पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘सुदृढ़ देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र’ के निर्माण का प्रस्ताव किया गया है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय कौशल योग्यता रूपरेखा (NSQF) के अनुरूप कार्यक्रमों के माध्यम से 1.5 लाख बहु-कौशलयुक्त देखभालकर्ताओं को वृद्धजन देखभाल, मूल देखभाल तथा सहायक कौशलों में प्रशिक्षित किया जाएगा।
देखभाल कार्य क्या है?
- देखभाल कार्य मुख्यतः दो परस्पर जुड़ी गतिविधियों से मिलकर बनता है:
- प्रत्यक्ष, व्यक्तिगत और संबंधपरक देखभाल गतिविधियाँ, जैसे शिशु को भोजन कराना।
- अप्रत्यक्ष देखभाल गतिविधियाँ, जैसे खाना पकाना और सफाई करना।
- अवैतनिक देखभाल एवं घरेलू कार्य, जैसे बीमार जीवनसाथी की सेवा करना या परिवार के सदस्य के लिए भोजन बनाना, बिना किसी आर्थिक प्रतिफल के किया जाने वाला देखभाल कार्य है।
- वेतनभोगी देखभाल कार्य, जैसे घरेलू सेवाएँ, घरेलू कामगारों द्वारा प्रतिफल के बदले किया जाने वाला कार्य है।

- भविष्य की संभावनाएँ : अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के प्रमाणों से संकेत मिलता है कि देखभाल सेवाओं के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने से वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर 475 मिलियन रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं।
- भारत के संदर्भ में, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2% के बराबर प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश से लगभग 1.1 करोड़ रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें से लगभग 70% महिलाओं को प्राप्त होंगे।
भारत में देखभाल कार्य अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ
- अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र: वेतनभोगी देखभाल कार्य का बड़ा हिस्सा (घरेलू कामगार, देखभालकर्ता, बाल देखभाल कार्यकर्ता) अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है।
- इन कामगारों को रोजगार की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा का अभाव है।
- अपर्याप्त सार्वजनिक अवसंरचना: बाल देखभाल केंद्रों, वृद्धजन देखभाल सुविधाओं और दिव्यांगजन सहायता सेवाओं की कमी है।
- कौशल एवं प्रशिक्षण की कमी: अनेक देखभालकर्ताओं के पास औपचारिक प्रशिक्षण और व्यावसायिक प्रमाणन नहीं है तथा कौशल विकास पहलों की संख्या सीमित है।
- जनसांख्यिकीय दबाव: वृद्ध होती जनसंख्या और बढ़ती स्वास्थ्य आवश्यकताएँ देखभाल सेवाओं की माँग को बढ़ा रही हैं, जबकि वर्तमान प्रणाली भविष्य की माँगों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है।
सरकारी पहल
- एकीकृत बाल विकास सेवाएँ (ICDS): 1975 में प्रारंभ, आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रारंभिक बाल देखभाल, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करती है।
- यह बच्चों (0–6 वर्ष), गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को लक्षित करता है।
- यह पूरक पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य जाँच और पूर्व-स्कूली शिक्षा प्रदान करता है।
- पोषण अभियान : महिलाओं और बच्चों में ठिगनापन, कुपोषण एवं रक्ताल्पता कम करने पर केंद्रित।
- व्यवहारात्मक परिवर्तन, प्रौद्योगिकी (POSHAN Tracker) के उपयोग तथा स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं के अभिसरण को बढ़ावा देता है।
- मिशन शक्ति : महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा हेतु समग्र कार्यक्रम। इसमें बाल देखभाल सेवाओं और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को समर्थन देने वाली योजनाएँ शामिल हैं।
- इसमें बच्चों की देखभाल की सेवाओं और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को सहायता देने वाली योजनाएँ शामिल हैं।
- पालना योजना : 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए डे-केयर सुविधा प्रदान करती है। पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा समर्थन उपलब्ध कराती है।
- यह पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा में सहायता प्रदान करता है, जिससे माताओं को कार्यबल में शामिल होने में मदद मिलती है।
- यह केंद्र और राज्य सरकारों के वित्तीय सहयोग से ‘मिशन शक्ति’ के अंतर्गत संचालित होता है।
- मिशन वात्सल्य: बाल संरक्षण सेवाओं पर केंद्रित, जिसमें गोद लेना, पालक देखभाल और असुरक्षित बच्चों का पुनर्वास शामिल है।
- संस्थागत और गैर-संस्थागत बाल देखभाल प्रणालियों को सुदृढ़ करता है।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करता है, जिसमें टीकाकरण और संस्थागत प्रसव शामिल हैं।
- महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करता है।
आगे की राह
- भारत की जनसांख्यिकीय संरचना 2020 से 2050 के बीच बदलने की संभावना है, जिससे बाल देखभाल के साथ-साथ वृद्धजन देखभाल की आवश्यकता भी बढ़ेगी।
- 2050 तक वृद्धजन की जनसंख्या का अनुपात 20.8% होने की संभावना है, अर्थात लगभग 34.7 करोड़ व्यक्ति।
- देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने से न केवल महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी में लैंगिक अंतर कम होगा, बल्कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक नए आर्थिक क्षेत्र का द्वार खुलेगा, जिससे देखभाल सेवाओं के क्षेत्र में आर्थिक उत्पादन और रोजगार में वृद्धि होगी।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 07-03-2026
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