पाठ्यक्रम: GS1/इतिहास
संदर्भ
- मई माह 1857 के विद्रोह की 169वीं वर्षगांठ का प्रतीक है और ऐतिहासिक प्रमाण दर्शाते हैं कि भारत का ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष 1857 से पूर्व ही प्रारंभ हो चुका था, विशेषकर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में दक्षिण भारत के विद्रोहों के साथ।
- हालाँकि इतिहासलेखन ने 1857 को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में अत्यधिक महत्व दिया है, जिससे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की असंतुलित समझ विकसित हुई है।
1857 से पूर्व भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध
- 1857 के विद्रोह से पहले भारत ने ब्रिटिश विस्तार के विरुद्ध व्यापक किंतु विखंडित प्रतिरोध देखा।
- ये विद्रोह किसानों, जनजातीय समूहों, जमींदारों, शासकों और स्थानीय सरदारों द्वारा आर्थिक शोषण, राजनीतिक अधिग्रहण एवं सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध किए गए।
- ये स्थानीय स्तर पर हुए किंतु इन्होंने औपनिवेशिक विरोधी चेतना की नींव रखी।
दक्षिण भारत में प्रारंभिक प्रतिरोध
- एंग्लो-मैसूर युद्धों के बाद (पृष्ठभूमि): टीपू सुल्तान की 1799 में पराजय के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने दक्षिण भारत में तीव्र विस्तार किया।
- गवर्नर-जनरल रिचर्ड वेलस्ली की सब्सिडियरी एलायंस प्रणाली का उद्देश्य रियासतों को अधीन करना था।
- इससे राजनीतिक अधीनता और आर्थिक भार बढ़ा, जिसने प्रतिरोध को जन्म दिया।
नागरिक विद्रोह (जमींदार एवं स्थानीय सरदार):
- पोलिगार (पलैयक्कर) विद्रोह (1790–1805): तमिलनाडु में स्थानीय सरदारों द्वारा ब्रिटिश विस्तार के विरुद्ध संगठित सैन्य प्रतिरोध।
- नेता: कट्टाबोम्मन, मरुथु पांडियार
- कारण: ब्रिटिश राजस्व माँगें, स्वायत्तता का ह्रास
- स्वरूप: गुरिल्ला युद्ध
- ‘पेनिन्सुलर कॉन्फेडरेसी’ (1800–1801): पेरिया मरुथु और चिन्ना मरुथु द्वारा दक्षिण भारत में प्रतिरोध का समन्वय।
- तिरुचिरापल्ली घोषणा (1801): भारतीयों में एकता और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध का आह्वान।
- विजयनगरम विद्रोह (1794): स्थानीय शासक और ब्रिटिश प्रशासन के बीच संघर्ष।
- कित्तूर विद्रोह (1824):
- नेता: रानी चेनम्मा
- कारण: अधिग्रहण जैसी नीतियाँ
- वेलु थम्पी का विद्रोह (त्रावणकोर विद्रोह, 1808–1809):
- कारण: सब्सिडियरी एलायंस का बोझ, अत्यधिक कराधान, ब्रिटिश हस्तक्षेप और आर्थिक संकट।
- नेतृत्व: वेलु थम्पी (त्रावणकोर के दलवा), पालयथ अचन (कोचीन), फ्रांसीसी सहायता का प्रयास।
- कुंडरा घोषणा (1809): ब्रिटिश विश्वासघात और शोषण का आरोप; सांस्कृतिक विनाश एवं आर्थिक एकाधिकार के विरुद्ध चेतावनी।
अन्य आंदोलन
- सन्यासी–फकीर विद्रोह (1763–1800):
- क्षेत्र: बंगाल
- नेता: मजनू शाह, चिराग अली
- कारण: तीर्थयात्रा पर प्रतिबंध, बंगाल अकाल (1770) के बाद आर्थिक संकट।
- पागल पंथी एवं फराइज़ी आंदोलन:
- क्षेत्र: बंगाल
- कारण: कृषक शोषण, धार्मिक-सामाजिक सुधार, ब्रिटिश समर्थित जमींदारों के विरुद्ध प्रतिरोध।
- जनजातीय विद्रोह:
- उदाहरण: चुआर विद्रोह (1760–1800, बंगाल), कोल विद्रोह (1831–32, छोटानागपुर), संथाल विद्रोह (1855–56, झारखंड), भील एवं खासी विद्रोह।
- कारण: भूमि से बेदखली, वन प्रतिबंध, शोषणकारी राजस्व नीतियाँ।
- अपदस्थ शासकों का प्रतिरोध:
- उदाहरण: मैसूर प्रतिरोध (हैदर अली एवं टीपू सुल्तान), मराठा प्रतिरोध (1775–1818), अवध एवं पंजाब का प्रतिरोध।
1857 से पूर्व प्रतिरोध के कारक
- स्थानीय और विखंडित स्वरूप: अधिकांश विद्रोह क्षेत्रीय थे (बंगाल, दक्षिण भारत, जनजातीय क्षेत्र)।
- अखिल भारतीय स्तर पर कोई समन्वय या संचार नहीं था।
- विविध सामाजिक संरचना: प्रतिभागियों में किसान (सन्यासी, नील विद्रोह), जनजातीय समूह (संथाल, कोल), जमींदार एवं शासक (पोलिगार, कित्तूर), तथा धार्मिक समूह (फकीर, वहाबी) सम्मिलित थे।
- व्यापक भागीदारी असंतोष को दर्शाती है, किंतु एकता के अभाव ने प्रभाव को कमजोर किया।
- आर्थिक शिकायतें मुख्य कारण: भारी भू-राजस्व माँगें, पारंपरिक अर्थव्यवस्था का विनाश, साहूकारों और जमींदारों द्वारा शोषण।
- आर्थिक मुद्दे प्रमुख प्रेरक कारक थे, राष्ट्रवाद नहीं।
- राजनीतिक कारण और स्वायत्तता का ह्रास: अधिग्रहण नीतियाँ, सब्सिडियरी एलायंस प्रणाली, स्थानीय शासन में हस्तक्षेप।
- उदाहरण: पोलिगार प्रतिरोध, वेलु थम्पी विद्रोह, कित्तूर विद्रोह।
- प्रतिरोध का उद्देश्य प्रायः पुरानी राजनीतिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना था, नया राष्ट्र-राज्य बनाना नहीं।
- पारंपरिक और रूढ़िवादी दृष्टिकोण: आंदोलनों का उद्देश्य पारंपरिक अधिकारों और रीति-रिवाजों की रक्षा था।
- ब्रिटिश शासन द्वारा थोपे गए परिवर्तनों के विरुद्ध प्रतिरोध।
- पिछड़े दृष्टिकोण ने परिवर्तनकारी क्षमता को सीमित किया।
- सशस्त्र एवं गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग: पोलिगारों द्वारा गुरिल्ला युद्ध; संथाल और फकीरों द्वारा सशस्त्र किसान विद्रोह।
- आधुनिक संगठन और रणनीति का अभाव, यद्यपि सैन्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण।
- आधुनिक राष्ट्रवाद का अभाव: भारतीय राष्ट्र की अवधारणा नहीं थी; निष्ठा क्षेत्र, जनजाति और स्थानीय शासक तक सीमित थी।
- विद्रोहों में राष्ट्रीय चेतना का अभाव।
- केंद्रीय नेतृत्व और विचारधारा का अभाव: कोई एकीकृत नेतृत्व या साझा कार्यक्रम नहीं।
- कोई साझा राजनीतिक दृष्टि नहीं।
- आंदोलन असंगठित और प्रतिक्रियात्मक रहे, रणनीतिक नहीं।
- ब्रिटिश शक्ति के मुकाबले संसाधनों की कमी: कमजोर हथियार और प्रशिक्षण का अभाव।
- ब्रिटिश तकनीकी, संगठनात्मक और खुफिया नेटवर्क की श्रेष्ठता।
प्रभाव एवं दीर्घकालिक महत्त्व
- अधिकांश विद्रोह असफल रहे (तात्कालिक परिणाम), किंतु उन्होंने औपनिवेशिक शासन के शोषणकारी स्वरूप को उजागर किया।
- प्रतिरोध की परंपरा निर्मित की और 1857 तथा बाद के राष्ट्रवाद की नींव रखी।
- प्रारंभिक विद्रोह 1857 तक पहुँचने वाली प्रतिरोध की निरंतरता का हिस्सा थे।
- उपेक्षा के कारण: मुद्रित अभिलेखों की कमी (1857 से पूर्व), उत्तर भारतीय इतिहासलेखन का प्रभुत्व, तथा 1857 की घटनाओं का प्रेस और औपनिवेशिक अभिलेखों में अधिक दस्तावेजीकरण।
निष्कर्ष
- 1857 से पूर्व के प्रतिरोध आंदोलन विफल नहीं थे, बल्कि अग्रदूत थे।
- उनका स्थानीय, पारंपरिक और विखंडित स्वरूप तत्काल सफलता को सीमित करता था, किंतु उन्होंने औपनिवेशिक विरोधी चेतना को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1857 का विद्रोह इन पूर्ववर्ती प्रतिरोधों का परिपाक था, न कि अचानक आरंभ।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] 1857 का विद्रोह आरंभ नहीं बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध पूर्ववर्ती प्रतिरोधों का परिपाक था। भारत में 1857 से पूर्व हुए विद्रोहों के संदर्भ में विवेचना कीजिए। |
स्रोत: HT