भारत का जल संकट एवं जल संसाधन शासन 

पाठ्यक्रम: GS3/संसाधन

संदर्भ

  • जैसा कि भारत एसडीजी-6 (स्वच्छ जल एवं स्वच्छता) को प्राप्त करने और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की अपनी दृष्टि को साकार करने का लक्ष्य रखता है, जल शासन को सुदृढ़ करना आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

भारत का जल विरोधाभास: प्रचुरता के बीच अभाव

  • भारत विश्व की लगभग 18% जनसंख्या का पोषण करता है, जबकि इसके पास विश्व के केवल लगभग 4% स्वच्छ जल संसाधन हैं। नीति आयोग की संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक (2018) के अनुसार:
    • लगभग 600 मिलियन भारतीय उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं।
    • लगभग 21 प्रमुख शहरों में भूजल समाप्त होने का जोखिम है।
    • 2030 तक जल की मांग आपूर्ति से अधिक होने का अनुमान है।
  • साथ ही, भारत को प्रतिवर्ष लगभग 4,000 बिलियन घन मीटर (बीसीएम) वर्षा प्राप्त होती है।
    • किन्तु केवल लगभग 1,100 बीसीएम ही उपयोग योग्य माना जाता है, क्योंकि भंडारण अवसंरचना अपर्याप्त है, वर्षा का भौगोलिक वितरण असमान है, मानसून वर्षा का मौसमी संकेंद्रण है, तथा पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय सीमाएँ हैं।
  • अतः संकट जल की उपलब्धता से अधिक उसके कुशल प्रबंधन का है।

घटती प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता

  • जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव: भारत की प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में तीव्र गिरावट आई है—1951 में 5,000 घन मीटर से अधिक; वर्तमान में लगभग 1,400 घन मीटर।
    • यह गिरावट जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तनशीलता से प्रेरित है।                                   
    • भारत जल तनाव की सीमा (1,700 घन मीटर) के निकट पहुँच रहा है और शीघ्र ही जल अभाव श्रेणी (1,000 घन मीटर से कम) में प्रवेश कर सकता है।
  • भूजल संकट: भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता है, जो वैश्विक निकासी का लगभग 25% है।
    • भूजल ने हरित क्रांति-प्रेरित कृषि विस्तार, ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और आजीविका सुरक्षा को सक्षम बनाया।
    • किन्तु अत्यधिक दोहन से जल स्तर गिर रहा है, कुएँ सूख रहे हैं, भूमि धँस रही है और जल गुणवत्ता खराब हो रही है।
    • पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और कर्नाटक के कुछ हिस्से गंभीर भूजल क्षय का सामना कर रहे हैं।
    • यह इंगित करता है कि भारत की जल चुनौती मूलतः एक संस्थागत एवं शासन संकट है।

भारत में जल शासन की संस्थागत संरचना

  • संवैधानिक एवं संघीय ढाँचा: संविधान की अनुसूची VII के अंतर्गत जल मुख्यतः राज्य सूची का विषय है। तथापि, संघ सरकार समन्वय एवं नीतिगत सहयोग की भूमिका निभाती है।
  • प्रमुख संस्थाएँ:
    • जल शक्ति मंत्रालय: जल संसाधन, पेयजल एवं स्वच्छता का नोडल मंत्रालय। इसे जल संसाधन एवं पेयजल मंत्रालयों के विलय से बनाया गया।
    • केंद्रीय जल आयोग (CWC): सतही जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, नदी बेसिन योजना और बाँध सुरक्षा पर केंद्रित।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB): भूजल संसाधनों का आकलन करता है और एक्वीफर प्रबंधन हेतु वैज्ञानिक सुझाव प्रदान करता है।
    • नीति आयोग: जल शासन में प्रतिस्पर्धी एवं सहयोगात्मक संघवाद को बढ़ावा देने हेतु संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) प्रस्तुत किया।

प्रमुख सरकारी पहलें

  • जल जीवन मिशन (JJM): 2019 में ग्रामीण परिवारों को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTCs) प्रदान करने हेतु प्रारंभ।
    • यह ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को सुदृढ़ करता है, महिलाओं पर भार घटाता है और विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को सुदृढ़ करता है। 
    • मिशन को अब 2028 तक विस्तारित किया गया है।
  • अटल भूजल योजना (ATAL JAL): जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सतत भूजल प्रबंधन पर केंद्रित। इसके प्रमुख घटक हैं—सामुदायिक भागीदारी, जल बजटिंग, एक्वीफर मानचित्रण और व्यवहार परिवर्तन।
    • यह आपूर्ति-पक्ष से माँग-पक्ष प्रबंधन की ओर बदलाव को दर्शाता है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसका उद्देश्य है ‘प्रति बूंद अधिक फसल’। इसके घटक हैं—सूक्ष्म सिंचाई, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर प्रणाली, तथा जल-कुशल कृषि।
    • सिंचाई दक्षता अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कृषि भारत के लगभग 80% मीठे जल का उपभोग करती है।
  • अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT): शहरी जल आपूर्ति सुधारने, सीवेज उपचार प्रणाली विकसित करने और अपशिष्ट जल पुनः उपयोग को बढ़ावा देने का लक्ष्य।
    • शहरी भारत तीव्र जनसंख्या वृद्धि और प्रदूषण से बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम: एकीकृत नदी पुनरुद्धार कार्यक्रम, जो प्रदूषण नियंत्रण, सीवेज उपचार, जैव विविधता संरक्षण और नदी तट विकास पर केंद्रित है।
    • यह नदी शासन हेतु बेसिन-आधारित दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है।

जल शासन में चुनौतियाँ

  • संस्थागत विखंडन: सिंचाई, पेयजल, भूजल, स्वच्छता और शहरी जल आपूर्ति जैसी सेवाओं का प्रबंधन अनेक एजेंसियों द्वारा किया जाता है।
    • इससे नीतिगत अतिक्रमण, समन्वय की विफलता और कमजोर जवाबदेही उत्पन्न होती है।
  • अंतर्राज्यीय जल विवाद: कावेरी विवाद, कृष्णा जल विवाद और रावी-बीस संघर्ष जैसे उदाहरण जल साझेदारी में सहयोगात्मक संघवाद की सीमाओं को दर्शाते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: बदलते वर्षा पैटर्न बाढ़, सूखा और चरम मौसम घटनाओं को बढ़ा रहे हैं। इससे जलवायु-संवेदनशील जल शासन की आवश्यकता है।
  • प्रदूषण एवं जल गुणवत्ता: सीपीसीबी की रिपोर्टों के अनुसार, नदियाँ अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के कारण अत्यधिक प्रदूषित हैं; वहीं भूजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रदूषण कई राज्यों को प्रभावित करता है।

आगे की राह: सर्कुलर जल अर्थव्यवस्था की ओर

  • एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) की आवश्यकता: भारत को रैखिक “उपयोग और त्याग” मॉडल से परिपत्र जल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा।
  • मुख्य उपाय:
    • अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण: उपचारित अपशिष्ट जल का उद्योग और कृषि में पुनः उपयोग; तथा स्वच्छ जल की माँग में कमी।
    • कुशल सिंचाई: फसल विविधीकरण, जल-कुशल फसलें और सटीक कृषि।
    • वर्षा जल संचयन: शहरी छत प्रणालियाँ और पारंपरिक तालाबों एवं कुओं का पुनर्जीवन।
    • प्रौद्योगिकीय नवाचार: स्मार्ट मीटरिंग, जीआईएस मानचित्रण, आईओटी-आधारित निगरानी और एक्वीफर मानचित्रण।
    • सामुदायिक भागीदारी: पंचायत-नेतृत्व वाला जल शासन, स्थानीय जल बजटिंग और सहभागी भूजल प्रबंधन।
  • भारत का जल भविष्य केवल वर्षा पर नहीं, बल्कि शासन सुधारों पर निर्भर करता है। इसके लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
    • नदी बेसिन प्रबंधन प्राधिकरणों को सुदृढ़ करना
    • केंद्र-राज्य समन्वय को बढ़ाना
    • आँकड़ा-आधारित नीतिनिर्माण को प्रोत्साहित करना
    • जल उपयोग में व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देना
    • जल योजना में जलवायु अनुकूलन को एकीकृत करना
    • अपशिष्ट जल पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण का विस्तार करना
    • शहरी जल अवसंरचना में सुधार करना
  • एक सतत एवं न्यायसंगत जल शासन ढाँचा एसडीजी-6, खाद्य सुरक्षा, जनस्वास्थ्य, आर्थिक लचीलापन और पर्यावरणीय स्थिरता प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न:] भारत में जल संसाधन शासन से संबंधित प्रमुख मुद्दों पर चर्चा कीजिए। सतत एवं न्यायसंगत जल प्रबंधन सुनिश्चित करने में हाल की सरकारी पहलों की प्रभावशीलता का परीक्षण कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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