वैश्विक आर्थिक जोखिम और भारत की लोचशीलता

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने संकेत दिया कि शुल्क, व्यापार प्रतिबंधों और औद्योगिक नीतियों से प्रेरित भू-आर्थिक विखंडन (GEF) न केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्गठित कर रहा है, बल्कि पूँजी के मुक्त प्रवाह को बाधित कर वित्तीय प्रवाहों को भी खंडित कर रहा है।

भू-आर्थिक विखंडन (GEF) क्या है?

  • यह वैश्विक आर्थिक एकीकरण के उलट जाने की वह प्रक्रिया है, जो रणनीतिक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक कारणों से संचालित होती है, न कि केवल आर्थिक कारकों से।
  • यह व्यापार, प्रवासन, पूँजी प्रवाह और प्रौद्योगिकी प्रसार जैसे आर्थिक संपर्क के माध्यमों को प्रभावित करता है।
  • यह बाजार शक्तियों से उत्पन्न स्वाभाविक वैश्वीकरण-ह्रास से भिन्न है, क्योंकि यह राज्यों द्वारा नीति-निर्माण के माध्यम से उत्पन्न होता है, जैसे शुल्क, निर्यात नियंत्रण, औद्योगिक सब्सिडी और प्रतिबंध।
  • GEF का अर्थ है वैश्विक आर्थिक एकीकरण का एक नीति-आधारित उलटफेर, जो पूरी तरह से आर्थिक कारणों के बजाय रणनीतिक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक विचारों से निर्देशित होता है। इसे एक बहुआयामी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है, जो उन माध्यमों को उलट देती है जिनके ज़रिए देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं—जिनमें व्यापार, प्रवासन, पूंजी प्रवाह और प्रौद्योगिकी का प्रसार शामिल है।
  • बाजार शक्तियों के कारण होने वाले स्वाभाविक वैश्वीकरण-ह्रास के विपरीत, भू-आर्थिक विखंडन राज्य द्वारा संचालित होता है और यह शुल्क, निर्यात नियंत्रण, औद्योगिक अनुदान तथा प्रतिबंध जैसी जानबूझकर अपनाई गई नीतिगत कार्रवाइयों का परिणाम होता है।

भू-आर्थिक विखंडन के प्रभाव

1.वित्तीय बाजार अस्थिरता

  • इससे प्रणालीगत संकट उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे 2008 में शैडो बैंकिंग से जुड़े जोखिम।
  • एसेट प्राइस बबल्स (Asset Price Bubbles) : विशेषकर प्रौद्योगिकी शेयरों में ऊँचे मूल्यांकन सुधार के जोखिम को बढ़ाते हैं।
  • प्राइवेट क्रेडिट मार्केट का विस्तार: पारंपरिक बैंकिंग के बाहर तीव्र वृद्धि, सीमित विनियमन और औपचारिक वित्तीय संस्थानों से मजबूत संबंध।

2.व्यापक आर्थिक कमजोरियाँ

  • महामारी के बाद बढ़ा सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय समेकन में विलंब।
  • भू-राजनीतिक तनावों के कारण रक्षा व्यय में वृद्धि, जिससे विकासात्मक व्यय पर दबाव पड़ता है।

3. बाह्य क्षेत्र पर दबाव

  • ऊर्जा मूल्यों में अस्थिरता, व्यापार असंतुलन और मुद्रा उतार-चढ़ाव।
  • आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान तथा लागत-कुशलता से सुरक्षा-आधारित उत्पादन की ओर झुकाव।
  • सीमा-पार पूँजी प्रवाह में कमी और वित्त का क्षेत्रीयकरण।

4. पूँजी प्रवाह में अस्थिरता

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पोर्टफोलियो निवेश में उतार-चढ़ाव।
  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत में नई परियोजनाओं में निवेश में वृद्धि।

5. विकास दर में मंदी का जोखिम

  • उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में धीमी वृद्धि और मुद्रास्फीति नियंत्रण हेतु कठोर मौद्रिक नीतियाँ।
  • भारत की वृद्धि दर मजबूत होते हुए भी क्रमशः स्थिर होकर मध्यम स्तर पर आ रही है।

6. वित्तीय बाजार विकास की चुनौतियाँ

  • सरकारी प्रतिभूति बाजार में सीमित गहराई, डेरिवेटिव बाजार में एकाग्रता, तथा विदेशी मुद्रा बाजार में सीमित भागीदारी।

7. कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिम

  • व्यापार मॉडल की अनिश्चितता, प्रौद्योगिकी का असमान प्रसार, रोजगार में बदलाव और कौशल असंतुलन।

भू-आर्थिक विखंडन के बीच भारत की लोचशीलता

  • सरकारी आँकड़े यह दर्शाते हैं कि विविधीकृत व्यापार और सेवा निर्यात के कारण भारत ने उल्लेखनीय सहनशीलता प्रदर्शित की है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार: पर्याप्त (लगभग 11 माह के आयात के बराबर)
  • चालू खाता घाटा: नियंत्रित और प्रबंधनीय स्तर पर
  • व्यापार समझौते: बाह्य झटकों को कम करने में सहायक
  • पूँजी प्रवाह और निवेश प्रवृत्तियाँ: विशेषकर वित्त और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मजबूत प्रवाह; नई परियोजनाओं में निवेश में वृद्धि।
  • भारत का विकास प्रदर्शन: 2021–25 के दौरान औसत वृद्धि लगभग 8.2% रही, जबकि 2026–27 के लिए लगभग 6.9% का अनुमान है।
  • इसके प्रमुख प्रेरक कारक मजबूत घरेलू उपभोग, सार्वजनिक पूंजी व्यय तथा निजी निवेश को प्रोत्साहन हैं।

नीतिगत उपाय एवं आगे की राह

  • वैश्विक स्तर पर: बहुपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करना (जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन में सुधार) तथा संवाद के माध्यम से विखंडन को नियंत्रित करना आवश्यक है।
  • भारत की रणनीति: व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना, व्यापार करने में सुगमता बढ़ाना, समावेशी विकास को प्रोत्साहित करना तथा नियामक ढाँचे को मजबूत करना।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका: वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना, प्रणालीगत जोखिमों की निगरानी करना तथा समयानुकूल नीतिगत हस्तक्षेप करना।

वित्तीय बाजार का विकास:

  • सरकारी प्रतिभूति बाजार में विभिन्न अवधियों में अधिक गहराई विकसित करने की आवश्यकता है।
  • जोखिम प्रबंधन के लिए डेरिवेटिव बाजार का विविधीकरण किया जाए।
  • विदेशी मुद्रा बाजार में व्यापक और निष्पक्ष पहुँच सुनिश्चित की जाए।
  • ऋण डेरिवेटिव साधनों का विकास और उपयोग बढ़ाया जाए।
  • बैंक और प्राथमिक डीलर बाजार निर्माता के रूप में कार्य करते हैं तथा उन्हें तरलता तक विशेष पहुँच प्राप्त होती है; अतः वैश्विक उपस्थिति बढ़ाने, बाजार दक्षता सुधारने तथा नैतिक आचरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
मुख्य प्रश्न
प्रश्न: वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते भू-आर्थिक विखंडन, वित्तीय अस्थिरता और प्रौद्योगिकीय व्यवधानों की प्रवृत्ति पर टिप्पणी कीजिए। इन चुनौतियों के बीच भारत ने किस प्रकार अपनी लोचशीलता प्रदर्शित की है?

Source: IE

 

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