पाठ्यक्रम: GS2/शासन, GS3/सुरक्षा
संदर्भ
- मतदाता सूचियों से संबंधित विरोध-प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पोस्ट पर हालिया प्रतिबंधों ने भारत में सरकार की सामग्री प्रतिबंधित करने की शक्तियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन के मुद्दे को प्रकट किया है।
भारत में ऑनलाइन सामग्री निष्कासन को नियंत्रित करने वाला विधिक ढाँचा
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 69A: केंद्र सरकार को निर्धारित आधारों पर ऑनलाइन उपलब्ध सूचना तक सार्वजनिक पहुँच को अवरुद्ध करने का निर्देश देने का अधिकार प्रदान करती है।
- सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 का नियम 3(1)(d): वैध न्यायालयी आदेश अथवा अधिकृत सरकारी एजेंसी से प्राप्त निर्धारित मानदंडों के अनुरूप सूचना के आधार पर मध्यस्थों को निर्दिष्ट गैर-कानूनी सामग्री हटाने या उस तक पहुँच निष्क्रिय करने की आवश्यकता होती है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026: सामग्री हटाने की समय-सीमा को 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दिया तथा कृत्रिम रूप से निर्मित सूचना की पहचान और उस पर लेबल लगाने संबंधी अतिरिक्त दायित्व लागू किए।
- IT अधिनियम की धारा 79(3)(b): यदि मध्यस्थ गैर-कानूनी सामग्री के संबंध में विधिक रूप से वैध अधिसूचनाओं पर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो वे सशर्त सुरक्षित आश्रय संरक्षण खो सकते हैं।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसमें डिजिटल मंचों के माध्यम से सूचना प्राप्त करने और उसका संचार करने का संवैधानिक अधिकार भी शामिल है।
- अनुच्छेद 19(2): निर्धारित आधारों पर वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, बशर्ते वे संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
- – अनुच्छेद 21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, जिसमें डिजिटल परिवेश में निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के पहलू भी शामिल हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया तथा धारा 79(3)(b) की व्याख्या को सीमित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थों को सामग्री हटाने की बाध्यता तभी होगी, जब उन्हें न्यायालय अथवा विधिसम्मत प्रक्रिया के अंतर्गत कार्य करने वाले सरकारी प्राधिकरण द्वारा ऐसा निर्देश दिया जाए।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट पर व्यक्त विचारों को ऑफलाइन अभिव्यक्ति के समान संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
- न्यायालय ने रेखांकित किया कि अस्पष्ट कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त प्रतिबंधों की कसौटी पर खरे न उतरने पर अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करते हैं।
- अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को आनुपातिकता के सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिए।
- इस कसौटी में प्रतिबंध का भौगोलिक क्षेत्र, आपातकाल की स्थिति, तात्कालिकता की प्रकृति, प्रतिबंध की अवधि तथा लगाए गए प्रतिबंध का स्वरूप शामिल हैं।
डिजिटल अभिव्यक्ति का उत्तरदायी विनियमन क्यों आवश्यक है?
- कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा: महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दिव्यांगजनों की गरिमा को ठेस पहुँचाने तथा भेदभाव को बढ़ावा देने वाली अपमानजनक सामग्री को रोकने में सहायता मिलती है।
- सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना: फर्जी खबरों, घृणास्पद भाषणों और भड़काऊ सामग्री पर नियंत्रण रखने में सहायता मिलती है, जो सामाजिक तनाव एवं हिंसा को उत्पन्न कर सकती है।
- डिजिटल मंचों की जवाबदेही: हानिकारक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए एल्गोरिदम आधारित अनुशंसा प्रणालियों और सामग्री मॉडरेशन में पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है।
- वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: यूरोपीय संघ का डिजिटल सेवा अधिनियम और ब्रिटेन का ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम डिजिटल मंचों की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले नियामक ढाँचों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
सोशल मीडिया सामग्री हटाने से जुड़ी चिंताएँ
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव : व्यापक या अस्पष्ट प्रतिबंध पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को सरकार की नीतियों की वैध आलोचना करने से हतोत्साहित कर सकते हैं।
- पारदर्शिता का अभाव: उपयोगकर्ताओं को अपनी सामग्री प्रतिबंधित किए जाने के विशिष्ट कारणों, संबंधित विधिक प्रावधानों अथवा जिम्मेदार प्राधिकरण के संबंध में पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती।
- एल्गोरिदम आधारित सेंसरशिप: स्वचालित मॉडरेशन और अनुशंसा प्रणालियाँ संदर्भ संबंधी त्रुटियों के कारण वैध सामग्री को भी प्रतिबंधित कर सकती हैं। विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटनाओं के दौरान यह समस्या अधिक गंभीर हो जाती है।
- विनियामक शक्तियों का केंद्रीकरण: सरकारी परामर्शों और डिजिटल मंचों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पर बढ़ती निर्भरता सामग्री प्रतिबंधों की स्वतंत्र निगरानी को कमजोर कर सकती है।
- शिकायत निवारण में देरी: उपयोगकर्ताओं को अपील के निस्तारण के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, जबकि उनकी सामग्री या खाते अनुपलब्ध रहते हैं। इससे पत्रकारिता, आजीविका और सार्वजनिक सहभागिता प्रभावित होती है।
आगे की राह
- आनुपातिक प्रवर्तन: सामग्री हटाने को अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाना चाहिए। जहाँ संभव हो, वहाँ सामग्री पर चेतावनी या लेबल लगाना, उचित संदर्भ उपलब्ध कराना तथा एल्गोरिदम के माध्यम से उसके प्रसार को सीमित करने जैसे विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था: डिजिटल मंचों को अपने निर्णयों के स्पष्ट कारण बताने, समयबद्ध अपील की सुविधा देने तथा स्वचालित प्रतिबंधों की सार्थक मानवीय समीक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- स्वतंत्र निगरानी: स्वतंत्र प्राधिकरणों द्वारा समय-समय पर समीक्षा और न्यायिक निगरानी के माध्यम से सामग्री अवरुद्ध करने की शक्तियों के दुरुपयोग को रोका जाना चाहिए।
- डिजिटल साक्षरता: नागरिकों को ऑनलाइन सूचना साझा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता, स्रोत और संदर्भ की पुष्टि करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत को भ्रामक सूचनाओं, डीपफेक और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली ऑनलाइन सामग्री से निपटने के लिए एक सशक्त नियामक ढाँचे की आवश्यकता है। हालाँकि, सामग्री पर नियंत्रण की प्रक्रिया का उपयोग वैध आलोचना अथवा जनहित से जुड़े प्रश्नों को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
- इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था तथा वाक् एवं अभिव्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक खुला, पारदर्शी, जवाबदेह और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 31-10-2026