कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन (SMAM)

पाठ्यक्रम: जीएस-3 / अर्थव्यवस्था, कृषि

सन्दर्भ

  • कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन (SMAM) छोटे किसानों, महिलाओं तथा वंचित वर्गों के लिए लक्षित मशीनीकरण सहायता के माध्यम से पूरे देश में कृषि मशीनीकरण की पहुँच का विस्तार कर रहा है।

परिचय

  • कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन (SMAM) की शुरुआत 2014–15 में की गई।
  • यह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
  • SMAM का उद्देश्य “अवांछित तक पहुँच” (Reach the Unreached) के सिद्धांत के तहत मशीनीकरण के लाभों को वंचित वर्गों तक पहुँचाना है।
  • इसमें छोटे एवं सीमांत किसान, महिलाएँ, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), किसान उत्पादक संगठन (FPOs), स्वयं सहायता समूह (SHGs) तथा ग्रामीण उद्यमी शामिल हैं।
  • यह योजना कस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs) की स्थापना को बढ़ावा देती है।
  • ये ऐसे केंद्र हैं जहाँ कृषि मशीनें, कृषि उपकरण एवं यंत्र उपलब्ध होते हैं, जिन्हें किसान किराये पर ले सकते हैं।

भारत में कृषि मशीनीकरण की स्थिति

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 2020–21 के अनुमान के अनुसार, देश में विभिन्न फसलों एवं कृषि कार्यों में मशीनीकरण का स्तर अलग-अलग है।

मशीनीकरण का स्तर:

  • सीडबेड (Seedbed) की तैयारी: प्रमुख फसलों में अत्यधिक मशीनीकरण (70% से अधिक)।
  • कटाई एवं गहाई: अधिकांश फसलों में सबसे कम मशीनीकरण (32% से कम), जबकि धान एवं गेहूँ इसके अपवाद हैं।
  • बुआई: गेहूँ में सर्वाधिक मशीनीकरण (65%)।
  • रोपण/प्रत्यारोपण: गन्ने में 20% तथा धान में 30% मशीनीकरण।
  • धान एवं गेहूँ की कटाई/गहाई: 60% से अधिक मशीनीकरण, जबकि कपास में यह बहुत कम है।

राज्यों के अनुसार:

  • तमिलनाडु, गुजरात एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मशीनों का व्यापक उपयोग होता है, लेकिन खरपतवार नियंत्रण (Weeding) मशीनों को अपनाने में कमी है।
  • सिंचाई प्रौद्योगिकियों का उपयोग गुजरात एवं तमिलनाडु में अधिक है, जबकि अन्य राज्यों में अपेक्षाकृत कम है।
  • असम एवं ओडिशा में अधिकांश कृषि कार्य अभी भी हाथ से किए जाते हैं।

विभिन्न देशों में कृषि मशीनीकरण का स्तर:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका – 95%
  • पश्चिमी यूरोप – 95%
  • सोवियत संघ – 80%
  • ब्राज़ील – 75%
  • अर्जेंटीना – 75%
  • चीन – 40%
  • भारत – 38%
  • अफ्रीका – 20%

भारतीय कृषि में मशीनीकरण की आवश्यकता 

  • श्रम की कमी: वर्ष 2017 में कृषि क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या 145.66 मिलियन थी, जो महामारी के दौरान घटकर 143.4 मिलियन रह गई।
  • ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन की प्रवृत्ति के कारण कृषि में श्रमिकों की कमी उत्पन्न हुई है।
  • मजदूरी में वृद्धि: शहरीकरण तथा अवसंरचना विकास के कारण गैर-कृषि क्षेत्रों में श्रमिकों की बढ़ती मांग से मजदूरी बढ़ रही है।
  • बढ़ती खाद्यान्न मांग को पूरा करने के लिए कृषि का मशीनीकरण आवश्यक है।
  • दक्षता में सुधार: श्रम-प्रधान उत्पादन पद्धतियों में श्रम दक्षता बढ़ाने तथा कठिन परिश्रम को कम करने के लिए नई प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता है।
  • भारत में अंतर: भारत में कृषि मशीनीकरण का स्तर 40% है, जो चीन (59.5%), ब्राज़ील (75%) तथा अमेरिका (95%) की तुलना में कम है।
  • कृषि क्षेत्र की निरंतर उत्पादकता सुनिश्चित करने के लिए इस अंतर को मशीनीकरण के माध्यम से कम करना आवश्यक है।

चुनौतियाँ

  • उच्च प्रारंभिक निवेश: आधुनिक कृषि मशीनों की खरीद लागत अधिक होने के कारण छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए उन्हें खरीदना कठिन है।
  • वित्तीय सहायता तक सीमित पहुँच: सरकारी योजनाओं के बावजूद अनेक किसानों को मशीनें खरीदने हेतु ऋण या अनुदान प्राप्त करने में कठिनाई होती है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • भौगोलिक एवं जलवायु संबंधी बाधाएँ: भारत की विविध भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियों के कारण विभिन्न प्रकार की मशीनों की आवश्यकता होती है, जो हर क्षेत्र में उपलब्ध या उपयुक्त नहीं होतीं।
  • श्रम-प्रधान कृषि पद्धतियाँ: अनेक किसान अभी भी पारंपरिक तरीकों के अभ्यस्त हैं तथा सांस्कृतिक कारणों या नई तकनीक के प्रति आशंका के कारण मशीनीकरण अपनाने में हिचकिचाते हैं।
  • अनियमित विद्युत आपूर्ति: ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की अनियमित उपलब्धता विद्युत चालित कृषि मशीनों के उपयोग में बाधा उत्पन्न करती है।
  • मौसमी मांग: कुछ कृषि मशीनों की मांग केवल विशेष मौसम में होती है, जिससे मशीन मालिकों के लिए पूरे वर्ष उनका उपयोग सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है और निवेश पर कम प्रतिफल मिलता है।

सरकारी पहल

  • कस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs): सरकार ऐसे केंद्रों की स्थापना को प्रोत्साहित करती है, जहाँ किसान महँगी कृषि मशीनों को किराये पर प्राप्त कर सकते हैं, जिससे व्यक्तिगत किसानों पर लागत का बोझ कम होता है।
  • कृषि मशीनरी प्रशिक्षण एवं परीक्षण संस्थान (FMTTIs): ये संस्थान किसानों एवं तकनीशियनों को कृषि मशीनों के संचालन एवं रखरखाव का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
  • ये कृषि मशीनों का परीक्षण एवं प्रमाणन भी करते हैं ताकि उनकी गुणवत्ता एवं प्रदर्शन मानकों को सुनिश्चित किया जा सके।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इस योजना में स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सिंचाई जैसी मशीनीकृत सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देने का प्रावधान है, जो जल संरक्षण एवं कृषि में जल के कुशल उपयोग में योगदान देती हैं।
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): यह योजना कृषि विकास एवं प्रगति को बढ़ावा देने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करते हुए कृषि मशीनीकरण सहित आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने में सहयोग करती है।
  • नवाचार एवं अनुसंधान को बढ़ावा: सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसी संस्थाओं के माध्यम से कृषि मशीनीकरण में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करती है तथा कृषि मशीनों के नवाचार एवं स्वदेशी विकास का समर्थन करती है।

स्रोत: PIB

 

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