श्रीलंका में विद्युत ग्रिड के ध्वस्त होने से ग्रिड स्थिरता को लेकर चिंताओं में वृद्धि

पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा/बुनियादी ढांचा

संदर्भ 

  • हाल ही में, श्रीलंका का राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड ध्वस्त हो गया, जिसके पश्चात छतों पर सौर ऊर्जा प्रणाली संचालित करने वाले उपभोक्ताओं को आगामी आदेश तक अपनी प्रणालियाँ बंद करने के लिए कहा गया।
    • इस निर्देश ने विद्युत ग्रिड में बड़े पैमाने पर रूफटॉप सौर ऊर्जा के एकीकरण से जुड़ी चुनौतियों को उजागर किया है।

परिचय

  •  हालिया घटना ने इस प्रश्न को फिर से प्रासंगिक बना दिया है कि ग्रिड की स्थिरता को प्रभावित किए बिना विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन की बढ़ती मात्रा का प्रबंधन किस प्रकार किया जा सकता है।
  • यह मुद्दा भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत तीव्रता से रूफटॉप सौर ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है, जो वर्तमान में 33.41 गीगावाट (GW) है।

रूफटॉप सौर ऊर्जा प्रणालियाँ विद्युत ग्रिड से कैसे जुड़ती हैं?

  • रूफटॉप सौर ऊर्जा प्रणालियाँ इन्वर्टर के माध्यम से विद्युत ग्रिड से जुड़ी होती हैं। इन्वर्टर सौर पैनलों द्वारा उत्पन्न दिष्ट धारा (DC) को प्रत्यावर्ती धारा (AC) में परिवर्तित करता है, जिसका उपयोग विद्युत प्रणाली में किया जाता है।
  • इन इन्वर्टरों में अंतर्निहित सुरक्षा तंत्र होते हैं, जो ग्रिड का वोल्टेज अथवा आवृत्ति निर्धारित सीमाओं से बाहर जाने पर संबंधित प्रणालियों को ग्रिड से पृथक कर सकते हैं।
  • यदि बड़ी संख्या में रूफटॉप सौर ऊर्जा प्रणालियाँ एक साथ ग्रिड से अलग हो जाती हैं, तो विद्युत उत्पादन में अचानक आई कमी ग्रिड की स्थिरता को और अधिक प्रभावित कर सकती है।

विद्युत पारेषण

  • विद्युत संयंत्रों में उत्पादित विद्युत को उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले पारेषण लाइनों के माध्यम से वितरण नेटवर्क तक पहुँचाया जाता है।
  • विद्युत आपूर्ति की मूल शृंखला इस प्रकार है:
    • नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना → पारेषण नेटवर्क → वितरण नेटवर्क → अंतिम उपभोक्ता।
  •  भारत की सौर एवं पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता में तीव्रता से वृद्धि हुई है, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध कुछ क्षेत्रों में पारेषण अवसंरचना का विकास उसी गति से नहीं हो पाया है।
  • यह स्थिति इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
    • इन क्षेत्रों में उत्पादित विद्युत को प्रमुख विद्युत मांग वाले केंद्रों तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों या हजारों किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ सकती है।

ग्रिड पारेषण के लिए वर्तमान अवसंरचना

  • सामान्य नेटवर्क अभिगम ढाँचा: यह एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को उनका स्थायी पारेषण कनेक्शन मिलने तक उपलब्ध अतिरिक्त पारेषण क्षमता का उपयोग करने की अनुमति दी जाती है।
  • T-GNA परियोजनाएँ: इन परियोजनाओं को केवल तभी विद्युत पारेषण एवं आपूर्ति निर्धारित करने की अनुमति होती है, जब नेटवर्क में अतिरिक्त पारेषण क्षमता उपलब्ध हो।
  • प्रमुख चिंताएँ: नेटवर्क में भीड़भाड़ की स्थिति में दीर्घकालिक GNA परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप T-GNA से जुड़ी परियोजनाओं के विद्युत उत्पादन में कटौती करनी पड़ती है।
    • इन परियोजनाओं को अपनी उत्पादन क्षमता के लगभग 70–80% तक उत्पादन कटौती का सामना करना पड़ रहा है, जिससे परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता और ऋण चुकाने की क्षमता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • जब विद्युत ग्रिड उत्पादित होने वाली पूरी विद्युत को वहन करने में सक्षम नहीं होता, तब विद्युत उत्पादन को जानबूझकर कम करना पड़ सकता है। इसे विद्युत उत्पादन में कटौती कहा जाता है।

पारेषण परियोजनाओं में देरी क्यों हो रही है?

  • विद्युत उत्पादन क्षमता की तुलना में पारेषण अवसंरचना का विकास अधिक जटिल एवं समय लेने वाली प्रक्रिया है।
  • इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
    •  भूमि अधिग्रहण एवं मार्गाधिकार से संबंधित समस्याएँ।
    •  पर्यावरणीय एवं अन्य वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त करने में देरी।
    •  पारेषण लाइनों एवं विद्युत उपकेंद्रों के निर्माण में विलंब।
    •  विशेषीकृत उपकरणों की खरीद एवं उपलब्धता से संबंधित समस्याएँ।
    •  नवीकरणीय ऊर्जा विकासकर्ताओं, पारेषण कंपनियों तथा सरकारों के बीच समन्वय का अभाव।
    •  नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं तथा पारेषण अवसंरचना के चालू होने की निर्धारित तिथियों में असंगति।
  • इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना विद्युत उत्पादन के लिए तैयार होती है, जबकि उससे संबंधित समर्पित पारेषण प्रणाली का निर्माण अभी जारी रहता है।

प्रमुख चिंताएँ 

  • विद्युत उत्पादन में कटौती : अपर्याप्त पारेषण क्षमता के कारण नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को अपना उत्पादन कम करना पड़ सकता है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग नहीं हो पाता और उसका अपव्यय होता है।
  •  वित्तीय दबाव : विद्युत उत्पादन में कटौती से नवीकरणीय ऊर्जा विकासकर्ताओं का राजस्व कम हो जाता है। इससे परियोजनाओं के ऋण का भुगतान करना कठिन हो सकता है तथा भविष्य के निवेश हतोत्साहित हो सकते हैं।
  • ग्रिड स्थिरता : सौर एवं पवन ऊर्जा की अनियमित उत्पादन प्रकृति के साथ अपर्याप्त पारेषण और ऊर्जा भंडारण सुविधाएँ ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने तथा विद्युत की मांग एवं आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करने में चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकती हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों की प्राप्ति में देरी: पारेषण संबंधी बाधाएँ भारत की तीव्रता से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के प्रभावी उपयोग को धीमा कर सकती हैं। इससे वर्ष 2030 के स्वच्छ ऊर्जा एवं जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति प्रभावित हो सकती है।

सरकारी पहलें 

  • ग्रिड एकीकरण योजना : भारत के विद्युत ग्रिड को 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के एकीकरण हेतु 2.4 लाख करोड़ रुपये की पारेषण योजना के माध्यम से पुनर्गठित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध राज्यों को विद्युत मांग वाले प्रमुख केंद्रों से जोड़ा जा रहा है।
    • सरकार ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तथा राजस्थान, गुजरात और लद्दाख से नई उच्च क्षमता वाली पारेषण लाइनों के माध्यम से पारेषण अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता दे रही है।
    • ये परियोजनाएँ बहुवर्षीय हैं, लेकिन इनके पूर्ण होने के बाद 200 GW से अधिक की नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को ग्रिड से जोड़ने में सहायता मिलेगी।
  • वर्ष 2032 तक का दृष्टिकोण : सरकार ने उच्च वोल्टेज दिष्ट धारा कॉरिडोर विकसित करने तथा अंतर-क्षेत्रीय पारेषण क्षमता को वर्ष 2027 तक 120 GW से बढ़ाकर 143 GW और वर्ष 2032 तक 168 GW करने की योजना बनाई है।
  • प्रोत्साहन : उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLI), घरेलू सामग्री आवश्यकता, शुल्कों के अधिरोपण तथा पूंजीगत उपकरणों पर शुल्क छूट के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल रही है।
  • राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE): यह सौर फोटोवोल्टिक (Solar PV), सौर तापीय एवं हाइब्रिड प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएँ तथा अनुसंधान संबंधी सहायता प्रदान करता है।
  • राज्य नोडल एजेंसियों की क्षमता निर्माण : राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसियों को परियोजना क्रियान्वयन, निगरानी एवं नीतियों के प्रभावी अनुपालन के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।
  • अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहन : बैटरी ऊर्जा भंडारण, हाइब्रिड परियोजनाओं, अपतटीय पवन ऊर्जा तथा हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम : ज्ञान एवं विशेषज्ञता के आदान-प्रदान के लिए अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA), जर्मन विकास सहयोग एजेंसी (GIZ) तथा अन्य वैश्विक संस्थाओं के साथ सहयोग किया जा रहा है।
  • स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों की तैनाती : वोल्टेज स्थिरता बढ़ाने, विद्युत प्रणाली की सुदृढ़ता में सुधार करने तथा नवीकरणीय ऊर्जा के विश्वसनीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए उन्नत ग्रिड सहायता प्रौद्योगिकियों को अपनाने की योजना है।

निष्कर्ष 

  • विगत दो वर्षों में नीतिगत प्राथमिकताओं में केवल विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ाने से हटकर संपूर्ण विद्युत प्रणाली के बेहतर नियोजन एवं संरचना विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • ये सुधार पारेषण अवसंरचना के प्रभावी उपयोग को अनुकूल बनाने तथा पारेषण संबंधी बाधाओं के कारण लंबित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को शीघ्र क्रियान्वित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं। इससे इस क्षेत्र की प्रमुख क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियों का समाधान करने में सहायता मिलेगी।

स्रोत: IE

 

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