परमाणु क्षेत्र में निजी क्षेत्र के उद्यमों का प्रवेश एवं इससे संबंधित चिंताएँ

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा क्षेत्र

संदर्भ

  • परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) के अध्यक्ष ने आश्वासन दिया है कि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी के बावजूद परमाणु सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

भारत में परमाणु ऊर्जा की वर्तमान स्थिति

  • स्थापित क्षमता: भारत में वर्तमान में 25 सक्रिय परमाणु रिएक्टर हैं, जिनकी कुल क्षमता 8.7 गीगावाट-विद्युत (GWe) है। देश के परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों ने 2024-25 में 56,681 मिलियन यूनिट ऊर्जा का उत्पादन किया।
  • निरंतर योगदान: भारत के कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान हमेशा लगभग 3% रहा है।
  • नियोजित विस्तार: आगामी कुछ वर्षों में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को लगभग तीन गुना बढ़ाने की योजना है।
    • अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से स्वदेशी 700 मेगावाट (MW) और 1,000 मेगावाट के रिएक्टर विकसित किए जा रहे हैं। वर्ष 2031-32 तक स्थापित क्षमता 22.38 गीगावाट तक पहुँचने की उम्मीद है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए नागरिक परमाणु सहयोग पर 18 देशों के साथ अंतर-सरकारी समझौतों (IGAs) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह भारत के परमाणु कार्यक्रम में विश्व स्तर पर बढ़ते विश्वास को दर्शाता है।
  • निर्माणाधीन रिएक्टर: लगभग 8 GWe क्षमता वाले 10 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 6.6 GWe क्षमता वाली 10 अन्य इकाइयाँ परियोजना-पूर्व चरण में हैं।
  • लक्ष्य: भारत की योजना अपनी वर्तमान परमाणु ऊर्जा क्षमता 8,180 MW से बढ़ाकर वर्ष 2031-32 तक 22,480 MW और अंततः वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट करने की है।

परमाणु क्षेत्र में निजी क्षेत्र के उद्यमों की आवश्यकता

  • भारत के लक्ष्य: वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी करना।
    • वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों से कुल संचयी स्थापित विद्युत क्षमता का 50% प्राप्त करना।
  • वर्तमान अवसंरचना की कमी: सार्वजनिक क्षेत्र की अवसंरचना, जिसमें मुख्य रूप से न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL), भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) और NPCIL-NTPC का संयुक्त उद्यम अणुशक्ति विद्युत निगम लिमिटेड (ASHVINI) शामिल हैं, अपर्याप्त सिद्ध हो सकती है।
    •  यदि भारत को अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता 100 गीगावाट तक बढ़ानी है, तो अधिक भागीदारों की भागीदारी आवश्यक होगी।

शांति अधिनियम के अंतर्गत शासन व्यवस्था

  • भारत का परमाणु क्षेत्र परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 द्वारा शासित है। इसके अंतर्गत केवल NPCIL जैसी सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाओं को ही परमाणु ऊर्जा का उत्पादन और आपूर्ति करने की अनुमति है।
    • अब तक भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की कोई भागीदारी नहीं रही है।
  • संवेदनशील क्षेत्रों पर नियंत्रण: सरकार परमाणु ईंधन चक्र, अपशिष्ट प्रबंधन और सुरक्षा से संबंधित सभी कार्यों पर अनन्य अधिकार बनाए रखती है।
  • वैधानिक निकाय: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को औपचारिक वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है, ताकि उसकी नियामक स्वतंत्रता और अधिकार को सुदृढ़ किया जा सके।
  • निजी हितधारकों के लिए शर्तें: निजी हितधारकों को भूमि की व्यवस्था करनी होगी तथा करों सहित संपूर्ण पूंजीगत व्यय (CapEx) और परिचालन व्यय (OpEx) वहन करना होगा।
  • संयंत्र के निर्माण के बाद परिसंपत्ति को संचालन के लिए NPCIL को हस्तांतरित करना होगा।
  • विद्युत संयंत्र को कैप्टिव विद्युत उत्पादन संयंत्र का दर्जा दिया जाएगा और निजी इकाई को संयंत्र से उत्पादित विद्युत पर पूर्ण अधिकार होगा।
  • संबंधित कंपनी को अन्य उपभोक्ताओं को भी विद्युत बेचने की अनुमति होगी।
  • लाइसेंसिंग: परमाणु विद्युत संयंत्र का निर्माण और संचालन करने की इच्छुक नई इकाई को परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) से लाइसेंस प्राप्त करना होगा।
    • लाइसेंस जारी होने के बाद उसे परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) से संपर्क करना होगा।
    • AERB सुरक्षा के दृष्टिकोण से संयंत्र की अभिकल्पना (डिज़ाइन) और स्थल की उपयुक्तता की जाँच करेगा।
    • इसके बाद स्थल चयन के लिए सुरक्षा प्राधिकरण और तत्पश्चात निर्माण के लिए सुरक्षा प्राधिकरण जारी किया जाएगा।

परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र की भागीदारी के पक्ष में तर्क

  • बेहतर दक्षता और नवाचार: निजी कंपनियाँ तकनीकी प्रगति, परिचालन दक्षता और नवाचार को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे संभावित रूप से लागत कम करने और सुरक्षा मानकों में सुधार करने में सहायता मिलेगी।
  • निवेश में वृद्धि: निजी क्षेत्र के उद्यम अधिक पूंजी आकर्षित कर सकते हैं, जिससे बड़ी परमाणु परियोजनाओं की वित्तीय चुनौतियों का समाधान करने में सहायता मिलेगी।
  • परियोजनाओं का तीव्र क्रियान्वयन: प्रतिस्पर्धा और लाभ के प्रोत्साहनों से प्रेरित निजी संस्थाएँ सरकारी प्रक्रियाओं की तुलना में परमाणु परियोजनाओं को अधिक तीव्रता और प्रभावशीलता से पूरा कर सकती हैं।
  • विशेषज्ञता और वैश्विक मानक: निजी कंपनियाँ वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता को परमाणु उद्योग में ला सकती हैं, जिससे समग्र मानकों में सुधार होगा।
  • रोज़गार सृजन: निजी क्षेत्र के उद्यमों के प्रवेश से निर्माण से लेकर संचालन तक परमाणु क्षेत्र में रोज़गार के अवसर बढ़ सकते हैं।

विपक्ष में तर्क

  • सुरक्षा एवं संरक्षा संबंधी जोखिम: निजी क्षेत्र के उद्यम कठोर सुरक्षा उपायों की तुलना में लागत में कटौती को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिससे विनाशकारी दुर्घटनाओं का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
  • पारदर्शिता का अभाव: निजी कंपनियाँ सार्वजनिक संस्थानों की तुलना में कम पारदर्शी हो सकती हैं। इससे संवेदनशील परमाणु प्रौद्योगिकियों के प्रबंधन में जवाबदेही की कमी हो सकती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: परमाणु ऊर्जा उत्पादन में निजी संस्थाओं को शामिल करने से महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना पर विदेशी स्वामित्व, नियंत्रण या प्रभाव की संभावना को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • सीमित नियामक नियंत्रण: निजी कंपनियों पर कठोर नियामक निगरानी सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इससे सुरक्षा, पर्यावरण और परिचालन मानकों के अनुपालन में चूक हो सकती है।
  • जनकल्याण की तुलना में लाभ के उद्देश्य को प्राथमिकता: निजी कंपनियाँ जनकल्याण की अपेक्षा लाभप्रदता को प्राथमिकता दे सकती हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण, श्रमिकों की सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा की दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

आगे की राह

  • स्पष्ट नियामक ढाँचा: जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित चिंताओं का समाधान करते हुए सुरक्षा, अनुपालन एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक सुदृढ़ नियामक व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs): ऐसी साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिनमें सरकार निगरानी बनाए रखे, जबकि निजी क्षेत्र के उद्यम संचालन, नवाचार और निवेश की जिम्मेदारी संभालें। इससे विभिन्न हितों के बीच संतुलन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन से पहले जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को परखने हेतु प्रायोगिक परियोजनाओं और छोटे पैमाने की पहलों से शुरुआत की जानी चाहिए।

स्रोत: TH

 

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