भारत की ‘लीकी पाइपलाइन (leaky pipeline)’ समस्या

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी

समाचारों में  

  • हाल ही में यह देखा गया है कि वैश्विक स्तर पर महिलाएँ STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) में कम प्रतिनिधित्व रखती हैं। इस समस्या को प्रायः “लीकी पाइपलाइन” कहा जाता है।

परिचय

  • शिक्षा तक पहुँच में प्रगति के बावजूद, वैश्विक स्तर पर और भारत में महिलाएँ STEM में उल्लेखनीय रूप से कम प्रतिनिधित्व रखती हैं।
  • विश्व स्तर पर महिलाएँ केवल 35% STEM स्नातक और 40% STEM पीएचडी अर्जित करती हैं।
  • 146 देशों के आँकड़ों के आधार पर, महिला वैज्ञानिक STEM कार्यबल का केवल 30% हिस्सा हैं, जिसमें शैक्षणिक रोजगार और संकाय पद शामिल हैं।
    • STEM शिक्षा और करियर के विभिन्न चरणों में महिलाओं की इस व्यवस्थित कमी को सामान्यतः ‘लीकी पाइपलाइन’ कहा जाता है।

भारतीय परिदृश्य  

  • भारत विश्व स्तर पर महिला STEM स्नातकों का सबसे अधिक प्रतिशत रखता है — स्नातक स्तर पर 43% महिला विज्ञान स्नातक और परास्नातक व डॉक्टरेट स्तर पर लगभग 50%।
  • 2025 में, भारत में अधिक लड़कियों ने कक्षा XII विज्ञान उत्तीर्ण किया, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर महिला STEM स्नातकों का सबसे अधिक अनुपात प्राप्त हुआ।
  • हालाँकि, अनुसंधान रोजगारों, संकाय पदों और नेतृत्व भूमिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व “लीकी पाइपलाइन” प्रभाव के कारण असमान रूप से कम है।
    • भारत की राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंसियों में महिला वैज्ञानिकों का प्रतिशत 30% से कम है।
    • सबसे अधिक प्रतिनिधित्व भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) में 29% और सबसे कम रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में 14% है।
    • भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु में महिला संकाय केवल 8% और IITs में महिला वैज्ञानिक 11-13% हैं।

कम प्रतिनिधित्व के कारण 

  • सामाजिक चुनौतियाँ: परिवार की अपेक्षाएँ कि महिलाएँ “स्थिर” हों, बच्चे पैदा करें और घरेलू जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दें।
    •  विवाह के बाद स्थानांतरण अनुसंधान रोजगारों तक पहुँच को सीमित करता है।
  • संरचनात्मक चुनौतियाँ: सरकारी भर्ती में कठोर आयु सीमा और भौगोलिक प्रतिबंध।
    • दूरस्थ कार्य या लचीले अनुसंधान पदों की सीमित उपलब्धता।
  • प्रणालीगत चुनौतियाँ: भर्ती प्रक्रियाएँ असंगत हैं; लैंगिक समानता पहल प्रायः पैमाने, प्रोत्साहन या जवाबदेही से रहित होती हैं।
    • महिलाएँ प्रायः अल्पकालिक, संविदात्मक या अस्थिर पदों पर सीमित लाभ, पदोन्नति और करियर वृद्धि के साथ कार्य करती हैं।

प्रभाव 

  • आर्थिक हानि: प्रतिभा के आधे भाग का अपर्याप्त उपयोग नवाचार और उत्पादकता को कम करता है।
  • वैज्ञानिक अंतराल: अनुसंधान दृष्टिकोणों में विविधता की कमी संकीर्ण समस्या-समाधान पद्धतियों को जन्म देती है।
  • सामाजिक असमानता: आय, स्थिति और अवसरों में लैंगिक असमानताओं को सुदृढ़ करता है।

सरकारी कदम 

  • WISE-KIRAN (2018): महिलाओं को विज्ञान और अभियांत्रिकी में अग्रणी अनुसंधान करने हेतु प्रोत्साहित करता है, सामाजिक चुनौतियों पर केंद्रित एवं विज्ञान-प्रौद्योगिकी आधारित इंटर्नशिप व स्वरोजगार को बढ़ावा देता है।
  • विज्ञान ज्योति कार्यक्रम (Vigyan Jyoti): लड़कियों को STEM में उच्च शिक्षा और करियर अपनाने हेतु प्रोत्साहित करता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ महिलाओं की भागीदारी कम है।
  • GATI (संस्थाओं के रूपांतरण हेतु लैंगिक उन्नति): STEMM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी, गणित एवं चिकित्सा) में लैंगिक समानता हेतु स्वदेशी चार्टर विकसित करने का उद्देश्य, संस्थागत स्तर पर परिवर्तनकारी बदलाव लाने पर केंद्रित।
  • BioCARe फेलोशिप: जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में महिलाओं के करियर पुनःप्रवेश और सतत भागीदारी को सुगम बनाती है।
  • CSIR-ASPIRE (2023): महिला-नेतृत्व वाले अनुसंधान को बढ़ावा देने और उनके करियर उन्नयन को सुदृढ़ करने हेतु विशेष अनुसंधान अनुदान योजना।

निष्कर्ष एवं आगे की राह 

  • भारत ने STEM शिक्षा में महिला भागीदारी को सुदृढ़ किया है, परंतु अनुसंधान और नेतृत्व में उनकी स्थिरता चुनौती बनी हुई है।
  • संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना, सरकारी योजनाओं का विस्तार करना और सांस्कृतिक परिवर्तन को बढ़ावा देना आवश्यक है ताकि महिलाएँ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के भविष्य को समान रूप से आकार दे सकें।

स्रोत :TH

 

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