पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- माजुली (असम) और तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल ने यह प्रदर्शित किया है कि सामुदायिक भागीदारी, विकेंद्रीकृत प्रणालियाँ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वित्तपोषण मॉडल अपशिष्ट प्रबंधन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
माजुली और तवांग के ग्रामीण अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल के बारे में
- माजुली मॉडल:
- अधिकांश पंचायतों में केंद्रीय सामग्री संग्रहण सुविधाएँ (CMCFs) स्थापित की गई हैं। इनके साथ ग्राम स्तर पर भी संग्रहण सुविधाएँ विकसित की गई हैं।
- विकेंद्रीकृत छंटाई: गैर-जैव-अपघटनीय अपशिष्ट को अलग किया जाता है और इसके बाद कबाड़ विक्रेताओं तथा पुनर्चक्रणकर्ताओं को भेजा जाता है।
- सरकार–गैर-सरकारी संगठन (NGO) साझेदारी: सरकारी एजेंसियाँ अवसंरचना और वाहनों की व्यवस्था करती हैं, जबकि साहस (Saahas) जैसे संगठन कर्मचारियों की व्यवस्था और क्षमता निर्माण में सहयोग करते हैं।
- तवांग मॉडल:
- स्वच्छता दिवस : महंगी घर-घर अपशिष्ट संग्रहण व्यवस्था के स्थान पर ग्रामीण सामूहिक रूप से अपशिष्ट को एक निर्धारित स्थान पर लाते हैं और वहीं उसका पृथक्करण करते हैं।
- बहु-श्रेणी पृथक्करण: अपशिष्ट को प्रारंभिक रूप से 22 श्रेणियों में अलग किया जाता है और बाद में सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं (MRFs) में लगभग 35 श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
- उपयोगकर्ता शुल्क: परिवार प्रति माह लगभग ₹50, जबकि दुकानें और कैफे लगभग ₹100 का भुगतान करते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन के लिए वित्तपोषण की व्यवस्था तैयार होती है।
भारत में ठोस अपशिष्ट का उत्पादन
- वित्त वर्ष 2021-22 में भारत में प्रतिदिन लगभग 1,70,000 टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न हुआ। इसमें से लगभग 1,56,000 टन एकत्र किया गया, जिसमें से करीब 54% का उपचार किया गया और 24% को लैंडफिल में डाला गया।
- शेष 22% अपशिष्ट का कोई लेखा-जोखा नहीं मिला, जिसका कारण अपशिष्ट आपूर्ति शृंखला में होने वाला रिसाव था।
- आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA), 2021 के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारतीय शहरों में लगभग 435 मिलियन टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होने का अनुमान है।
- वर्तमान में देश में केवल 645 लैंडफिल परिचालन में हैं, जबकि देश में वर्तमान डंपसाइट्स की कुल संख्या 2,452 है।
अपशिष्ट प्रबंधन में क्या कठिनाइयाँ हैं?
- उपभोग के बदलते स्वरूप: पैकेज्ड खाद्य पदार्थों, पेय पदार्थों, व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों और बहु-परतीय प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से गाँवों में गैर-जैव-अपघटनीय अपशिष्ट की मात्रा बढ़ गई है।
- उच्च संग्रहण लागत: बिखरी हुई बस्तियों, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, खराब सड़कों और पुनर्चक्रण केंद्रों से अधिक दूरी के कारण अपशिष्ट का संग्रहण एवं परिवहन महंगा हो जाता है।
- खुले में अपशिष्ट डालना: औपचारिक प्रणालियों के अभाव में अपशिष्ट को खेतों, जल निकायों में फेंक दिया जाता है या खुले में जला दिया जाता है, जिससे मृदा, जल और वायु प्रदूषण होता है।
- स्रोत पर उचित पृथक्करण का अभाव: घरेलू स्तर पर प्रायः गीले, सूखे, सैनिटरी और खतरनाक अपशिष्ट को एक साथ मिला दिया जाता है, जिससे पुनर्चक्रण, कंपोस्टिंग एवं वैज्ञानिक उपचार कठिन हो जाता है।
सरकारी पहल
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: ये नियम स्रोत पर अपशिष्ट को जैव-अपघटनीय, गैर-जैव-अपघटनीय और घरेलू खतरनाक अपशिष्ट में अलग करने को अनिवार्य करते हैं।
- ये कंपोस्टिंग, जैव-मीथेनेशन और अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के माध्यम से अपशिष्ट के प्रसंस्करण को बढ़ावा देते हैं।
- साथ ही, ये थोक अपशिष्ट उत्पादकों (जैसे आवासीय सोसायटी, होटल आदि) को अपने अपशिष्ट का स्वयं प्रसंस्करण करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
- स्वच्छ भारत मिशन (SBM): SBM-शहरी का ध्यान 100% घर-घर अपशिष्ट संग्रहण पर है तथा यह स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को प्रोत्साहित करता है।
- SBM-ग्रामीण गाँवों में जैव-अपघटनीय अपशिष्ट की कंपोस्टिंग और बायोगैस संयंत्रों को बढ़ावा देता है।
- अपशिष्ट-से-ऊर्जा परियोजनाएँ: सरकार गैर-पुनर्चक्रणीय अपशिष्ट को बिजली में परिवर्तित करने के लिए अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों को प्रोत्साहित कर रही है।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): EPR नियमों के तहत निर्माताओं और उत्पादकों को उपभोक्ता द्वारा उपयोग किए जाने के बाद उत्पन्न अपशिष्ट, जैसे प्लास्टिक अपशिष्ट और ई-अपशिष्ट, के प्रबंधन की जिम्मेदारी उठानी होती है।
- NAMASTE योजना यह एक औपचारिक पहल है, जिसका उद्देश्य अपशिष्ट बीनने वाले श्रमिकों को स्वच्छता एवं अपशिष्ट प्रबंधन रणनीति में मान्यता एवं समावेशन प्रदान करना है।
- इसके अंतर्गत अपशिष्ट संग्रहकर्ताओं को व्यावसायिक सुरक्षा प्रशिक्षण, आयुष्मान भारत–PMJAY के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा तथा पूंजीगत सब्सिडी प्रदान की जाती है।
आगे की राह
- सामुदायिक स्वामित्व: नागरिकों को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारों के रूप में देखा जाना चाहिए।
- स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था: जहाँ संभव हो, घर-घर संग्रहण व्यवस्था अपनाई जाए और जहाँ बस्तियाँ बिखरी हुई हों, वहाँ सामुदायिक संग्रहण व्यवस्था का उपयोग किया जाए।
- उपयोगकर्ता-आधारित वित्तपोषण: किफायती और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित अपशिष्ट प्रबंधन शुल्क लागू किया जाना चाहिए।
- सरकार–समुदाय साझेदारी: सार्वजनिक अवसंरचना और वित्तपोषण को सामुदायिक स्वामित्व एवं भागीदारी के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
- बाजार से जुड़ाव: पुनर्चक्रणकर्ताओं और कबाड़ विक्रेताओं के साथ विश्वसनीय एवं नियमित संपर्क स्थापित किया जाना चाहिए।
- आँकड़ों का सृजन: अपशिष्ट उत्पादन, संग्रहण, प्रसंस्करण और लागत से संबंधित विश्वसनीय एवं नियमित आँकड़े बनाए रखने चाहिए।
Source: TH
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