भारत का शहरी अपशिष्ट संकट: सर्कुलर इकोनॉमी में बड़े परिवर्तन की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: GS2/सरकारी नीति और हस्तक्षेप; GS3/पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट

संदर्भ

  • तीव्रता से शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे के कारण शहरी भारत अपशिष्ट के बढ़ते संकट का सामना कर रहा है। यह चुनौती इस बात पर बल देती है कि इसे हल करने के लिए एक नए दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता है।

शहरी भारत का बढ़ता अपशिष्ट संकट

  • भारत का शहरी विस्तार एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रस्तुत करता है—स्वच्छ, सतत शहरों और अपशिष्ट से भरे, प्रदूषित शहरी फैलाव के बीच।
  • स्वच्छ भारत मिशन (SBM) के तहत खुले में शौच को समाप्त करने और अपशिष्ट -मुक्त शहरों (GFCs) का लक्ष्य रखने के बावजूद शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट की समस्या गंभीर बनी हुई है।
  • 2030 तक, प्रति वर्ष 165 मिलियन टन अपशिष्ट के उत्पन्न होने की संभावना है, जिससे 41 मिलियन टन से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होगा।
  • 2050 तक, जब शहरी जनसंख्या 814 मिलियन तक पहुँच जाएगी, अपशिष्ट उत्पादन प्रति वर्ष 436 मिलियन टन तक पहुँच सकता है।
    • यदि समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप न किया गया तो यह गंभीर वायु और जल प्रदूषण, स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि, नगरपालिका बुनियादी ढाँचे पर दबाव एवं जलवायु संवेदनशीलता में वृद्धि का कारण बनेगा।

जैविक और सूखे अपशिष्ट का समाधान

  • जैविक अपशिष्ट और ऊर्जा पुनर्प्राप्ति: भारत में नगरपालिका अपशिष्ट का 50% से अधिक हिस्सा जैविक है, जो कम्पोस्टिंग और बायोगैस उत्पादन की विशाल संभावनाएँ प्रदान करता है।
    • संपीड़ित बायोगैस (CBG) संयंत्र जैसी पहलें नगरपालिका गीले अपशिष्ट को हरित ईंधन और विद्युत में परिवर्तित कर रही हैं।
    • ये समाधान उत्सर्जन में कमी और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन दोनों के लिए आवश्यक हैं।
  • प्लास्टिक संकट: प्लास्टिक अपशिष्ट , सूखे अपशिष्ट का एक प्रमुख घटक, गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य खतरों का कारण बनता है।
    • प्रभावी प्रबंधन घरेलू स्तर पर पृथक्करण पर निर्भर करता है, जिसके बाद मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRFs) और रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (RDF) संयंत्र आते हैं।
    • हालाँकि, पुनर्चक्रण एवं अपशिष्ट से ऊर्जा क्षेत्रों में उद्यमिता, निवेश और बाज़ार संबंध अभी भी अविकसित हैं।
  • निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट : भारत प्रति वर्ष लगभग 12 मिलियन टन निर्माण और विध्वंस (C&D) अपशिष्ट उत्पन्न करता है।
    • कमज़ोर प्रवर्तन के कारण अनधिकृत डंपिंग व्यापक है।
    • C&D वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2016 और आगामी पर्यावरण (C&D) वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2025 (अप्रैल 2026 से प्रभावी) अपशिष्ट के पृथक्करण, पुनर्चक्रण को अनिवार्य करते हैं और बड़े उत्पादकों पर शुल्क लगाते हैं।
    • अनुपालन को सुदृढ़ करना और पुनर्चक्रण बुनियादी ढाँचे का विस्तार करना C&D अपशिष्ट को निर्माण के लिए मूल्यवान कच्चे माल में बदल सकता है।
  • अपशिष्ट जल और परिपत्र अर्थव्यवस्था: अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग शहरी जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
    • AMRUT और SBM जैसे कार्यक्रम मल-मलजल और ग्रे वाटर प्रबंधन पर बल देते हैं, राज्यों से आग्रह करते हैं कि वे प्रयुक्त जल को कृषि, बागवानी एवं उद्योग में पुन: उपयोग करें।
    • ताज़े जल भंडार घटने के साथ पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण ही सतत मार्ग हैं।
  • SBM और सर्कुलैरिटी: लगभग 1,100 शहरों को डंपसाइट-मुक्त घोषित किया गया है, हालाँकि SBM अर्बन 2.0 के अंतर्गत पूरी तरह अपशिष्ट-मुक्त नहीं।
    • भारत के सभी 5,000+ शहरों को रैखिक (उपयोग और त्याग) मॉडल से परिपत्र (पुन: उपयोग और पुनर्प्राप्ति) मॉडल में बदलना होगा ताकि पूर्ण सर्कुलैरिटी प्राप्त की जा सके।

सतत सर्कुलैरिटी में बाधाएँ

  • सर्कुलैरिटी प्राप्त करने में कई प्रणालीगत बाधाएँ हैं:
    • घरेलू स्तर पर कमजोर पृथक्करण प्रथाएँ।
    • अपर्याप्त संग्रह और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचा।
    • गुणवत्ता चिंताओं के कारण पुनर्चक्रित उत्पादों की सीमित बाज़ार माँग।
    • उद्योगों में विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (EPR) का आंशिक कार्यान्वयन।
    • नगरपालिका विभागों के बीच समन्वय की कमी।
    • स्थानीय सरकारों के लिए वित्तीय कमी।
  • ये चुनौतियाँ सुदृढ़ पॉलिसी फ्रेमवर्क, विभागों के बीच सामंजस्य, और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के लिए इंसेंटिव की आवश्यकता को उजागर करती हैं।
  • नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन ने इन बाधाओं को दूर करने पर बल दिया, साथ ही जयपुर में एशिया-प्रशांत देशों द्वारा समर्थित सिटीज़ कोएलिशन फॉर सर्कुलैरिटी (C-3) जैसी क्षेत्रीय पहलों पर भी बल दिया।

अन्य चुनौतियाँ

  • अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: 80–90% पुनर्चक्रण असुरक्षित परिस्थितियों में अनौपचारिक श्रमिकों द्वारा किया जाता है।
  • वित्तीय व्यवहार्यता: कमजोर लागत वसूली और ULB क्षमता।
  • जन जागरूकता: केवल ~30% नागरिक स्रोत पर अपशिष्ट का पृथक्करण करते हैं।
  • नीति विखंडन: CPCB, राज्य बोर्ड और शहरी स्थानीय निकायों के बीच ओवरलैप से जवाबदेही कम होती है।

भारत में परिवर्तन हेतु प्रमुख रणनीतियाँ और प्रथाएँ

  • रैखिक से परिपत्र कचरा प्रबंधन: भारत की पारंपरिक रैखिक प्रणाली (अपशिष्ट  एकत्र करना, फेंकना और भूल जाना) अस्थिर है। नीति निर्माता परिपत्र अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव का समर्थन करते हैं, जहाँ अपशिष्ट को संसाधन माना जाता है जिसे पुनर्प्राप्त, पुन: उपयोग और पुनर्चक्रित किया जा सकता है।
    • लगभग 1,100 शहरों को SBM अर्बन 2.0 के अंतर्गत डंपसाइट-मुक्त प्रमाणित किया गया है। हालाँकि, वास्तविक सर्कुलैरिटी  तभी प्राप्त होगी जब सभी 5,000+ शहर और कस्बे बड़े पैमाने पर पृथक्करण, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण प्रणाली अपनाएँ।
  • विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन: पुणे और इंदौर जैसे शहर स्रोत पर पृथक्करण एवं गीले कचरे से बायोगैस उत्पादन का उपयोग करते हैं।
    • उदाहरण: इंदौर का वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट 15 मेगावाट विद्युत उत्पन्न करता है।
  • ई-अपशिष्ट और प्लास्टिक पुनर्चक्रण केंद्र:ई-वेस्ट (प्रबंधन) नियम 2022 के अंतर्गत उत्पादकों को उत्पन्न अपशिष्ट का 60–80% पुनर्चक्रण करना अनिवार्य है।
    • दिल्ली का नरेला-बवाना रीसाइक्लिंग पार्क एक मॉडल CE क्लस्टर है।
  • निर्माण और विध्वंस (C&D) कचरा: दिल्ली में प्रतिदिन 2100+ टन C&D अपशिष्ट का पुनर्चक्रण कर उसे पक्की ईंटों, एग्रीगेट्स और ब्लॉक्स में बदला जाता है।
  • अपशिष्ट से ऊर्जा (WtE): वेस्ट टू वेल्थ मिशन के अंतर्गत 100+ परिचालन परियोजनाएँ, जिनमें बायोमीथनेशन और RDF तकनीकें शामिल हैं।
  • शहरी कम्पोस्टिंग: शहरों को ‘मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस’ योजना के माध्यम से कृषि हेतु कम्पोस्ट बाज़ार को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

नागरिक और सर्कुलैरिटी आंदोलन

  • नागरिक अपशिष्ट प्रबंधन क्रांति के केंद्र में हैं। स्रोत पर पृथक्करण, जिम्मेदार उपभोग और पुनर्चक्रण पहलों के समर्थन के बिना कोई भी शहर वास्तव में अपशिष्ट -मुक्त नहीं बन सकता।
  • हालाँकि, तीन R (रिड्यूस, रीयूज़, रीसायकल) अलग-अलग स्तरों पर स्वीकार किए जाते हैं:
    • Reduce (कम करना): सबसे कठिन, क्योंकि सुविधा और तीव्र उपभोग की संस्कृति प्रभुत्वशाली है।
    • Reuse (पुन: उपयोग): डिस्पोजेबल जीवनशैली के कारण घट रहा है।
    • Recycle (पुनर्चक्रण): नवाचार और उद्यमिता द्वारा संचालित, सबसे व्यवहार्य मार्ग के रूप में उभर रहा है।

COP30 और वैश्विक अपशिष्ट एजेंडा

  • अपशिष्ट प्रबंधन का मुद्दा नवंबर 2025 में ब्राज़ील के बेलें में आयोजित UNFCCC के COP30 वैश्विक जलवायु एजेंडा में केंद्र बिंदु रहा।
  • सम्मेलन ने सर्कुलैरिटी (अपशिष्ट  को संसाधन मानकर उसका उपयोग करने की प्रक्रिया) को समावेशी विकास, स्वच्छ वायु और स्वस्थ जनसंख्या प्राप्त करने के लिए आवश्यक बताया।
    • ब्राज़ील ने ‘नो ऑर्गेनिक वेस्ट, नाउ’ नामक एक वैश्विक पहल शुरू की, जिसमें जैविक अपशिष्ट से मीथेन उत्सर्जन को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर धनराशि देने का संकल्प लिया गया।
  • यह पहल भारत के मिशन LiFE (लाइफ़स्टाइल फ़ॉर एनवायरनमेंट) के अनुरूप है, जिसे 2021 में ग्लासगो में COP26 के दौरान प्रस्तुत किया गया था। इसने विश्व से आग्रह किया कि ‘बिना सोचे-समझे और विनाशकारी उपभोग’ के बजाय ‘सचेत उपयोग’ को अपनाया जाए।

निष्कर्ष

  • COP30 और भारत के शहरी एजेंडा से संदेश स्पष्ट है—सर्कुलैरिटी अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है
  • भारत समन्वित शासन, सुदृढ़ नागरिक भागीदारी और पुनर्चक्रण व अपशिष्ट से ऊर्जा तकनीकों में नवाचार के माध्यम से अपने अपशिष्ट संकट को जलवायु कार्रवाई, शहरी पुनरुत्थान तथा सतत विकास के अवसर में परिवर्तन कर सकता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत के शहरी अपशिष्ट संकट से उत्पन्न चुनौतियों की जाँच कीजिए तथा मूल्यांकन कीजिए कि सर्कुलर इकोनॉमी की ओर संक्रमण इन समस्याओं का प्रभावी ढंग से समाधान कैसे कर सकता है।

Source: TH

 

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