ड्रोन युद्ध के युग में भारत की सैन्य रणनीति का पुनःपरिकल्पन

पाठ्यक्रम: GS3/ रक्षा

संदर्भ

  • पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने यह प्रदर्शित किया है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन, मिसाइलों और उन्नत तकनीकों का प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है।

संतृप्ति युद्ध और बदलती सैन्य रणनीति

  • आधुनिक युद्ध की विशेषता है कम लागत वाली लेकिन उच्च प्रभाव वाली तकनीकों का बढ़ता उपयोग, जैसे कि मानव रहित हवाई वाहन (UAVs), लोइटरिंग म्यूनिशन, स्वार्म ड्रोन और लंबी दूरी की सटीक प्रहार प्रणालियाँ।
  • स्वार्म संतृप्ति का खतरा: सैकड़ों ड्रोन को एक समन्वित हमले में तैनात करना स्वार्म संतृप्ति से उत्पन्न गंभीर खतरे को दर्शाता है।
    • सबसे उन्नत वायु रक्षा प्रणालियाँ भी इतनी बड़ी संख्या में हमलों का सामना करते समय फायरिंग दर, अवरोधन क्षमता और पुनः लोडिंग गति की सीमाओं से जूझती हैं।
  • भारत का प्रतिरोधी-ड्रोन सिद्धांत अभी संक्रमणकालीन अवस्था में है, जिसमें परिचालन जिम्मेदारियाँ तीव्रता से बढ़ रही हैं।

वैश्विक संघर्षों से प्राप्त संकेत

  • रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कम लागत वाले FPV ड्रोन महंगे बख़्तरबंद प्लेटफ़ॉर्म को नष्ट कर सकते हैं।
  • नागोर्नो-काराबाख युद्ध ने पारंपरिक युद्ध पर लोइटरिंग म्यूनिशन के निर्णायक प्रभाव को उजागर किया।
  • गाज़ा पट्टी संघर्ष ने यह प्रदर्शित किया कि गैर-राज्य अभिनेता वाणिज्यिक ड्रोन का उपयोग निगरानी और लक्षित हमलों के लिए कर सकते हैं।

भारत के लिए समकालीन संघर्षों से अंतर्दृष्टि

  • मजबूत प्रतिरोधी-ड्रोन प्रणालियों की आवश्यकता: स्वार्म ड्रोन कम लागत वाले लेकिन उच्च प्रभाव वाले हथियार हैं जो उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को अभिभूत कर सकते हैं।
    • विरासत वायु रक्षा प्रणालियों के साथ एकीकरण: वर्तमान हार्डवेयर को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) क्षमताओं से लैस करना पुराने संसाधनों जैसे L/70 एंटी-एयरक्राफ्ट गन की उपयोगिता बढ़ाता है।
  • रोबोटिक युद्ध क्षमताओं का विस्तार: युद्ध में रोबोटिक्स की बढ़ती भूमिका उच्च जोखिम वाले अभियानों में मानव शक्ति पर निर्भरता कम कर रही है।
  • आधुनिक वॉरफेयर में लक्ष्य निर्धारण रणनीति का विकास: हालिया संघर्षों ने ऊर्जा अवसंरचना, प्रशासनिक केंद्रों और औद्योगिक सुविधाओं जैसे गहरे रणनीतिक संसाधनों को लक्ष्य बनाने की प्रवृत्ति दिखाई है।
    • निष्क्रिय रक्षा उपाय: आयरन डोम जैसी उन्नत रक्षा प्रणालियों की संतृप्ति सक्रिय रक्षा तंत्र की सीमाओं को उजागर करती है।
  • विकेन्द्रीकृत वॉरफेयर: आधुनिक युद्ध में निम्न स्तर पर विकेन्द्रीकृत निर्णय-निर्धारण और परिचालन लचीलापन आवश्यक होता जा रहा है।

भारत की संस्थागत और रणनीतिक प्रतिक्रिया

  • एकीकृत ड्रोन डिटेक्शन और इंटरडिक्शन सिस्टम (IDD&IS): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा विकसित, यह व्यापक प्रतिरोधी-ड्रोन समाधान है।
    • 5–8 किमी की दूरी पर ड्रोन का पता लगाने में सक्षम।
    • 2–5 किमी की सीमा में संचार संकेतों को जाम कर सकता है।
    • निकट दूरी पर लेज़र-आधारित निर्देशित ऊर्जा हथियारों से खतरों को निष्क्रिय कर सकता है।
  • “भार्गवास्त्र” एंटी-स्वार्म सिस्टम: सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) द्वारा विकसित, यह कम लागत वाला स्वदेशी प्रतिरोधी-ड्रोन सिस्टम है जो माइक्रो-रॉकेट्स का उपयोग कर स्वार्म ड्रोन को हार्ड-किल मोड में नष्ट करता है।
  • भारतीय सेना ने निगरानी और कामिकाज़े ड्रोन की बड़े पैमाने पर खरीद शुरू की है ताकि रक्षात्मक और आक्रामक दोनों क्षमताओं को बढ़ाया जा सके।

भारत की मिसाइल रक्षा संरचना

  • बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) प्रणाली (DRDO):
    • पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) इंटरसेप्टर 50–180 किमी ऊँचाई पर आने वाली मिसाइलों को वायुमंडल के बाहर अवरोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
    • एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) इंटरसेप्टर वायुमंडल के अंदर अंतिम चरण में 30 किमी तक की ऊँचाई पर खतरों को निष्क्रिय करने के लिए बनाया गया है।
  • स्तरीय वायु रक्षा कवच:
    • S-400 ट्रायम्फ: रूस द्वारा विकसित अत्याधुनिक मोबाइल सतह-से-आकाश मिसाइल प्रणाली, जिसे भारत ने लंबी दूरी की वायु रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए शामिल किया है।
    • मध्यम दूरी (70–100 किमी): इज़राइल के साथ सह-विकसित बराक-8 (MRSAM/LRSAM) भूमि और नौसैनिक संसाधनों के लिए 360-डिग्री सुरक्षा प्रदान करता है।
    • लघु दूरी (25–50 किमी): स्वदेशी आकाश प्रणाली और इज़राइल का SPYDER रणनीतिक बिंदुओं एवं मोबाइल सेना इकाइयों की रक्षा करते हैं।

आगे की राह

  • एकीकृत थिएटर कमांड (ITCs) का गठन: निर्णय-निर्धारण को विकेन्द्रीकृत करने और थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के बीच बेहतर समन्वय के लिए आवश्यक।
  • स्पष्ट राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों की परिभाषा: संघर्ष की शुरुआत में ही रणनीतिक स्पष्टता के लिए आवश्यक।
  • स्वदेशी विकास: ड्रोन, प्रतिरोधी-ड्रोन प्रणालियों और महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों का स्वदेशी विकास रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अनिवार्य।
  • दीर्घकालिक संघर्ष की संभावना: समकालीन संघर्ष संकेत देते हैं कि युद्ध छोटे और निर्णायक न होकर लंबे समय तक चल सकते हैं।
  • सतत लॉजिस्टिक्स और संसाधन एकत्रण: समय के साथ युद्धक क्षमता बनाए रखने के लिए आवश्यक।

स्रोत: IE

 

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