पाठ्यक्रम: जीएस-1/भूगोल, जीएस-2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- नेपाल-चीन सीमा के पास एक विनाशकारी हिमनदीय पतन और अचानक आई बाढ़ ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन के मेगा-बांध को लेकर चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है, विशेष रूप से भारत और बांग्लादेश जैसे निचले प्रवाह वाले देशों के लिए।

पैमाना और इंजीनियरिंग
- यह परियोजना नाटकीय ‘ग्रेट बेंड’ के पास स्थित है, जहाँ यारलुंग त्सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) भारत की ओर मुड़ती है। अनुमान है कि इसकी स्थापित क्षमता 60 GW है एवं ये 300 अरब kWh वार्षिक विद्युत उत्पादन करती है जोकि थ्री गॉर्जेस बांध के विद्युत उत्पादन से तीन गुना से अधिक है।
- इस परियोजना में एक जलाशय शामिल है, जो कथित तौर पर न्यिंगची के ऊपरी प्रवाह में मेनलिंग के आसपास है, हालांकि इसे रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना के रूप में वर्णित किया गया है।
यारलुंग त्सांगपो (ज़ांगबो) नदी
- यह तिब्बत के चेमायुंगडुंग ग्लेशियर से निकलती है और अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसे सियांग के नाम से जाना जाता है।
- असम में इसमें दिबांग और लोहित जैसी सहायक नदियाँ मिलती हैं और इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है।
- इसके बाद नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी तक पहुँचती है।
- इसका बेसिन लगभग 5,80,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जो चीन (50.5%), भारत (33.3%), बांग्लादेश (8.1%) और भूटान (7.8%) में विस्तृत है।
परियोजना की प्रमुख चिंताएँ
पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय चिंताएँ:
- आपदा का जोखिम: यह परियोजना अत्यधिक भूकंप-प्रवण हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जिससे भूकंपीय जोखिम बढ़ जाता है।
- जलवायु एवं श्रृंखलाबद्ध आपदाएँ: नाजुक परमाफ्रॉस्ट/खड़ी भू-भाग में निर्माण से ग्लेशियर/GLOF के जोखिम बढ़ सकते हैं; जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ अधिक संभावित हो रही हैं।
- जैव विविधता: यारलुंग त्सांगपो ग्रैंड कैन्यन वैश्विक जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है; बांध जैव विविधता को प्रभावित कर सकता है।
- भू-राजनीतिक जोखिम:
- जल नियंत्रण एवं प्रभाव: ऊपरी तटवर्ती देश होने के कारण चीन जल प्रवाह के समय और मात्रा को नियंत्रित कर सकता है। इससे शुष्क मौसम में जल प्रवाह कम होने या अचानक पानी छोड़े जाने का जोखिम है।
- भू-राजनीतिक संकेत: विवादित सीमा के पास स्थित यह परियोजना एक संवेदनशील क्षेत्र में चीन की उपस्थिति को मजबूत करती है।
- भारत की संवेदनशीलता: ब्रह्मपुत्र अरुणाचल प्रदेश (सियांग), असम और आगे बांग्लादेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के पास बाध्यकारी जल-बंटवारा संधि का अभाव है।
- जल को लेकर प्रतिस्पर्धा: ब्रह्मपुत्र बेसिन में चीन, भारत और बांग्लादेश के हित जुड़े हुए हैं। ऊपरी प्रवाह में बांध और जल मोड़ने की योजनाएँ तनाव बढ़ा सकती हैं और क्षेत्रीय जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत-चीन सहयोग
- विशेषज्ञ स्तर तंत्र (2006): बाढ़ के मौसम के आँकड़ों और सीमा-पार नदी संबंधी मुद्दों पर वार्षिक चर्चा।
- ब्रह्मपुत्र डेटा साझाकरण: इसमें तिब्बत के तीन स्टेशनों से जून–अक्टूबर के आँकड़े शामिल होते हैं; यह व्यवस्था 2023 में समाप्त हो गई और इसके नवीनीकरण पर चर्चा चल रही है।
- सतलुज डेटा साझाकरण: इसमें जून–अक्टूबर के आँकड़े शामिल होते हैं; यह व्यवस्था 2020 में समाप्त हो गई।
- व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) (2013): यह सहयोग के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है और डेटा-साझाकरण की अवधि का विस्तार करता है।
भारत के लिए आगे की राह
- भारत की प्रतिक्रिया को मजबूत करना: भारत को रियल-टाइम जलवैज्ञानिक डेटा साझाकरण, संयुक्त आपदा-चेतावनी तंत्र, भूकंपीय एवं पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, कूटनीतिक संवाद और बेसिन-स्तरीय सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए।
- पारदर्शिता की माँग: चीन से परियोजना के तकनीकी विवरण, पर्यावरणीय आकलन और बांध-सुरक्षा संबंधी जानकारी माँगनी चाहिए।
- क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना: डेटा साझाकरण, संयुक्त पर्यावरणीय आकलन और आपदा तैयारी के लिए निचले प्रवाह वाले देशों के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
स्रोत: TH
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