रक्रिया के स्थान पर स्वचालित प्रणालियों का उपयोग करना अनिवार्य होगा।
- नया प्रावधान मॉडल (ECL): बैंक अब ऋण हानि का पूर्वानुमान तीन-चरणीय ढाँचे के आधार पर करेंगे, जो ऋण जोखिम स्तर पर आधारित होगा। यह पूर्ववर्ती “आकस्मिक हानि” (Incurred Loss) मॉडल का स्थान लेगा, जिसमें प्रावधान केवल डिफॉल्ट (90+ दिन) के पश्चात किए जाते थे।
- ब्याज मापदंड में परिवर्तन: ECL की गणना प्रभावी ब्याज दर के आधार पर की जाएगी, जिसमें संभावित नकदी प्रवाह को भी सम्मिलित किया जाएगा, न कि केवल अनुबंधित ब्याज दर को।
- चरणबद्ध क्रियान्वयन: अप्रैल 2027 से नए ऋणों पर EIR-आधारित ECL प्रणाली लागू होगी, जबकि पुराने ऋणों को मार्च 2030 तक इस प्रणाली में स्थानांतरित करना अनिवार्य होगा।
भविष्य के कदम
- ऋण प्रदान करने से पूर्व बेहतर सावधानीपूर्वक जाँच एवं जोखिम विश्लेषण द्वारा ऋण मूल्यांकन में सुधार।
- डिफॉल्ट की शीघ्र पहचान एवं समयबद्ध कार्रवाई हेतु ऋण निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ करना।
- अस्थायी वित्तीय संकट का सामना कर रहे उधारकर्ताओं के लिए पुनर्गठन या पुनर्निर्धारण की सुविधा प्रदान करना, जिससे NPA की रोकथाम हो सके।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग एवं बिग डेटा जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग कर NPA का पूर्वानुमान एवं निगरानी करना।
- वसूली तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) जैसे नियामक सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन।
- परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (ARCs) के साथ सहयोग बढ़ाकर तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का हस्तांतरण एवं बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार।
निष्कर्ष
- गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) ऐसे ऋण होते हैं जिनमें उधारकर्ता मूलधन या ब्याज का भुगतान करने में विफल रहता है, जिससे बैंकों की आय में कमी आती है तथा वित्तीय स्थिरता प्रभावित होती है।
- यद्यपि सरकार एवं भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा IBC, पुनर्पूंजीकरण एवं कठोर विनियमन जैसे सुधारों के माध्यम से स्थिति में सुधार हुआ है, तथापि खराब ऋणों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु बैंकों की आंतरिक प्रक्रियाओं को और सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- भविष्य में ध्यान डिफॉल्ट की रोकथाम, त्वरित समाधान सुनिश्चित करने तथा बैंकिंग शासन में सुधार पर केंद्रित होना चाहिए, जिससे एक स्थिर एवं दक्ष बैंकिंग प्रणाली का निर्माण किया जा सके।
स्रोत :TH
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