नाटो द्वारा बाल्टिक रक्षा संरचना सुदृढ़
पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- नाटो ने अपने बाल्टिक कमांड प्रारूप का पुनर्गठन किया है, जिसके अंतर्गत जर्मन-नीदरलैंड्स कोर को एस्टोनिया और लातविया की सामरिक रक्षा की प्रत्यक्ष देखरेख सौंपी गई है।
जर्मन-नीदरलैंड्स कोर क्या है?
- यह एक बहुराष्ट्रीय सैन्य मुख्यालय है, जिसका संचालन जर्मनी और नीदरलैंड्स द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
- यह नाटो की त्वरित प्रतिक्रिया और सामूहिक रक्षा संरचना का हिस्सा है।
- इसमें लगभग 16 देशों की भागीदारी है।
- युद्धकालीन परिस्थितियों में, कोर-स्तरीय कमांड लगभग 40,000–60,000 सैनिकों को कई डिवीजनों में नियंत्रित कर सकता है।
पूर्व प्रणाली
- सभी तीन बाल्टिक राष्ट्र (एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया) तथा उत्तरी पोलैंड पहले मल्टीनैशनल कोर नॉर्थईस्ट के अधीन थे, जिसका मुख्यालय पोलैंड के श्ज़ेचिन में स्थित था।
नाटो के बारे में
- नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) देशों का एक सैन्य गठबंधन है।
- स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1949 में उत्तरी अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी, जिसे सामान्यतः वॉशिंगटन संधि के नाम से जाना जाता है।
- उद्देश्य: सामूहिक रक्षा व्यवस्था के माध्यम से सदस्य देशों की सुरक्षा एवं रक्षा सुनिश्चित करना।
- संस्थापक सदस्य: नाटो के मूल सदस्य देश निम्नलिखित थे:
- बेल्जियम
- कनाडा
- डेनमार्क
- फ्रांस
- आइसलैंड
- इटली
- लक्ज़मबर्ग
- नीदरलैंड
- नॉर्वे
- पुर्तगाल
- यूनाइटेड किंगडम
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- सामूहिक रक्षा (Collective Defence)
- नाटो की आधारशिला उत्तरी अटलांटिक संधि का अनुच्छेद-5 है, जिसके अनुसार किसी एक या एक से अधिक सदस्य देशों पर किया गया सशस्त्र आक्रमण सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जाएगा।
- निर्णय-निर्माण प्रक्रिया: नाटो के अंदर सभी निर्णय सदस्य देशों के सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
- उत्तर अटलांटिक परिषद , जिसमें सभी सदस्य देशों के राजदूत सम्मिलित होते हैं, नाटो की प्रमुख राजनीतिक निर्णय-निर्माण संस्था है।
- सदस्य देश: वर्तमान में नाटो के 32 सदस्य देश हैं।
- फिनलैंड तथा स्वीडन क्रमशः नाटो के 31वें एवं 32वें सदस्य बने हैं।
- सदस्यता की प्रतिबद्धता: संधि पर हस्ताक्षर करते समय सदस्य देश स्वेच्छा से संगठन की राजनीतिक परामर्श प्रक्रियाओं तथा सैन्य गतिविधियों में भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।
स्रोत: TH
रसायनों पर एंटी-डंपिंग शुल्क को लेकर चिंताएँ
पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- रसायनों पर एंटी-डंपिंग शुल्क बड़े निर्माताओं और एमएसएमई-आधारित उद्योगों के बीच संघर्ष का कारण बन गया है।
एंटी-डंपिंग शुल्क क्या है?
- यह एक व्यापारिक उपाय है, जो घरेलू उद्योगों को सस्ते आयात से बचाने हेतु लगाया जाता है।
- डंपिंग तब होती है जब कोई विदेशी कंपनी वस्तुओं को घरेलू बाजार मूल्य या उत्पादन लागत से कम कीमत पर निर्यात करती है।
- भारत में यह शुल्क कस्टम्स टैरिफ अधिनियम, 1975 के अंतर्गत लगाया जाता है, DGTR (वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय) की जाँच के बाद।
- WTO इसे एंटी-डंपिंग समझौते के अंतर्गत अनुमति देता है।
रसायनों पर एंटी-डंपिंग शुल्क की आवश्यकता
- नीति आयोग ने नोट किया कि चीन से बढ़ते सस्ते आयात के कारण भारत का रासायनिक उत्पादन आधार कमजोर हुआ है।
- भारत ने $75 अरब मूल्य के रसायन आयात किए, जबकि निर्यात $44 अरब रहा, जिससे लगभग $31 अरब का व्यापार घाटा हुआ।
- एंटी-डंपिंग शुल्क का उद्देश्य अनुचित व्यापार प्रथाओं को रोकना, घरेलू उत्पादन को समर्थन देना और आयात निर्भरता कम करना है।
- इनका उपयोग भारत के विनिर्माण आधार को सुदृढ़ करने और महत्वपूर्ण रासायनिक मूल्य श्रृंखलाओं में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए भी किया जाता है।
चिंताएँ
- उच्च निवेश लागत: एंटी-डंपिंग शुल्क के कारण रासायनिक कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है, जिससे इन पर निर्भर निम्नवर्ती उद्योगों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ता है।
- एमएसएमई पर प्रभाव: वस्त्र, प्लास्टिक, फुटवियर तथा ऑटो कलपुर्जा क्षेत्रों के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम महंगे कच्चे माल के कारण अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी का सामना करते हैं।
- निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव: उत्पादन लागत में वृद्धि से भारतीय विनिर्मित वस्तुएँ वैश्विक बाजारों में अपेक्षाकृत कम प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं, जिससे निर्यात प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।
- बड़े निर्माताओं को लाभ: एंटी-डंपिंग शुल्क से बड़े घरेलू उत्पादकों को संरक्षण प्राप्त होता है, जबकि निम्नवर्ती उद्योगों, विशेषकर छोटे एवं मध्यम उद्यमों, को उच्च परिचालन लागत का भार वहन करना पड़ता है।
- औद्योगिक दक्षता में कमी: दीर्घकालिक संरक्षण की व्यवस्था रासायनिक उद्योग में नवाचार, दक्षता वृद्धि तथा विविधीकरण की प्रवृत्ति को हतोत्साहित कर सकती है।
स्रोत: IE
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)
पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की कानूनी वैधता को बरकरार रखा है।
परिचय
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का उद्देश्य स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व को सुनिश्चित करना है, जिसके लिए यह आवश्यक है कि जिस निर्वाचक नामावली के आधार पर चुनाव संपन्न होते हैं, वह सटीक एवं विश्वसनीय हो।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा अभ्यास नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत नागरिकता के अंतिम निर्धारण के समान नहीं माना जा सकता।
- न्यायालय के अनुसार, ऐसे मामलों में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) का दायित्व होगा कि वह प्रकरण को नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विधि के अनुरूप निर्णय हेतु संदर्भित करे।
- यदि संबंधित व्यक्तियों को अंततः भारतीय नागरिक पाया जाता है, तो उनके नाम पुनः निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने चाहिए।
निर्वाचक नामावली का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)
- भारतीय निर्वाचन आयोग को विधि के अनुसार निर्वाचक नामावलियों के निर्माण एवं पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है।
- निर्वाचक नामावली की शुद्धता एवं अखंडता बनाए रखने के उद्देश्य से आयोग प्रत्येक चुनाव से पूर्व अथवा आवश्यकता अनुसार नामावली के पुनरीक्षण का आदेश देता है।
- निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 2025 में SIR की घोषणा के प्रमुख आधार:
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन: वर्ष 2003 में किए गए अंतिम गहन पुनरीक्षण के पश्चात बीते लगभग 20 वर्षों में तीव्र नगरीकरण एवं प्रवासन के कारण व्यापक जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुए हैं।
- इसके परिणामस्वरूप निर्वाचक नामावली में बार-बार, बहुविध तथा त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों की समस्या उत्पन्न हुई है।
- संवैधानिक दायित्व: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि निर्वाचक नामावली में केवल भारतीय नागरिकों के नाम ही सम्मिलित हों।
- वैधानिक आधार: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) निर्वाचन आयोग को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह किसी भी समय किसी निर्वाचन क्षेत्र अथवा उसके किसी भाग की निर्वाचक नामावली का विशेष पुनरीक्षण कराने का आदेश दे सकता है।
- यह शक्ति नियमित पुनरीक्षण कार्यक्रमों पर अधिरोहित होती है, बशर्ते आयोग द्वारा इसके कारणों को अभिलिखित किया गया हो।
स्रोत: TH
भारत का वाई-फाई 7 युग में प्रवेश
पाठ्यक्रम : GS-3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- टीपी-लिंक (TP-Link) ने भारत में वाई-फाई 7 उपकरणों का स्थानीय विनिर्माण प्रारंभ कर दिया है। इसकी शुरुआत एंटरप्राइज़ एक्सेस पॉइंट्स के उत्पादन से हुई है, जो भारत के वाई-फाई 7 युग में प्रवेश का प्रतीक है।
वाई-फाई 7 के बारे में
- वाई-फाई 7, जिसे आधिकारिक रूप से IEEE 802.11be अत्यंत उच्च थ्रूपुट (EHT) कहा जाता है, वायरलेस नेटवर्किंग प्रौद्योगिकी की नवीनतम पीढ़ी है।
- वाई-फाई 6, जहाँ मुख्यतः बड़ी संख्या में जुड़े उपकरणों के प्रबंधन पर केंद्रित था, वहीं वाई-फाई 7 को अत्यधिक उच्च गति, अति-निम्न विलंबता, कम नेटवर्क भीड़ तथा अधिक विश्वसनीय कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है।

प्रमुख विशेषताएँ
- अधिकतम सैद्धांतिक गति 46 Gbps तक, जो वाई-फाई 6 की तुलना में लगभग 4.8 गुना अधिक है।
- लगभग 4 गुना कम विलंबता, जिससे वास्तविक समय संचार एवं ऑनलाइन गेमिंग में सुधार होगा।
- भारत के लाइसेंस प्राप्त 5925–6425 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम का उपयोग, जिससे अधिक स्वच्छ एवं कम भीड़भाड़ वाली कनेक्टिविटी उपलब्ध होगी।
- उन्नत टार्गेट वेक टाइम (TWT) तकनीक, जो ऊर्जा दक्षता एवं बैटरी जीवन में सुधार करती है।
अनुप्रयोग
- 4K एवं 8K वीडियो स्ट्रीमिंग
- संवर्धित वास्तविकता (AR) एवं आभासी वास्तविकता (VR)
- क्लाउड कंप्यूटिंग
- ऑनलाइन गेमिंग
- औद्योगिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Industrial IoT)
- स्मार्ट कारखाने एवं स्मार्ट घर
- इसके अतिरिक्त यह अस्पतालों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, होटलों, कार्यालयों तथा शैक्षणिक परिसरों जैसे उच्च-घनत्व सार्वजनिक नेटवर्कों को भी समर्थन प्रदान करता है।
स्रोत : TH
भारत–अमेरिका महत्त्वपूर्ण खनिज ढाँचा
पाठ्यक्रम : GS-3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका ने महत्त्वपूर्ण खनिजों तथा दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) की आपूर्ति, खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण एवं प्रबंधन में सहयोग को सुदृढ़ करने हेतु एक महत्त्वपूर्ण रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
- यह पहल वर्ष 2025 में चीन द्वारा दुर्लभ मृदा तत्वों के निर्यात पर लगाए गए नियंत्रणों के बाद सामने आई चिंताओं के परिप्रेक्ष्य में की गई है, जिसने वैश्विक प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित किया था।
महत्त्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) क्या हैं?
- महत्त्वपूर्ण खनिज वे खनिज हैं जो किसी देश के आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं औद्योगिक प्रगति के लिए अत्यावश्यक होते हैं।
- इनकी आपूर्ति में व्यवधान अथवा खनन एवं प्रसंस्करण का कुछ देशों तक सीमित होना गंभीर सामरिक कमजोरियाँ उत्पन्न कर सकता है।
- इनका उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जाता है—
- सौर पैनल
- अर्धचालक (Semiconductors)
- पवन टरबाइन
- बैटरियाँ
- चिकित्सा उपकरण
- विद्युत वाहन (EVs)
- ये खनिज हरित एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हैं तथा भारत के ऊर्जा संक्रमण एवं आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों को समर्थन प्रदान करते हैं।
दुर्लभ मृदा तत्व (REEs)
- दुर्लभ मृदा तत्व 17 धात्विक तत्वों का समूह है, जिसमें 15 लैंथेनाइड तत्वों के साथ स्कैंडियम एवं यट्रियम सम्मिलित हैं।
- इनका व्यापक उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में होता है—
- उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स
- रक्षा प्रणालियाँ
- नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियाँ
- विद्युत वाहन
- संचार प्रणालियाँ
- परमाणु ऊर्जा
- भारत के पास विश्व का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा भंडार है, जो मुख्यतः मोनाजाइट खनिज में पाया जाता है।
स्रोत : TH
कोयला गैसीकरण से ₹3 लाख करोड़ तक के आयात का प्रतिस्थापन संभव : केंद्रीय कोयला मंत्री
पाठ्यक्रम : GS-3 / ऊर्जा
संदर्भ
- केंद्रीय कोयला मंत्री ने कहा है कि कोयला गैसीकरण के माध्यम से लगभग 3 लाख करोड़ रुपये तक के आयात का प्रतिस्थापन किया जा सकता है।
कोयला गैसीकरण क्या है?
- कोयला गैसीकरण एक ऊष्मा-रासायनिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोयले को संश्लेषित गैस में परिवर्तित किया जाता है।
- सिंगैस ईंधन-समृद्ध गैसों का मिश्रण होता है, जिसमें मुख्यतः निम्नलिखित गैसें सम्मिलित होती हैं—
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
- हाइड्रोजन (H₂)
- मीथेन (CH₄)
- उपयोग: सिंगैस का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है—
- सिंथेटिक प्राकृतिक गैस (SNG) का उत्पादन
- विद्युत उत्पादन
- ऊर्जा ईंधन (मेथनॉल एवं एथनॉल) का निर्माण
- उर्वरकों हेतु अमोनिया उत्पादन
- विभिन्न रसायनों का निर्माण
- गैसीकरण प्रक्रिया: कोयला गैसीकरण में उच्च तापमान एवं उच्च दाब पर कोयले का ऑक्सीकरण किया जाता है, जिससे सिंगैस का उत्पादन होता है।
- इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—
- सतही कोयला गैसीकरण: इस प्रक्रिया में पहले कोयले का खनन किया जाता है और बाद में उसे भूमि के ऊपर स्थापित औद्योगिक रिएक्टरों में ऑक्सीजन, भाप तथा उच्च तापमान की सहायता से गैस में परिवर्तित किया जाता है।
- भूमिगत कोयला गैसीकरण : इस प्रक्रिया में कोयले को भूमिगत अवस्था में ही गैस में परिवर्तित किया जाता है।
- इसके लिए कुओं के माध्यम से कोयला परतों में वायु अथवा ऑक्सीजन प्रविष्ट कराई जाती है तथा उत्पादित गैस को सतह पर निकाला जाता है।
कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देने हेतु पैकेज
- हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 37,500 करोड़ रुपये की योजना को स्वीकृति प्रदान की है, जिसका उद्देश्य सतही कोयला एवं लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना है।
- यह योजना वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगी तथा निम्नलिखित उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करेगी—
- द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG)
- यूरिया
- अमोनिया
- मेथनॉल
- भारत में कोयला भंडार: भारत के पास लगभग 401 अरब टन कोयला भंडार उपलब्ध है।
- देश में लगभग 47 अरब टन लिग्नाइट भंडार उपस्थित है।
- भारत की कुल ऊर्जा मिश्रण में कोयले का योगदान 55 प्रतिशत से अधिक है।
- वैश्विक स्तर पर भारत के पास चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार है।
स्रोत : TH
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