पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- भारत ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के औपचारिक नीति ढाँचे के रूप में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (IT) के एक दशक को पूरा कर लिया है।
भारत का मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा
- भारत ने डॉ. उर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर 2016 में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा (FITF) अपनाया।
- आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 45ZA के अनुसार, केंद्र सरकार RBI के परामर्श से हर पाँच वर्ष में मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करती है।
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) — जो खुदरा मुद्रास्फीति को मापता है — को चुना गया बेंचमार्क है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) को सरकार द्वारा निर्धारित मुद्रास्फीति लक्ष्य को बनाए रखने का दायित्व सौंपा गया है।
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की कार्यप्रणाली
- मांग चैनल (Demand channel): उपभोग और निवेश की मांग को कम करने तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए RBI रेपो दर बढ़ाता है, जिससे उधार लेने की लागत बढ़ जाती है।
- अपेक्षा चैनल (Expectations channel): RBI परिवारों और फर्मों की मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं को अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य के अनुरूप बनाए रखने का प्रयास करता है, ताकि अपेक्षित मुद्रास्फीति बढ़े हुए वेतन और कीमतों में परिवर्तित न हो।
- दोनों तकनीकें काफी हद तक न्यू कीन्सियन फिलिप्स वक्र (NKPC) पर निर्भर करती हैं, जो उत्पादन और मुद्रास्फीति के बीच एक सकारात्मक संबंध स्थापित करता है।
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की प्रभावशीलता से संबंधित चिंताएँ
- फ्लैट फिलिप्स वक्र: अप्रैल 2012–मार्च 2026 के लिए औद्योगिक उत्पादन और CPI मुद्रास्फीति के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत का फिलिप्स वक्र काफी हद तक सपाट है।
- इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन और रोजगार में बदलाव का मुद्रास्फीति पर सीमित प्रभाव हो सकता है।
- सीमित वेतन सौदेबाजी शक्ति: भारत के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है और उसकी सौदेबाजी की शक्ति सीमित है।
- इसलिए अधिक उत्पादन और रोजगार से आवश्यक रूप से वेतन में महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हो सकती है।
- अतः फिलिप्स वक्र में निहित वेतन-उत्पादन-मुद्रास्फीति तंत्र(wage-output-inflation mechanism) भारत में कमजोर हो सकता है।
- अस्थिर मुद्रास्फीति अपेक्षाएँ: परिवारों की मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाएँ नियमित रूप से RBI के मुद्रास्फीति अनुमानों से अधिक रही हैं। औसतन, यह अंतर लगभग चार प्रतिशत अंक रहा है।
- भारतीय मुद्रास्फीति की आपूर्ति-पक्षीय प्रकृति: भारत में मुद्रास्फीति अक्सर खाद्य कीमतों में झटकों, मौसम और जलवायु संबंधी आपदाओं, आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान तथा वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों के कारण आपूर्ति-पक्ष से प्रेरित होती है।
- ब्याज दरों में वृद्धि का ऐसी आपूर्ति-पक्षीय सीमाओं से निपटने में बहुत कम प्रत्यक्ष प्रभाव होता है।
- विकास के लिए जोखिम: उच्च ब्याज दरें निजी निवेश और घरेलू उधारी को कम कर सकती हैं, जिससे विकास के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
- यदि फ्लैट फिलिप्स वक्र या आपूर्ति-पक्षीय झटकों के कारण मुद्रास्फीति प्रतिक्रिया नहीं देती है, तो मौद्रिक सख्ती कम उत्पादन और रोजगार के रूप में महँगी साबित हो सकती है।

न्यू कीन्सियन फिलिप्स वक्र (NKPC)
- न्यू कीन्सियन फिलिप्स वक्र (NKPC) मुद्रास्फीति, आर्थिक गतिविधि और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
- इसके अनुसार, वर्तमान मुद्रास्फीति अपेक्षित भविष्य की मुद्रास्फीति तथा उत्पादन या आर्थिक गतिविधि के स्तर से प्रभावित होती है।
- जब समग्र मांग और उत्पादन में वृद्धि होती है, तो रोजगार और उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
- उच्च लागत, विशेष रूप से मजदूरी, उच्च कीमतों के माध्यम से उपभोक्ताओं पर डाली जाती है।
- इसलिए, उच्च आर्थिक गतिविधि से उच्च मुद्रास्फीति हो सकती है।

स्रोत: TH