युद्ध और तेल कीमतें: वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं भारत पर प्रभाव

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • मध्य पूर्व अर्थात् पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और घरेलू अर्थव्यवस्था के परस्पर संबंधों को उजागर करता है।
  • ईंधन की कीमतों में मामूली वृद्धि भी जनमत, राजनीतिक निर्णयों और वैश्विक आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

तेल एक सामरिक वस्तु के रूप में

  • तेल आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह परिवहन को ऊर्जा प्रदान करता है, उद्योगों को संचालित करता है और वैश्विक व्यापार नेटवर्क को सहारा देता है।
  • आपूर्ति में किसी भी व्यवधान का सीधा प्रभाव मूल्य अस्थिरता और मुद्रास्फीति पर पड़ता है।
  • ऐतिहासिक रूप से, मध्य पूर्व के युद्धों ने बड़े तेल आघात उत्पन्न किए हैं।
    • 1973 अरब तेल प्रतिबंध,
    • 1980 के दशक का ईरान–इराक युद्ध,
    • 1991 का खाड़ी युद्ध — इन सभी ने वैश्विक तेल कीमतों में तीव्र वृद्धि की।
  • समकालीन संघर्ष भी इसी पैटर्न को दर्शाते हैं। तेल मूल्य आघातों का आर्थिक वृद्धि और वित्तीय बाज़ारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है, विशेषकर ऊर्जा-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में।
  • उदाहरण: अमेरिका में पेट्रोल $3 प्रति गैलन से बढ़कर लगभग $3.40 हुआ।
  • ब्रेंट क्रूड तेल 2026 की शुरुआत में $60 प्रति बैरल से बढ़कर लगभग $120 तक पहुँचा और फिर $88 के आसपास स्थिर हुआ।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व

  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य (ईरान और ओमान के बीच स्थित, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर एवं व्यापक हिंद महासागर से जोड़ता है) विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है।
  • वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी संकरे मार्ग से होकर गुजरता है।
    • किसी भी व्यवधान से वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि हो सकती है।
  • ईरान ने जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करने की चेतावनी दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

प्रमुख प्रभाव

  • युद्ध का छिपा संकेतक के रूप में तेल कीमतें: ईंधन कीमतों में मध्यम वृद्धि भी राजनीतिक परिणाम उत्पन्न करती है क्योंकि ऊर्जा कीमतें सीधे मुद्रास्फीति, परिवहन लागत और उपभोक्ता भावना को प्रभावित करती हैं।
    • तेल मूल्य आघात का वैश्विक आर्थिक वृद्धि और वित्तीय स्थिरता पर गहरा प्रभाव पड़ता है, विशेषकर भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान।
  • बाज़ार अस्थिरता और ऊर्जा कीमतें: वैश्विक स्तर पर बाज़ार कई कारकों पर प्रतिक्रिया करते हैं, जैसे तेल उत्पादन सुविधाओं पर खतरे, शिपिंग मार्गों में व्यवधान, तेल निर्यातक देशों पर प्रतिबंध और ऊर्जा बाज़ारों में सट्टेबाज़ी।
    • तेल कीमतों में अचानक वृद्धि से ईंधन कीमतें, परिवहन लागत और वैश्विक मुद्रास्फीति तीव्रता से बढ़ जाती है।
  • उभरता गैस संकट: तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और घरेलू उपभोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
    • क़तर जैसे LNG निर्यातक (जो वैश्विक LNG का लगभग 20% उत्पादन करता है) किसी भी उत्पादन या शिपिंग व्यवधान से वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।
    • परिणामस्वरूप रसोई गैस की कमी, विद्युत लागत में वृद्धि और विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव उत्पन्न हो सकता है।
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
    • मुद्रास्फीति दबाव: ईंधन कीमतों में वृद्धि परिवहन, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ाती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं।
    • धीमी आर्थिक वृद्धि: ऊर्जा मूल्य आघात उपभोक्ता व्यय को कम करते हैं और उत्पादन लागत बढ़ाते हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि धीमी होती है।
    • वित्तीय बाज़ार अनिश्चितता: ऊर्जा कीमतों की अस्थिरता शेयर बाज़ारों में अस्थिरता उत्पन्न कर सकती है, विशेषकर ऊर्जा आयातक अर्थव्यवस्थाओं में।
    • व्यापार असंतुलन: तेल आयात करने वाले देशों का आयात बिल बढ़ता है, जिससे चालू खाते का संतुलन बिगड़ता है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा चुनौती

  • भारत विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और अपने तेल का बड़ा भाग आयात करता है।
  • भारत की लगभग 85% कच्चे तेल की आवश्यकता आयात से पूरी होती है।
  • इन आयातों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।
  • परिणामस्वरूप, क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
  • भारत के लिए प्रमुख चिंताएँ: 
    • बढ़ती तेल कीमतें आयात बिल को बढ़ाती हैं।
    • उच्च ईंधन कीमतें घरेलू मुद्रास्फीति में योगदान करती हैं।
    • ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक वृद्धि को खतरे में डालते हैं।

भारत का संबद्ध जोखिमों को कम करने का प्रयास

  • आयात स्रोतों का विविधीकरण: भारत ने अपने कच्चे तेल आयात को पारंपरिक पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं से आगे बढ़ाकर रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और अफ्रीकी देशों तक विस्तारित किया है।
    • आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता को कम करता है और भू-राजनीतिक जोखिमों को प्रबंधित करने में सहायता करता है।
  • सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR): भारत ने विशाखापट्टनम, मंगलूरु और पडूर में सामरिक पेट्रोलियम भंडार स्थापित किए हैं, ताकि आपातकालीन उपयोग हेतु कच्चा तेल संग्रहित किया जा सके।
    • ये भंडार अचानक आपूर्ति व्यवधान या तीव्र मूल्य वृद्धि के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
  • विदेशी ऊर्जा निवेश: ओएनजीसी विदेश लिमिटेड जैसी कंपनियों के माध्यम से भारत विदेशों में तेल एवं गैस क्षेत्रों में निवेश करता है।
    • ये निवेश दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने और वैश्विक बाज़ार आघातों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने में सहायक होते हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा का संवर्धन: तथा भारत सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विस्तार कर रहा है, ताकि आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ हो।
  • वैकल्पिक ईंधन और ऊर्जा दक्षता: एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम और विद्युत वाहनों को बढ़ावा देने जैसी नीतियाँ परिवहन क्षेत्र में तेल की खपत को कम करने का लक्ष्य रखती हैं।
  • ऊर्जा कूटनीति: भारत प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ सक्रिय रूप से संलग्न रहता है, ताकि दीर्घकालिक अनुबंधों और सामरिक साझेदारियों के माध्यम से स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

निष्कर्ष

  • खाड़ी क्षेत्र का संघर्ष यह दर्शाता है कि ऊर्जा बाज़ार प्रायः युद्धों के वास्तविक प्रभाव को निर्धारित करते हैं। तेल कीमतें, गैस आपूर्ति व्यवधान और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे सामरिक समुद्री मार्ग क्षेत्रीय संघर्षों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ते हैं।
  • भारत जैसे देशों के लिए यह संकट ऊर्जा विविधीकरण, सामरिक भंडार और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा योजना की तात्कालिक आवश्यकता को अधिक सुदृढ़ करता है।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न:] भारत की ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा में होर्मुज़ जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक महत्व पर चर्चा कीजिए। मध्य पूर्व में होने वाले संघर्ष वैश्विक तेल बाज़ारों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?

स्रोत: BL

 

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