भारत की अफ्रीका नीति को समय-समय पर आयोजित शिखर सम्मेलनों के बजाय निरंतर और सतत सहभागिता की आवश्यकता 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • चौथा भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (IAFS IV) मई 2026 में आयोजित होने वाला है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि अफ्रीका वैश्विक शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा है।
  • भारत अफ्रीकी प्राथमिकताओं के अनुरूप अधिक संस्थागत और प्रक्रिया-आधारित साझेदारी के माध्यम से अफ्रीका के साथ अपने जुड़ाव को पुनर्जीवित करना चाहता है।

भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (IAFS) के बारे में

  • यह भारत और अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग का प्रमुख मंच है। इसे राजनीतिक, आर्थिक, विकासात्मक एवं रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए प्रारंभ किया गया था।
  • इसका उद्देश्य दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना, व्यापार, निवेश और क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करना, अफ्रीकी विकास प्राथमिकताओं का समर्थन करना तथा वैश्विक मुद्दों पर बहुपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करना है।

विकास एवं पूर्व शिखर सम्मेलन

  • प्रथम भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (2008): नई दिल्ली, भारत
    • विषय: साझा विकास हेतु साझेदारी
    • प्रमुख परिणाम:
      • क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास पर ध्यान
      • रियायती ऋण रेखाओं (LoCs) की शुरुआत
      • पैन-अफ्रीकी ई-नेटवर्क परियोजनाओं का विस्तार
  • द्वितीय भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (2011): अदीस अबाबा, इथियोपिया
    • महत्व:
      • अफ्रीकी संघ (AU) के साथ संस्थागत सहयोग को सुदृढ़ किया गया
      • कृषि, अवसंरचना और शिक्षा पर अधिक ध्यान
    • प्रमुख पहल:
      • शांति स्थापना और सुशासन के लिए समर्थन
      • ITEC के अंतर्गत छात्रवृत्तियाँ और प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • तृतीय भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (2015): नई दिल्ली, भारत
    • विशेषताएँ: सभी 54 अफ्रीकी देशों की भागीदारी
    • भारत की घोषणाएँ:
      • $10 बिलियन ऋण रेखाएँ
      • $600 मिलियन अनुदान सहायता
      • पाँच वर्षों में 50,000 छात्रवृत्तियाँ
    • प्रमुख क्षेत्र: नीली अर्थव्यवस्था, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य एवं औषधि, तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग

वर्तमान स्थिति

  • चौथा भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (IAFS IV) मूलतः 2020 में होना था, किंतु विलंबित हो गया। इस बीच अफ्रीका की रणनीतिक साझेदारियाँ तीव्रता से विविधीकृत हो गई हैं।
    • भारत अब चीन (FOCAC), यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जर्मनी से अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है।
  • भारत का लक्ष्य IAFS को एक समय-समय पर होने वाले शिखर सम्मेलन से सतत् रणनीतिक जुड़ाव के ढाँचे में परिवर्तित करना है।

भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन का महत्व

  • रणनीतिक महत्व: अफ्रीका भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) में एक महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक स्थिति रखता है।
  • सहयोग भारत की समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती-रोधी अभियानों और आतंकवाद-रोधी प्रयासों में भूमिका को सुदृढ़ करता है।
  • यह भारत के “सागर” सिद्धांत और इंडो-पैसिफिक रणनीति से संबंधित है।
  • आर्थिक अवसर: अफ्रीका में महत्वपूर्ण खनिज, तेल एवं गैस, दुर्लभ पृथ्वी तत्व प्रचुर मात्रा में हैं।
  • भारत-अफ्रीका द्विपक्षीय व्यापार $100 बिलियन से अधिक है।
  • प्रमुख क्षेत्र: नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अवसंरचना और कृषि।
  • ऊर्जा एवं संसाधन सुरक्षा: अफ्रीका ऊर्जा विविधीकरण के लिए आवश्यक है।
  • हरित प्रौद्योगिकियों हेतु लिथियम, कोबाल्ट और ताँबे की आपूर्ति सुनिश्चित करने में अफ्रीका की भूमिका अहम है।
  • विकास साझेदारी: भारत का मॉडल चीन के ऋण-आधारित अवसंरचना दृष्टिकोण से भिन्न है।
  • भारत की क्षमताएँ: क्षमता निर्माण, कौशल विकास, सुलभ स्वास्थ्य सेवा एवं औषधि, तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)।
  • उदाहरण: UPI जैसी डिजिटल प्रणालियाँ, टेलीमेडिसिन, ई-विद्याभारती और ई-आरोग्यभारती पहल।
  • बहुपक्षीय सहयोग: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधार, जलवायु वार्ता, WTO मुद्दों और वैश्विक दक्षिण एकजुटता के लिए अफ्रीका का समर्थन महत्वपूर्ण है।
  • भारत और अफ्रीका जलवायु न्याय, विकास वित्त और प्रौद्योगिकी तक पहुँच जैसे समान चिंताओं को साझा करते हैं।

मुख्य मुद्दे और चिंताएँ

  • संस्थागत निरंतरता का अभाव: भारत-अफ्रीका जुड़ाव प्रायः शिखर सम्मेलन-केंद्रित रहता है। सुदृढ़ अंतर-शिखर निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति कार्यान्वयन को कमजोर करती है और प्रतिबद्धताओं तथा वास्तविक उपलब्धियों के बीच अंतर उत्पन्न कर सकती है।
  • अफ्रीका में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा: चीन का फ़ोरम ऑन चाइना-अफ्रीका कोऑपरेशन (FOCAC) अत्यधिक संस्थागत है।
    • अन्य सक्रिय खिलाड़ी हैं: EU-अफ्रीका शिखर सम्मेलन, जापान का TICAD, और कोरिया-अफ्रीका पहलें। 
    • भारत को ‘एपिसोडिक’ (अवसरीय) साझेदार के रूप में देखा जाने का जोखिम है, न कि ‘रणनीतिक’ साझेदार के रूप में।
  • क्षेत्रीय जुड़ाव की कमजोरी: भारत का पूर्व तीन-स्तरीय अफ्रीका ढाँचा — द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और पैन-अफ्रीकी — समय के साथ कमजोर हुआ है।
    • इसका कारण अफ्रीकी संघ आयोग (AUC) और क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों (RECs) के साथ सीमित जुड़ाव है।
  • व्यापार और संपर्क चुनौतियाँ: कम संपर्क, लॉजिस्टिक बाधाएँ, और चीन की तुलना में भारतीय निजी क्षेत्र का सीमित निवेश।
  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब: कई ऋण रेखाएँ और अवसंरचना परियोजनाएँ नौकरशाही विलंब, वित्तीय बाधाओं और समन्वय चुनौतियों का सामना करती हैं।
  • उभरते क्षेत्रों का अपर्याप्त उपयोग: नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सुदृढ़ संस्थागत सहयोग की आवश्यकता है।

आगे की राह: भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन को सुदृढ़ करना

  • शिखर सम्मेलनों से परे जुड़ाव का संस्थाकरण: भारत को वार्षिक भारत-अफ्रीका रणनीतिक संवाद आयोजित करना चाहिए, AUC अध्यक्ष को नियमित रूप से आमंत्रित करना चाहिए, और AU के घूर्णन अध्यक्ष को राजकीय दौरे हेतु आमंत्रित करना चाहिए। इससे निरंतरता एवं राजनीतिक दृश्यता सुनिश्चित होगी।
  • तीन-स्तरीय अफ्रीका ढाँचे का पुनर्जीवन: द्विपक्षीय कूटनीति को सुदृढ़ करना, RECs के माध्यम से क्षेत्रीय जुड़ाव बढ़ाना, और AU संस्थाओं के साथ पैन-अफ्रीकी सहयोग को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
  • मध्य-चक्र समीक्षा तंत्र की स्थापना: भारत-अफ्रीका समीक्षा बैठकों और नई दिल्ली व अदीस अबाबा में राजनयिक परामर्श के माध्यम से नियमित निगरानी।
    • इससे कार्यान्वयन और जवाबदेही में सुधार होगा।
  • अफ्रीकी प्राथमिकताओं पर ध्यान: जैसा कि भारत के प्रधानमंत्री ने युगांडा (2018) में कहा था — “अफ्रीका की प्राथमिकताएँ भारत की साझेदारी का मार्गदर्शन करेंगी।”
    • भारत को अफ्रीकी संघ के एजेंडा 2063, जलवायु लचीलापन, खाद्य सुरक्षा और युवाओं के रोजगार के साथ सहयोग को संरेखित करना चाहिए।
  • डिजिटल और विकास सहयोग का विस्तार: भारत अपने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना अनुभव, आधार जैसी प्रणालियाँ, फिनटेक समावेशन और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा सकता है।
    • इससे जन-केंद्रित विकास साझेदारी बनेगी।
  • आर्थिक जुड़ाव को सुदृढ़ करना: तीव्रता से ऋण रेखाओं का क्रियान्वयन, निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना, भारत-अफ्रीका व्यापार गलियारों का विस्तार करना, और अफ्रीका में स्थानीय विनिर्माण का समर्थन करना।

निष्कर्ष

  • चौथा भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन ऐसे भू-राजनीतिक क्षण में हो रहा है जब अफ्रीका वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन रहा है। भारत को गंभीर ऐतिहासिक सद्भावना प्राप्त है जो उपनिवेश-विरोधी एकजुटता, दक्षिण-दक्षिण सहयोग और विकासात्मक साझेदारी पर आधारित है।
  • भारत को शिखर सम्मेलन-आधारित कूटनीति से आगे बढ़कर सतत् संस्थागत जुड़ाव की ओर बढ़ना होगा, जो कार्यान्वयन, निरंतरता और अफ्रीकी प्राथमिकताओं के प्रति उत्तरदायित्व पर आधारित हो।
  • यदि IAFS IV को प्रभावी ढंग से पुनर्गठित किया जाए, तो यह भारत-अफ्रीका संबंधों को वैश्विक दक्षिण के लिए एक विश्वसनीय, समकालीन और परस्पर लाभकारी रणनीतिक साझेदारी में रूपांतरित कर सकता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत-अफ्रीका फ़ोरम शिखर सम्मेलन (IAFS) के महत्व का परीक्षण कीजिए कि यह किस प्रकार अफ्रीका में भारत के रणनीतिक और विकासात्मक हितों को आगे बढ़ाता है। भारत-अफ्रीका जुड़ाव की प्रभावशीलता को सीमित करने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। 

स्रोत: IE

 

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