पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण; जलवायु परिवर्तन
संदर्भ
- हिम और चट्टानों के हिमस्खलन के बाद नेपाल में हाल में आई बाढ़ ने तीव्रता से उष्ण हो रहे हिमालयी हिमनदों, हिमनदीय झीलों के अचानक फटने तथा भारत की जल और आर्थिक सुरक्षा पर उनके प्रभाव को लेकर चिंताएँ फिर से बढ़ा दी हैं।
हिमनदों के पिघलने के बारे में
- हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप का पारिस्थितिक आधार है, क्योंकि यह मानसून को प्रभावित करता है, जैव विविधता और तीर्थाटन आधारित अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखता है तथा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों को जल प्रदान करता है।
- हिमनद प्राकृतिक जलाशयों के रूप में कार्य करते हैं और विशेष रूप से शुष्क अवधि के दौरान पिघला हुआ जल छोड़ते हैं।
- हालाँकि, बढ़ते तापमान के कारण हिमनदों के सिकुड़ने की प्रक्रिया तीव्र हो रही है।
- हिमालयी नदी घाटियाँ इस शताब्दी के मध्य के आसपास ‘चरम जल उपलब्धता’ की स्थिति तक पहुँच सकती हैं। इसके बाद हिम के भंडार में कमी से दीर्घकाल में नदियों के प्रवाह में कमी आ सकती है।
- हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में वर्ष 2100 तक अपने वर्तमान हिमनद आयतन का 80% तक समाप्त हो सकता है।
भारत की संवेदनशीलता
- ‘एक लचीला हिमालय: जोखिमग्रस्त क्षेत्र की रक्षा और भविष्य की समृद्धि सुनिश्चित करना’ नामक 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 64.8 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधियाँ, जो वित्त वर्ष 2023–24 के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 21.5% हैं, हिमालय पर निर्भर हैं।
- यह सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली संभावित हानि का अनुमान नहीं है; बल्कि यह उन आर्थिक गतिविधियों को मापता है जो हिमालय से प्राप्त जल पर निर्भर हैं।
- इसके तीन स्तर हैं:
- प्रत्यक्ष: हिमालयी राज्यों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद।
- अप्रत्यक्ष: हिमालय से पोषित नदियों और भूजल पुनर्भरण पर निर्भर मैदानी क्षेत्रों की कृषि, विनिर्माण, जलविद्युत और सेवाएँ।
- प्रेरित: आपूर्ति शृंखला तथा मजदूरी से होने वाले व्यय के प्रभाव।
- हिमालय भारत के 18% भू-भाग में फैला है, लेकिन देश की लगभग 35% आपदाओं से संबंधित है।
हिमनदों के पिघलने के प्रमुख कारण
- वैश्विक तापन: बढ़ता तापमान हिम के क्षरण को तीव्र करता है।
- कार्बन के सूक्ष्म कण: अपूर्ण दहन से निकलने वाली कार्बन हिम पर जम जाती है, जिससे उसकी परावर्तन क्षमता कम होती है और सूर्य के विकिरण का अवशोषण बढ़ जाता है। हाल के मॉडल-आधारित अध्ययनों के अनुसार, हिमालयी हिमनदों के द्रव्यमान में होने वाली लगभग एक-तिहाई कमी के लिए दक्षिण एशिया में उपस्थित कार्बन के सूक्ष्म कण उत्तरदायी हैं।
- कार्बन हिम को गहरा कर देती है, जिससे उसकी परावर्तन क्षमता घटती है और सूर्य के विकिरण का अवशोषण बढ़ता है।
- स्थानीय मानवीय दबाव: ईंट भट्टे, खाना पकाने के चूल्हे, परिवहन और फसल अवशेषों का दहन।
- बुनियादी ढाँचे और भूमि उपयोग में परिवर्तन: सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएँ और पर्यटन सुविधाएँ अस्थिर पर्वतीय भूभाग में जोखिम और संवेदनशीलता बढ़ाती हैं।
हिमनदों का संकुचन क्यों महत्वपूर्ण है?
- हिमनदों का संकुचन एक ओर धीमी गति से होने वाली आर्थिक क्षति का कारण है, तो दूसरी ओर अचानक आने वाली आपदाओं का जोखिम भी बढ़ाता है।
- नेपाल में आई बाढ़ ने प्रदर्शित किया कि ऊँचाई वाले क्षेत्रों में होने वाली घटनाएँ कितनी तीव्रता से निचले क्षेत्रों में विनाशकारी आपदाओं में बदल सकती हैं।
- भोते कोशी चेतावनी प्रणाली द्वारा अचानक आए मलबे के प्रवाह का पता न लगा पाना वर्तमान निगरानी व्यवस्थाओं की सीमाओं को दर्शाता है।
- कार्बन के सूक्ष्म कणों के उत्सर्जन को कम करना अपेक्षाकृत व्यावहारिक उपाय है।
- जिगजैग तकनीक वाले ईंट भट्टे कार्बन और कणीय प्रदूषकों के उत्सर्जन को लगभग 70% तथा ईंधन की खपत को 20–30% तक कम कर सकते हैं।
- पंजाब और हरियाणा इस तकनीक को अपना चुके हैं, जबकि भारत के सबसे बड़े ईंट उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इसका उपयोग 56% तक पहुँच चुका है।
हिमनदों के पिघलने के प्रभाव
- जल असुरक्षा: दीर्घकाल में हिमनदों से पोषित नदियों के प्रवाह में कमी आ सकती है।
- कृषि: सिंधु-गंगा के मैदानों में गेहूँ और चावल तथा असम और बंगाल में चाय के उत्पादन पर जोखिम बढ़ सकता है।
- ऊर्जा: विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र में जलविद्युत उत्पादन पर प्रभाव पड़ सकता है।
- आपदाएँ: बढ़ती हिमनदीय झीलें अस्थिर हिमोढ़ बाँधों को तोड़ सकती हैं, जिससे हिमनदीय झील के फटने से आने वाली बाढ़, आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी आपदाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- समष्टि आर्थिक दबाव: आपदाएँ आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित करती हैं, लोगों को विस्थापित करती हैं और पुनर्निर्माण की लागत बढ़ाती हैं। इससे राजकोषीय दबाव तथा सरकारी ऋण संबंधी चुनौतियाँ और गंभीर हो सकती हैं।
- सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से संबंधित चेतावनी इस चुनौती को दर्शाती है। वर्ष 2021 के एक वैज्ञानिक अध्ययन में इसकी अस्थिरता की पहचान की गई थी। इसके बाद झील फट गई, जिसमें कम से कम 50 लोगों की मृत्यु हुई।
संबंधित उपाय एवं प्रयास
- भारत की जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय मिशन।
- हिमनदीय झील के फटने से आने वाली बाढ़ के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, हिमनदों की निगरानी और आपदा-जोखिम मानचित्रण को सुदृढ़ करना।
- हिमालयी पारिस्थितिकी तथा सीमापार आपदाओं से संबंधित सूचनाओं को भारत, नेपाल और चीन के बीच साझा करना।
- जलवायु संबंधी समझौते और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की व्यवस्थाएँ।
- स्विट्जरलैंड का 2025 में ब्लाटेन हिमनद के ढहने से निपटने का अनुभव भी उपयोगी उदाहरण है, जहाँ पूर्व निगरानी और समय पर निकासी से जनहानि को सीमित करने में सहायता मिली।
आगे की राह
- हिमालय-व्यापी और जोखिम-आधारित विकास मॉडल अपनाया जाना चाहिए, जिसमें संचयी पर्यावरणीय आकलन, पर्वतीय क्षेत्रों के अनुरूप निर्माण मानक, हिमनदों और झीलों की निरंतर निगरानी, समुदाय-आधारित निकासी व्यवस्था तथा सीमापार आँकड़ों का आदान-प्रदान शामिल हो।
- भारत को ईंट निर्माण क्षेत्र में परिवर्तन के लिए लक्षित निधि स्थापित करनी चाहिए, अक्षम ईंट भट्टों को चरणबद्ध तरीके से बंद करना चाहिए और साथ ही वायु-क्षेत्र के स्तर पर ईंट भट्टों, खाना पकाने के चूल्हों, परिवहन तथा फसल अवशेषों के दहन की समस्या का समाधान करना चाहिए।
- इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रयास, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता और सतत पर्वतीय विकास—इन तीनों को एक साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है।
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