जीन थेरेपी के माध्यम से हेपेटाइटिस-B वायरस के DNA को निष्क्रिय कर उस पर नियंत्रण पाने की नई संभावना

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • शोधकर्ताओं ने CRMA-1001 नामक एक प्रायोगिक उपचार विकसित किया है, जिसका उद्देश्य हेपेटाइटिस-B वायरस को सीधे नष्ट करने के बजाय उसके DNA को निष्क्रिय करना है।
    • वैज्ञानिक एपिजेनेटिक्स का उपयोग करके हेपेटाइटिस-B के उपचार के लिए एक नवीन दृष्टिकोण विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।

एपिजेनेटिक्स क्या है?

  • एपिजेनेटिक्स जीव विज्ञान की वह शाखा है, जिसमें अध्ययन किया जाता है कि कोशिकाएँ DNA के अनुक्रम में परिवर्तन किए बिना जीन की सक्रियता को किस प्रकार नियंत्रित करती हैं।
  • एपिजेनेटिक परिवर्तन DNA में होने वाले ऐसे संशोधन हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि कोई जीन सक्रिय होगा या निष्क्रिय रहेगा।
    •  ये संशोधन DNA से जुड़ते हैं, लेकिन DNA के निर्माणकारी घटकों के मूल अनुक्रम में कोई परिवर्तन नहीं करते।
  •  DNA मिथाइलेशन : यह एपिजेनेटिक संशोधन का एक सामान्य प्रकार है।
    •  इसमें DNA के निर्माणकारी घटकों के साथ मिथाइल समूह जुड़ जाते हैं।
  • जब किसी जीन पर मिथाइल समूह उपस्थित होते हैं, तो वह जीन निष्क्रिय हो जाता है और उससे प्रोटीन का निर्माण नहीं होता। इस प्रक्रिया को जीन साइलेंसिंग कहा जाता है।
  • एपिजेनेटिक प्रक्रिया में त्रुटियाँ, जैसे गलत जीन का संशोधन अथवा किसी विशेष जीन या हिस्टोन में रासायनिक समूह का न जुड़ पाना, जीन की असामान्य सक्रियता या निष्क्रियता का कारण बन सकती हैं।

जीन थेरेपी

  • जीन थेरेपी एक ऐसी चिकित्सीय तकनीक है, जिसमें जीन का उपयोग करके रोगों का उपचार, रोकथाम अथवा उनका निवारण किया जाता है। इसके प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:
    • दोषपूर्ण जीन को प्रतिस्थापित करना।
    • हानिकारक जीन को निष्क्रिय करना।
  • स्वास्थ्य की सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए नए जीन को शरीर में प्रवेश कराना।
  • जीन थेरेपी की प्रमुख विधियाँ :
    • दैहिक कोशिका जीन थेरेपी : इसमें उपचारात्मक जीन को गैर-प्रजननकारी कोशिकाओं (दैहिक कोशिकाओं) में प्रवेश कराया जाता है। इससे होने वाले आनुवंशिक परिवर्तन वंशानुगत नहीं होते तथा केवल उपचार प्राप्त करने वाले व्यक्ति तक सीमित रहते हैं।
    • जनन कोशिका जीन थेरेपी : इसमें शुक्राणु एवं अंडाणु जैसी प्रजनन कोशिकाओं को लक्षित किया जाता है, जिससे आनुवंशिक परिवर्तन अगली पीढ़ियों में भी स्थानांतरित हो सकते हैं। हालाँकि, नैतिक एवं सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण भारत सहित अधिकांश देशों में इस प्रकार की थेरेपी प्रतिबंधित है।

कार्यात्मक उपचार क्या है?

  • कार्यात्मक उपचार से तात्पर्य किसी वायरस को लंबे समय तक इस सीमा तक दबाने से है कि वह सक्रिय रोग उत्पन्न न कर सके, भले ही उसका कुछ आनुवंशिक पदार्थ शरीर में उपस्थित रहे।
    • हेपेटाइटिस-B के मामले में संक्रमण चिकित्सकीय रूप से नियंत्रित होने के बावजूद वायरस का DNA यकृत की कोशिकाओं में बना रह सकता है।
  • वर्तमान उपचार पद्धतियाँ वायरस के प्रतिकृति निर्माण को नियंत्रित कर सकती हैं, लेकिन शरीर में मौजूद वायरस के स्थायी DNA को पूरी तरह समाप्त करने में सामान्यतः सक्षम नहीं हैं।
  • CRMA-1001 का उद्देश्य इस शेष वायरल DNA को निष्क्रिय करना तथा वायरस को दोबारा सक्रिय होने से रोकना है।

हेपेटाइटिस क्या है?

  • हेपेटाइटिस यकृत (Liver) में होने वाली सूजन है। हेपेटाइटिस वायरस के पाँच प्रमुख प्रकार हैं, जिन्हें हेपेटाइटिस-A, B, C, D और E के नाम से जाना जाता है।
    • हेपेटाइटिस-B एवं C दीर्घकालिक रोग उत्पन्न कर सकते हैं तथा ये दोनों मिलकर यकृत सिरोसिस, यकृत कैंसर और वायरल हेपेटाइटिस से संबंधित मृत्यु के प्रमुख कारण हैं।
  • हेपेटाइटिस-A
    • कारण: यह हेपेटाइटिस-A वायरस (HAV) के संक्रमण से होता है। इससे सामान्यतः दीर्घकालिक संक्रमण नहीं होता तथा यह प्रायः स्वतः ठीक हो जाता है।
    • संचरण: यह दूषित भोजन एवं जल के सेवन से फैलता है। इसका संचरण मुख्यतः मल-मुख मार्ग से होता है।
    • रोकथाम: टीकाकरण के माध्यम से इसे पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके टीके से 90–95% से अधिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • हेपेटाइटिस-B
    • प्रभाव: हेपेटाइटिस-B के कारण तीव्र संक्रमण हो सकता है। गंभीर मामलों में यकृत विफलता भी हो सकती है।
    • संचरण: यह संक्रमित रक्त एवं शारीरिक द्रवों, यौन संपर्क तथा संक्रमित माता से शिशु में प्रसव के दौरान फैल सकता है।
    •  उपचार एवं रोकथाम: हेपेटाइटिस-B को टीकाकरण के माध्यम से रोका जा सकता है। इसका टीका वायरस के विरुद्ध लगभग 100% तक सुरक्षा प्रदान करता है। यह टीका सामान्यतः जन्म के तुरंत बाद लगाया जाता है तथा कुछ सप्ताह बाद इसकी अतिरिक्त खुराकें दी जाती हैं।
  •  हेपेटाइटिस-C 
    • प्रभाव: इसका संक्रमण हल्के रोग से लेकर गंभीर एवं आजीवन बीमारी तक का रूप ले सकता है। इससे यकृत सिरोसिस और कैंसर होने का खतरा रहता है।
    • संचरण: हेपेटाइटिस-C वायरस रक्त के माध्यम से फैलता है। अधिकांश संक्रमण असुरक्षित इंजेक्शन प्रक्रियाओं के कारण संक्रमित रक्त के संपर्क में आने से होते हैं।
    • उपचार एवं रोकथाम: प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने वाली एंटीवायरल औषधियाँ 95% से अधिक संक्रमित व्यक्तियों को ठीक कर सकती हैं। वर्तमान में हेपेटाइटिस-C के विरुद्ध कोई प्रभावी टीका उपलब्ध नहीं है।
  •  हेपेटाइटिस-D 
    • प्रभाव: यह केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्रभावित करता है, जो पहले से हेपेटाइटिस-B से संक्रमित होते हैं, क्योंकि इस वायरस को शरीर में जीवित रहने के लिए हेपेटाइटिस-B वायरस की आवश्यकता होती है।
    • संचरण: यह सामान्यतः संक्रमित रक्त के संपर्क अथवा यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है।
    • रोकथाम: हेपेटाइटिस-D के लिए कोई विशिष्ट टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन हेपेटाइटिस-B का टीका लगवाकर इससे बचाव किया जा सकता है।
  • हेपेटाइटिस-E 
    • प्रभाव: यह सामान्यतः हल्का एवं अल्पकालिक संक्रमण होता है, जिसके लिए प्रायः किसी विशेष उपचार की आवश्यकता नहीं होती। हालाँकि, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों में यह गंभीर रूप ले सकता है।
    • संचरण: यह मुख्यतः दूषित भोजन एवं पानी के सेवन से फैलता है।
    •  रोकथाम: वर्तमान में हेपेटाइटिस-E के लिए कोई व्यापक रूप से उपलब्ध टीका नहीं है।

निष्कर्ष 

  • CRMA-1001 वायरल संक्रमणों के उपचार की दिशा में एक नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसमें वायरस पर सीधे हमला करने के बजाय एपिजेनेटिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उसके जीन को निष्क्रिय करने का प्रयास किया जाता है।
  • हालाँकि, प्रारंभिक शोध के परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन मनुष्यों में इसकी प्रभावशीलता एवं दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे और नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता है।

स्रोत: TH

 

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