अंकुश लगने का खतरा
पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा/बुनियादी ढांचा
संदर्भ
- पर्याप्त पारेषण लाइनों का अभाव भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के तीव्र विस्तार के मार्ग में एक प्रमुख बाधा के रूप में उभरकर सामने आया है।
स्थिति
- लगभग 21 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, अर्थात देश की कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लगभग 9%, वर्तमान में अस्थायी ग्रिड कनेक्शन के माध्यम से विद्युत ग्रिड से जुड़ी हुई है और समर्पित पारेषण अवसंरचना के उपलब्ध होने की प्रतीक्षा कर रही है।
- इनमें से लगभग 12 GW क्षमता को अधिकतम सौर उत्पादन की अवधि के दौरान “विद्युत निकासी ” संबंधी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है।
- विद्युत निकासी से तात्पर्य विद्युत संयंत्र में उत्पादित विद्युत को उपभोग केंद्र तक पहुँचाने की प्रक्रिया से है।
- वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा की तैनाती की तीव्र गति और उससे संबंधित पारेषण अवसंरचना के चालू होने के बीच असंगति के कारण लगभग 6,900 गीगावाट-घंटे (GWh) स्वच्छ विद्युत के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा।
- उद्योग जगत के अधिकारियों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि सरकार इस समस्या का समाधान नहीं करती है, तो ये परियोजनाएँ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) में परिवर्तित हो सकती हैं।
विद्युत पारेषण
- विद्युत संयंत्र में उत्पादित विद्युत को वितरण नेटवर्क तक पहुँचने और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले पारेषण लाइनों के माध्यम से भेजना आवश्यक होता है।
- इसकी मूल शृंखला इस प्रकार है:
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना → पारेषण नेटवर्क → वितरण नेटवर्क → उपभोक्ता
- भारत में सौर और पवन ऊर्जा क्षमता का तीव्र विस्तार हुआ है, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध कुछ क्षेत्रों में पारेषण अवसंरचना इस गति के अनुरूप विकसित नहीं हो पाई है।
- यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत के प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
- इन क्षेत्रों में उत्पादित विद्युत को प्रमुख मांग केंद्रों तक पहुँचाने के लिए कई बार सैकड़ों या हजारों किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।
ग्रिड पारेषण के लिए वर्तमान अवसंरचना
- जनरल नेटवर्क एक्सेस (GNA) फ्रेमवर्क: यह एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र अपनी स्थायी पारेषण कनेक्टिविटी उपलब्ध होने की प्रतीक्षा के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त पारेषण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं।
- हालांकि, T-GNA परियोजनाएँ तभी विद्युत का शेड्यूल निर्धारित कर सकती हैं, जब अतिरिक्त पारेषण क्षमता उपलब्ध हो।
- चिंताएँ: नेटवर्क में भीड़ अथवा क्षमता की कमी की स्थिति में दीर्घकालिक GNA परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप T-GNA से जुड़ी परियोजनाओं के विद्युत उत्पादन में कटौती करनी पड़ती है।
- इन परियोजनाओं को अपनी उत्पादन क्षमता के 70–80% तक विद्युत उत्पादन में कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जिससे परियोजनाओं की व्यवहार्यता और ऋण चुकाने की क्षमता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
- जब ग्रिड उत्पादित होने वाली पूरी विद्युत को समाहित करने में सक्षम नहीं होता, तो विद्युत उत्पादन को जानबूझकर कम करना पड़ सकता है। इसे विद्युत उत्पादन कटौती कहा जाता है।
पारेषण परियोजनाओं में देरी के कारण
- पारेषण अवसंरचना का विकास विद्युत उत्पादन क्षमता के निर्माण की तुलना में अधिक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है।
- प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं:
- भूमि अधिग्रहण और राइट ऑफ वे (RoW) संबंधी मुद्दे।
- पर्यावरणीय एवं अन्य वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त करने में देरी।
- पारेषण लाइनों और सबस्टेशनों के निर्माण में विलंब।
- विशेषीकृत उपकरणों की खरीद।
- नवीकरणीय ऊर्जा विकासकर्ताओं, पारेषण कंपनियों और सरकारों के बीच समन्वय।
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं तथा पारेषण अवसंरचना के चालू होने की तिथियों में असंगति।
- इसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना विद्युत उत्पादन के लिए तैयार हो, जबकि उसकी समर्पित पारेषण प्रणाली अभी निर्माणाधीन हो।
प्रमुख चिंताएँ
- विद्युत उत्पादन में कटौती: अपर्याप्त पारेषण क्षमता के कारण नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को अपना उत्पादन कम करना पड़ सकता है, जिससे स्वच्छ विद्युत की बर्बादी होती है।
- वित्तीय दबाव: विद्युत उत्पादन में कटौती से नवीकरणीय ऊर्जा विकासकर्ताओं का राजस्व कम होता है। इससे परियोजना ऋण चुकाने में कठिनाई हो सकती है और भविष्य के निवेश हतोत्साहित हो सकते हैं।
- ग्रिड स्थिरता: सौर और पवन ऊर्जा की अस्थिर प्रकृति तथा अपर्याप्त पारेषण एवं भंडारण क्षमता का संयोजन ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने और विद्युत की माँग एवं आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करने में चुनौती उत्पन्न कर सकता है।
- नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में देरी: पारेषण संबंधी बाधाएँ भारत की तीव्रता से बढ़ रही नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के प्रभावी उपयोग को धीमा कर सकती हैं, जिससे 2030 के स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति प्रभावित हो सकती है।
सरकारी पहल
- ग्रिड एकीकरण योजना: भारत के ग्रिड को 500 GW के लिए ₹2.4 लाख करोड़ की पारेषण योजना के माध्यम से पुनर्गठित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध राज्यों को प्रमुख मांग केंद्रों से जोड़ना है।
- सरकार ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तथा राजस्थान, गुजरात और लद्दाख से नई उच्च-क्षमता वाली पारेषण लाइनों के माध्यम से पारेषण अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता दे रही है।
- यद्यपि इन परियोजनाओं के कार्यान्वयन में कई वर्ष लगेंगे, लेकिन इनके चालू होने के बाद 200 GW से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।
- 2032 तक का दृष्टिकोण: सरकार ने हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) कॉरिडोर विकसित करने तथा अंतर-क्षेत्रीय पारेषण क्षमता को वर्तमान 120 GW से बढ़ाकर 2027 तक 143 GW और 2032 तक 168 GW करने की योजना बनाई है।
- प्रोत्साहन: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना, घरेलू सामग्री आवश्यकता , विभिन्न शुल्कों के आरोपण तथा पूंजीगत उपकरणों पर शुल्क छूट के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल रही है।
- राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE): NISE सौर फोटोवोल्टिक (PV), सौर तापीय तथा हाइब्रिड प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएँ और अनुसंधान सहायता प्रदान करता है।
- राज्य नोडल एजेंसियों (SNAs) की क्षमता निर्माण: परियोजनाओं के कार्यान्वयन, निगरानी और नीतियों के प्रवर्तन के लिए राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसियों को प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।
- अनुसंधान एवं नवाचार सहायता: बैटरी भंडारण, हाइब्रिड परियोजनाओं, अपतटीय पवन ऊर्जा तथा हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम: ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए IRENA, GIZ तथा अन्य वैश्विक एजेंसियों के साथ सहयोग किया जा रहा है।
- स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों की तैनाती: वोल्टेज स्थिरता बढ़ाने, प्रणाली की सुदृढ़ता में सुधार करने तथा नवीकरणीय ऊर्जा के विश्वसनीय एकीकरण को समर्थन देने के लिए उन्नत ग्रिड सहायता प्रौद्योगिकियों को तैनात करने की योजना है।
निष्कर्ष
- विगत दो वर्षों के दौरान नीतिगत ध्यान केवल ऊर्जा क्षमता में वृद्धि पर केंद्रित रहने के बजाय प्रणाली के समग्र डिजाइन की ओर स्थानांतरित हुआ है।
- ये सुधार पारेषण क्षमता के अधिकतम उपयोग और अवरुद्ध पड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को शीघ्र क्रियान्वित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम हैं। साथ ही, ये नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों में से एक का प्रत्यक्ष समाधान प्रस्तुत करते हैं।
स्रोत: IE
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