मरुस्थलीकरण पर G7 घोषणा 

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • हाल ही में, G7 पर्यावरण मंत्रियों ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को अपने एजेंडे के केंद्र में रखा है तथा इन परिस्थितियों को ‘प्रणालीगत वैश्विक चुनौतियाँ’ तथा ‘सुरक्षा जोखिम गुणक’ कहा है।

घोषणा की प्रमुख बातें

  • संकट का पैमाना: मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा मृदा की उर्वरता में गिरावट, जल संकट एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की हानि का कारण बनते हैं।
    • यह सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा और आजीविका को खतरे में डालते हैं, विशेषकर कृषि-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में।
    • वैश्विक भूमि का लगभग 40% हिस्सा क्षरित है, जिससे लगभग 3.2 अरब लोग प्रभावित हैं।
  • पर्यावरणीय दबाव एक सुरक्षा खतरे के रूप में: G7 ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को ‘सुरक्षा जोखिम गुणक’ के रूप में पहचाना है।
    • 40% से अधिक आंतरिक संघर्ष भूमि और जल विवादों से जुड़े हैं।
    • पर्यावरणीय क्षरण संसाधन प्रतिस्पर्धा, जबरन प्रवासन और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देता है।
    • यह जलवायु-संघर्ष संबंध की पुष्टि करता है, विशेषकर साहेल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में।

भारत में भूमि संकट

  • भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 29.7%) 2018–19 तक भूमि क्षरण से प्रभावित हुआ (ISRO मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस)।
    • भारत के लगभग 30% क्षेत्र में मरुस्थलीकरण है।
  • मृदा के स्वास्थ्य में गिरावट खाद्य और आर्थिक सुरक्षा को सीधे खतरे में डालती है, क्योंकि 40% से अधिक जनसंख्या कृषि एवं भूमि-आधारित आजीविका पर निर्भर है।
  • भारत 1994 में UNCCD का हस्ताक्षरकर्ता बना (1996 में अनुमोदित) और 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि को पुनर्स्थापित करने का संकल्प लिया है।
    • भारत पहले ही 18.94 मिलियन हेक्टेयर भूमि को पुनर्स्थापित कर चुका है।

भारत की प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेप

  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (2023): हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और गुजरात में एक हरित गलियारा, जो अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल से प्रेरित है।
  • मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCD): 2023 में संशोधित, जिसे MGNREGS, CAMPA और PMKSY के साथ एकीकृत किया गया।
  • वैश्विक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप (UNCCD एवं SDGs): भारत UNCCD का हस्ताक्षरकर्ता है और भूमि क्षरण तटस्थता (LDN) तथा लाखों हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन हेतु प्रतिबद्ध है।
    • मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे पर कार्रवाई SDG 2 (खाद्य सुरक्षा), SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) एवं SDG 15 (भूमि पर जीवन) का समर्थन करती है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन (GIM): 2025 में संशोधित, ₹12,190 करोड़ का प्रावधान, 1 मिलियन हेक्टेयर में वनीकरण का लक्ष्य।
  • एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP): PMKSY के अंतर्गत।

G7 की नीतिगत प्रतिबद्धताएँ

  • एकीकृत नीति दृष्टिकोण की ओर बदलाव: क्षेत्रीय सोच से आगे बढ़कर पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को जोड़ने वाला प्रणाली-आधारित ढाँचा अपनाने की आवश्यकता।
    • भूमि को सतत विकास, जलवायु लचीलापन और शांति निर्माण के केंद्र में मान्यता दी गई।
  • भूमि पुनर्स्थापन और सूखा प्रतिरोधक क्षमता: सतत भूमि प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन और सूखा तैयारी को बढ़ावा देना।
    • दीर्घकालिक लचीलापन हेतु पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण माना गया।
  • वित्तीय तंत्र: सार्वजनिक और निजी निवेश पर आधारित मिश्रित वित्त मॉडल पर बल, जो हरित वित्तीय ढाँचों के वैश्विक आह्वान के अनुरूप है।
  • मरुस्थलीकरण से परे ध्यान केंद्रित: अतिरिक्त घोषणाओं में जैव विविधता संरक्षण, महासागर सुरक्षा, जल प्रबंधन, परिपत्र अर्थव्यवस्था, प्रदूषण नियंत्रण और लचीला अवसंरचना शामिल हैं।
    • यह एक समग्र पर्यावरणीय शासन दृष्टिकोण को दर्शाता है।

UNCCD और COP17 (उलानबातर, मंगोलिया; अगस्त 2026)

  • UNCCD मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटने वाला प्रमुख वैश्विक सम्मेलन है।
  • पुनर्स्थापन हेतु निवेश (2025–30): प्रतिदिन $1 अरब।
  • UNCCD COP16 (2024, रियाद, सऊदी अरब): भूमि पुनर्स्थापन हेतु $12 अरब की प्रतिज्ञा; भारत ने अरावली ग्रीन वॉल पहल प्रदर्शित की।
  • थीम (2026): ‘भूमि का पुनर्स्थापन, आशा का पुनर्स्थापन’।
  • अपेक्षित परिणाम: प्रतिबद्धताओं को क्रियान्वयन में बदलना और संवेदनशील क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना।

अन्य संस्थागत तंत्र

  • बॉन चैलेंज (2011): 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर भूमि पुनर्स्थापित करने का वैश्विक संकल्प।
  • कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा: लक्ष्य 2 और 11 भूमि पुनर्स्थापन पर केंद्रित।
  • पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन पर संयुक्त राष्ट्र दशक (2021–30): UNEP-FAO की संयुक्त पहल।
  • G20 वैश्विक भूमि पहल: भारत की G20 अध्यक्षता (2022) के अनुरूप, 2040 तक क्षरित भूमि को 50% तक घटाने का लक्ष्य।

स्रोत: DTE

 

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