भारत में उर्वरक सब्सिडी भार में वृद्धि

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक उर्वरक मूल्यों में तीव्र वृद्धि तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों के कारण भारत पर उर्वरक सब्सिडी का भार वर्ष 2026-27 में बढ़कर लगभग ₹3.4 लाख करोड़ तक पहुँचने की संभावना है, जो बजट अनुमान ₹1.71 लाख करोड़ का लगभग दोगुना है।

उर्वरक क्या हैं?

  • उर्वरक ऐसे सघन पादप-पोषक तत्व होते हैं, जो अकार्बनिक रासायनिक पदार्थों से निर्मित किए जाते हैं।
  • जैविक खाद के विपरीत, उर्वरकों में पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं तथा इन्हें अपेक्षाकृत कम मात्रा में प्रयोग किया जाता है।

उर्वरक सब्सिडी की कार्यप्रणाली

  • विक्रय मूल्य पर सब्सिडी: सरकार उर्वरक निर्माताओं अथवा आयातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे किसानों को उर्वरक कम कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): कुछ मामलों में सब्सिडी सीधे किसानों के बैंक खातों में हस्तांतरित की जाती है, जिससे मध्यस्थों की भूमिका कम हो तथा पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
  • निश्चित सब्सिडी दरें: यूरिया के लिए सब्सिडी उत्पाद के प्रति किलोग्राम के आधार पर निर्धारित की जाती है, जबकि डीएपी (DAP) जैसे अन्य उर्वरकों के लिए इसे बाजार मूल्यों के अनुसार समय-समय पर समायोजित किया जाता है।

उर्वरक सब्सिडी में वृद्धि के कारण

  • वैश्विक आपूर्ति व्यवधान: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण वैश्विक स्तर पर उर्वरक एवं ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हुई है।
    • चीन सहित प्रमुख आपूर्तिकर्ता देशों ने घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करने हेतु निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं।
  • आयात मूल्यों में तीव्र वृद्धि: भारत द्वारा हाल ही में किए गए यूरिया आयात के अनुबंध 935–959 अमेरिकी डॉलर प्रति टन की दर से हुए, जबकि एक वर्ष पूर्व यह दर 410–420 अमेरिकी डॉलर प्रति टन थी।
    • कोविड-19 महामारी के बाद एक उर्वरक बोरी की लागत लगभग ₹3,000 से बढ़कर ₹4,500 तक पहुँच गई है, जबकि किसानों को यह अभी भी भारी सब्सिडी पर उपलब्ध कराई जा रही है।
  • आयात पर निर्भरता: भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में से एक बना हुआ है।
    • ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तथा बहरीन जैसे खाड़ी देश भारत के कुल यूरिया आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करते हैं।

उर्वरक क्षेत्र में सरकार की पहलें

  • पीएम-प्रणाम योजना : मदर अर्थ के पुनर्स्थापन, जागरूकता सृजन, पोषण एवं सुधार हेतु प्रधानमंत्री कार्यक्रम राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा देने तथा रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने हेतु प्रारंभ किया गया है।
  • नीम-लेपित यूरिया : सरकार ने देश में सब्सिडी प्राप्त कृषि-ग्रेड यूरिया पर 100 प्रतिशत नीम-लेपन अनिवार्य किया है, जिससे पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता, फसल उत्पादकता एवं मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो तथा कृषि-ग्रेड यूरिया के गैर-कृषि उपयोग की रोकथाम की जा सके।
  • सल्फर-लेपित यूरिया (यूरिया गोल्ड): मृदा में सल्फर की कमी को दूर करने तथा किसानों की कृषि लागत को कम करने के उद्देश्य से सल्फर-लेपित यूरिया की शुरुआत की गई है।
  • पोषक-तत्व आधारित सब्सिडी नीति : इस नीति का उद्देश्य अंतिम उत्पाद के स्थान पर उसके पोषक तत्वों—नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K) तथा सल्फर (S)—की मात्रा के आधार पर सब्सिडी प्रदान कर उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करना है।
    • इस योजना के अंतर्गत सरकार पी एवं के (P&K) उर्वरकों में प्रत्येक पोषक तत्व के लिए प्रति किलोग्राम एक निश्चित सब्सिडी राशि निर्धारित करती है।
  • नैनो यूरिया : यह भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO) द्वारा विकसित एक तरल उर्वरक है, जिसे पारंपरिक यूरिया के विकल्प के रूप में विकसित किया गया है।

आगे की राह

  • उत्पादन क्षमता का विस्तार: “आत्मनिर्भर भारत” के अंतर्गत घरेलू यूरिया संयंत्रों के शीघ्र संचालन से आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है।
  • सतत कृषि पद्धतियों को प्रोत्सहन: नैनो यूरिया, जैव-उर्वरकों तथा मृदा स्वास्थ्य कार्डों के व्यापक उपयोग से दीर्घकाल में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
  • आपूर्ति श्रृंखला की प्रत्यास्थता में सुधार: भारत को विशेष क्षेत्रों पर निर्भरता कम करने के लिए अपने आयात स्रोतों का विविधीकरण करना चाहिए।
    • भविष्य में संभावित व्यवधानों से निपटने हेतु उर्वरकों के रणनीतिक भंडार विकसित किए जाने चाहिए।
  • जैव-उत्तेजकों को प्रोत्साहन: जैव-उत्तेजकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि वे पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाते हैं तथा पौधों की चयापचय क्रियाओं में सुधार करते हैं।
    • ये उत्पाद रासायनिक उर्वरकों की दक्षता बढ़ाकर उनकी वास्तविक आवश्यकता को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

Source: IE

 

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