पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य/शासन
संदर्भ
- नवीनतम नमूना पंजीकरण प्रणाली (Sample Registration System – SRS) के आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) प्रति महिला 1.9 बच्चे रह गई है, जो वैश्विक औसत (2.2) तथा प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) 2.1 दोनों से कम है। प्रतिस्थापन स्तर वह न्यूनतम प्रजनन दर है, जो बिना प्रवासन (Migration) के किसी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है।
नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट, 2024 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (TFR)
- भारत की कुल प्रजनन दर (TFR), अर्थात् किसी महिला द्वारा अपने प्रजनन काल (15-49 वर्ष) के दौरान जन्म दिए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या, 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है।
- प्रतिस्थापन दर से आशय उस औसत जन्म दर से है, जो एक पीढ़ी से आगामी पीढ़ी तक जनसंख्या को बिना प्रवासन के स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है।
- वर्ष 2024 में भारत के केवल बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य थे, जहाँ TFR 2.1 से अधिक दर्ज किया गया।
- दिल्ली में सबसे कम TFR 1.2 दर्ज की गई, जबकि तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में यह 1.3 रही।
- दक्षिणी राज्यों में TFR हमेशा से राष्ट्रीय औसत से कम रही है और विगत दो दशकों में इसमें अधिक गिरावट आई है।
- वर्ष 1985 में भारत की TFR 4.3 थी, जो प्रतिवर्ष लगभग 0.06 की दर से घटती रही है तथा इसके पुनः बढ़ने के कोई संकेत नहीं हैं।
- वर्तमान प्रवृत्ति के अनुसार, वर्ष 2031 तक भारत की TFR 1.6 से भी नीचे पहुँचने का अनुमान है।
भारत में प्रजनन दर में गिरावट के कारण
- विवाह एवं मातृत्व में विलंब: विशेषकर शहरी क्षेत्रों में विवाह की औसत आयु बढ़ी है।
- करियर एवं व्यावसायिक प्राथमिकताओं के कारण दंपत्ति संतानोत्पत्ति को टाल रहे हैं।
- शहरीकरण : शहरी जीवन में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं एवं बच्चों के पालन-पोषण की लागत अधिक होती है।
- सीमित आवासीय स्थान तथा बदलती जीवनशैली छोटे परिवारों को प्रोत्साहित करती है।
- गर्भनिरोधक साधनों एवं परिवार नियोजन तक बेहतर पहुँच : प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं एवं गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता बढ़ने से दंपत्ति बच्चों की संख्या एवं उनके जन्म के बीच अंतराल की बेहतर योजना बना पा रहे हैं।
- शिशु एवं बाल मृत्यु दर में कमी : स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, पोषण तथा स्वच्छता में सुधार के कारण शिशु एवं बाल मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है।
- आर्थिक कारण : बच्चों के पालन-पोषण एवं शिक्षा पर होने वाला व्यय में निरंतर वृद्धि हुई है।
- परिवार अब कम बच्चों पर अधिक संसाधन निवेश कर उनकी शिक्षा एवं जीवन-स्तर को बेहतर बनाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- जनसांख्यिकीय संक्रमण : भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण मॉडल के उत्तरवर्ती चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसकी विशेषता निम्न जन्म दर, निम्न मृत्यु दर तथा धीमी जनसंख्या वृद्धि है।
प्रमुख चिंताएँ
- भारत एवं अन्य देशों के बीच अंतर: पश्चिमी यूरोप एवं जापान में जनसंख्या वृद्धावस्था तब आई जब वे औद्योगीकरण, औपचारिक रोजगार, व्यापक कराधान व्यवस्था तथा सुदृढ़ कल्याणकारी संस्थानों का विकास कर चुके थे।
- इसके बावजूद वृद्धावस्था का दबाव सार्वजनिक वित्त पर पड़ा और जापान का सार्वजनिक ऋण GDP के 200% से अधिक हो गया।
- भारत इससे भिन्न परिस्थितियों में जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर में प्रवेश कर रहा है।
- भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,800 अमेरिकी डॉलर है तथा प्रत्यक्ष करदाताओं का आधार अभी भी सीमित है।
- सामाजिक क्षेत्र की अधिकांश जिम्मेदारियाँ राज्य सरकारों पर हैं, जो पहले से ही वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं।
- अनौपचारिक रोजगार : अधिकांश भारतीय श्रमिक अपने पूरे कार्यकाल में अनौपचारिक अथवा अर्द्ध-औपचारिक रोजगार में कार्यरत रहते हैं।
- परिणामस्वरूप वृद्धावस्था आय-सुरक्षा औपचारिक रोजगार अनुबंधों से बाहर रह जाती है।
- अंशदान-आधारित पेंशन प्रणाली तभी प्रभावी होती है, जब रोजगार नियमित, आय स्थिर तथा दीर्घकालिक बचत संभव हो।
- वर्तमान सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था: अटल पेंशन योजना पूरे कार्यकाल में नियमित अंशदान पर आधारित है, जो अनियमित आय वाले अनौपचारिक श्रमिकों के लिए कठिन है।
- राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) के अंतर्गत 60 से 79 वर्ष की आयु के वृद्धों को मात्र ₹200 प्रति माह तथा 80 वर्ष से अधिक आयु वालों को ₹500 प्रति माह की पेंशन मिलती है।
- इतनी अल्प सहायता वृद्धजनों को आर्थिक निर्भरता से मुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असंतुलन : विभिन्न राज्यों में प्रजनन दर में उल्लेखनीय असमानता विद्यमान है।
- दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान जैसे राज्यों में यह अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है।
- इस असमानता का प्रभाव आंतरिक प्रवासन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों के आवंटन तथा श्रम बाजार की गतिशीलता पर पड़ सकता है।
सरकारी पहल
- राज्य-स्तरीय जनसंख्या नीतियाँ : आंध्र प्रदेश की जनसंख्या प्रबंधन नीति (2026) के अंतर्गत दूसरे, तीसरे एवं चौथे बच्चे के जन्म पर नकद प्रोत्साहन, निःशुल्क शिक्षा सहायता, प्रजनन (फर्टिलिटी) क्लीनिकों की स्थापना तथा मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का प्रावधान किया गया है।
- सिक्किम ने घटती प्रजनन दर से निपटने के लिए विस्तारित मातृत्व एवं पितृत्व अवकाश तथा इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) उपचार हेतु सहायता जैसी पहलें प्रारम्भ की हैं।
- बांझपन सहायता कार्यक्रम : जियो पारसी योजना के अंतर्गत पारसी समुदाय की घटती जनसंख्या को रोकने के उद्देश्य से बांझपन उपचार हेतु वित्तीय सहायता, बाल देखभाल सहायता तथा जन-जागरूकता अभियान संचालित किए जाते हैं।
- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य योजनाएँ: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत संचालित कार्यक्रम मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार, शिशु मृत्यु दर में कमी तथा परिवार निर्माण एवं संतानोत्पत्ति के अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में सहायक हैं।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के माध्यम से गर्भवती एवं धात्री (स्तनपान कराने वाली) महिलाओं को मातृत्व लाभ प्रदान किए जाते हैं।
- मिशन शक्ति: यह महिलाओं के सशक्तिकरण एवं सुरक्षा हेतु एक समेकित कार्यक्रम है।
- इसके अंतर्गत बाल देखभाल सेवाओं तथा महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण से संबंधित विभिन्न योजनाएँ सम्मिलित हैं।
- पालना योजना (राष्ट्रीय शिशु गृह योजना): यह योजना 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए डे-केयर (दिवसीय देखभाल) सुविधाएँ उपलब्ध कराती है।
- इसके अंतर्गत पोषण, स्वास्थ्य देखभाल तथा प्रारंभिक शिक्षा संबंधी सहायता प्रदान की जाती है, जिससे माताओं को कार्यबल में सक्रिय रूप से भाग लेने में सुविधा मिलती है।
- अटल वयो अभ्युदय योजना (AVYAY): AVYAY के अंतर्गत वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित वर्तमान योजनाओं, भावी रणनीतियों, लक्ष्यों, वित्तीय प्रावधानों एवं उत्तरदायित्वों को एकीकृत रूप में समाहित किया गया है।
- यह योजना वरिष्ठ नागरिकों की चार प्रमुख आवश्यकताओं—वित्तीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल तथा सम्मानजनक सामाजिक जीवन एवं मानवीय संवाद—की पूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
- इसके अतिरिक्त इसमें वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा, संरक्षण, समग्र कल्याण, जन-जागरूकता एवं समाज के संवेदनशीलकरण जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है।
- वरिष्ठ नागरिकों हेतु एकीकृत कार्यक्रम योजना (IPSrC): इस योजना के अंतर्गत विशेष रूप से निर्धन वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हेतु वृद्धाश्रमों की स्थापना की जाती है।
- इन संस्थानों में आश्रय, भोजन, चिकित्सा सुविधाएँ तथा मनोरंजन संबंधी अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं।
- सिल्वर अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन: इस पहल का उद्देश्य उद्यमियों को वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के समाधान हेतु नवाचारपूर्ण उत्पाद एवं सेवाएँ विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
- सरकार सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन नामक पोर्टल के माध्यम से इक्विटी भागीदारी के आधार पर अधिकतम ₹1 करोड़ तक की वित्तीय सहायता प्रदान कर इस उद्देश्य की प्राप्ति का प्रयास कर रही है।
आगे की राह
- संतुलित जनसंख्या नीति अपनाना : केवल जनसंख्या नियंत्रण पर केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर ऐसी जनसांख्यिकीय रणनीति अपनाई जानी चाहिए, जो जनसंख्या स्थिरीकरण एवं घटती प्रजनन दर दोनों के बीच संतुलन स्थापित करे।
- परिवार सहायता उपायों का सुदृढ़ीकरण : युवा दंपत्तियों के लिए किफायती बाल देखभाल सेवाएँ, मातृत्व एवं पितृत्व अवकाश तथा लचीली कार्य व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
- प्रजनन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार: विशेष रूप से छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बांझपन उपचार, सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकियों (ART) तथा प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच का विस्तार किया जाना चाहिए।
- लैंगिक समानता को प्रोत्साहन: देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के समान वितरण को प्रोत्साहित किया जाए तथा महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने हेतु कार्यस्थलों पर सहायक नीतियाँ लागू की जाएँ।
- राज्य-विशिष्ट हस्तक्षेपों पर बल: विभिन्न राज्यों में प्रजनन स्तर में व्यापक भिन्नता को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के अनुरूप नीतियाँ तैयार की जानी चाहिए।
- मानव पूंजी में निवेश: प्रजनन दर से संबंधित उपायों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य तथा कौशल विकास में निवेश बढ़ाकर भारत के जनसांख्यिकीय संक्रमण से अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- अंतरराष्ट्रीय अनुभव दर्शाते हैं कि निम्न प्रजनन दर आर्थिक समृद्धि के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है।
- किंतु भारत ऐसी स्थिति में व्यापक वृद्धावस्था के दौर में प्रवेश कर रहा है, जबकि वह उन आर्थिक, सामाजिक एवं संस्थागत परिवर्तनों को अभी पूर्ण रूप से संपन्न नहीं कर पाया है, जिन्होंने अन्य देशों में वृद्धावस्था की चुनौतियों का प्रभावी प्रबंधन संभव बनाया।
- अतः भारत का निम्न-प्रजनन भविष्य तभी सतत एवं संतुलित होगा, जब सुदृढ़ सार्वजनिक संस्थान धीरे-धीरे उन सामाजिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने लगें, जिन्हें अब तक बड़े परिवार स्वाभाविक रूप से निभाते रहे हैं।
Source: TH