जी7 शिखर सम्मेलन 2026 और भारत: दी वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ 

चर्चा में क्यों?

  • प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस के एवियाँ-ले-बैंस में आयोजित 52वें जी-7 शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र को संबोधित किया, जो जी-7 में भारत के लगातार 8वें आमंत्रण का प्रतीक है।

जी-7 2026 में भारत: प्रमुख बिंदु

  • सदस्य देश न होने के बावजूद आउटरीच सत्रों में भारत की भागीदारी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विमर्श को आकार देने में उसकी बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने “नई साझेदारियों का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण” विषयक सत्र में ब्राज़ील, मिस्र, केन्या, दक्षिण कोरिया, विश्व बैंक तथा अफ्रीकी विकास बैंक के साथ भाग लिया।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात, केन्या, मिस्र और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपतियों तथा जापान के प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं, जिनमें व्यापार, निवेश, सामरिक साझेदारियों तथा जन-से-जन संबंधों पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने समुद्री सुरक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाले व्यापार में व्यवधानों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। उन्होंने सुरक्षित समुद्री मार्गों को सुनिश्चित करने और नाविकों की सुरक्षा के लिए सामूहिक उत्तरदायित्व पर बल दिया।
  • उन्होंने क्षमता निर्माण, कौशल विकास, कृषि, जल प्रबंधन तथा ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को समाहित करने वाले अफ्रीका में भारत के विकास सहयोग को रेखांकित किया तथा भारत को दाता नहीं, बल्कि विकास साझेदार के रूप में प्रस्तुत किया।

प्रधानमंत्री मोदी की टिप्पणियों का महत्व

  • रणनीतिक संपत्ति के रूप में विश्वास: पारस्परिक विश्वास को “हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति” बताना वैश्विक कूटनीति को लेन-देन आधारित शक्ति राजनीति से संबंध-आधारित बहुपक्षवाद की ओर पुनर्परिभाषित करता है।
  • दाता-प्राप्तकर्ता संबंधों से आगे: पारंपरिक सहायता ढाँचे को समानता-आधारित साझेदारियों से प्रतिस्थापित करने का भारत का आह्वान उसके अपने दक्षिण-दक्षिण सहयोग मॉडल के तर्क को प्रतिबिंबित करता है।
  • बहुध्रुवीय व्यवस्था: ये टिप्पणियाँ भारत के उस विश्वास को सुदृढ़ करती हैं जो 21वीं सदी में आर्थिक शक्ति के वास्तविक वितरण को प्रतिबिंबित करने वाली बहुध्रुवीय एवं प्रतिनिधिक वैश्विक शासन व्यवस्था का समर्थन करती है, न कि 1945 के बाद स्थापित व्यवस्था का।

अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के पुनर्निर्माण की चुनौतियाँ

  • भूराजनैतिक विभाजन: रूस-यूक्रेन संघर्ष, अमेरिका-ईरान तनाव तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रतिद्वंद्विताओं ने महाशक्तियों के बीच विभाजन को और गहरा कर दिया है, जिससे वैश्विक सार्वजनिक हितों पर सामूहिक कार्रवाई लगातार कठिन होती जा रही है।
  • आर्थिक विखंडन: बढ़ते शुल्क, निर्यात नियंत्रण तथा औद्योगिक अनुदान नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था का स्थान लेकर उसे भूराजनैतिक रूप से खंडित व्यवस्था में बदल रहे हैं।
  • जलवायु वित्त अंतराल: विकासशील देश लगातार जलवायु वित्त से संबंधित प्रतिबद्धताओं और वास्तविक वितरण के बीच के अंतर की ओर संकेत करते हैं। कॉप-29 ने इस तनाव को स्पष्ट रूप से उजागर किया, जहाँ विकसित देशों ने विकासशील देशों द्वारा माँगे गए प्रतिवर्ष 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य की तुलना में कहीं कम वित्तीय सहायता की पेशकश की।
  • शासन सुधार में गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार,अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष के कोटा पुनर्गठन तथा विश्व बैंक के शासन सुधार की माँगें अमेरिका सहित स्थापित हितों के कारण अब भी अवरुद्ध हैं।

भारत का विकास सहयोग: एक मजबूत पक्ष

  • अफ्रीका: भारत ने 42 अफ्रीकी देशों को 12 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की ऋण सहायता प्रदान की है। भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलन प्रक्रिया ने दक्षिण-दक्षिण एकजुटता के 60 वर्षों के इतिहास को मजबूत किया है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना प्रणाली — आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर — को वैश्विक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना भंडार के माध्यम से विकासशील देशों को महंगे पश्चिमी अथवा चीनी डिजिटल अवसंरचना मॉडलों के विकल्प के रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • ऊर्जा संक्रमण: फ्रांस के साथ सह-स्थापित भारत का अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस अब लगभग 120 सदस्य देशों वाला संगठन बन चुका है, जिससे भारत जलवायु वित्त का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का वास्तविक सह-निर्माता बनकर उभरा है।
  • टीका कूटनीति: कोविड-19 के दौरान “वैक्सीन मैत्री” पहल के अंतर्गत 100 देशों को 25 करोड़ टीकों की आपूर्ति की गई, जिसने वैश्विक एकजुटता संबंधी प्रतिबद्धताओं को व्यापक स्तर पर पूरा करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया।

जी-7 क्या है?

  • जी7 (सात देशों का समूह) विश्व की सात सबसे बड़ी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक संगठन है।
  • ये देश विश्व की लगभग 10% जनसंख्या तथा सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 30% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • सदस्य: कनाडा, फ्रांस,जर्मनी, इटली,जापान, यूनाइटेड किंगडम तथा यूनाइटेड स्टेट्स ।
  • यूरोपियन यूनियन भी जी-7 की बैठकों में भाग लेता है, किंतु उसे सात सदस्य देशों में नहीं गिना जाता।
  • पृष्ठभूमि: इस समूह की शुरुआत 1975 में तेल संकट के प्रत्युत्तर में जी-6 (फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) के रूप में हुई थी।
  • 1976 में कनाडा के शामिल होने के बाद यह जी-7 बना। 1998 में रूस के जुड़ने पर यह जी-8 बन गया, किंतु 2014 में क्रीमिया के विलय के बाद रूस की सदस्यता निलंबित कर दी गई और समूह पुनः जी-7 बन गया।
  • यद्यपि जी-7 के पास कोई औपचारिक विधायी शक्ति नहीं है, फिर भी इसके सदस्य वैश्विक आर्थिक उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रतिनिधित्व करते हैं और अक्सर ऐसी नीतियों का समन्वय करते हैं जो अंतरराष्ट्रीय मामलों तथा विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
  • अध्यक्षता: इसकी अध्यक्षता सात सदस्य देशों में से किसी एक द्वारा प्रतिवर्ष रोटेशन के माध्यम से की जाती है।

स्रोत: TH

 

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