पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
चर्चा में क्यों?
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की उदारीकृत विप्रेषण योजना (LRS) के अंतर्गत भारत से विदेशों में प्रेषित जाने वाली धनराशि वर्ष 2026 के पूर्व आठ महीनों के दौरान 20 अरब अमेरिकी डॉलर के आँकड़े को पार कर गई है।
उदारीकृत विप्रेषण योजना क्या है?
- शुरुआत एवं वार्षिक सीमा: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा वर्ष 2004 में इस योजना की शुरुआत की गई थी। प्रारंभ में इसकी वार्षिक सीमा 25,000 अमेरिकी डॉलर निर्धारित की गई थी।
- वर्तमान में इसके अंतर्गत भारत में निवास करने वाले व्यक्ति स्वीकृत चालू खाता अथवा पूंजीगत खाता लेन-देन के लिए प्रति वित्तीय वर्ष अधिकतम 2,50,000 अमेरिकी डॉलर विदेश भेज सकते हैं।
- अनुमत उद्देश्य: इस योजना के अंतर्गत विदेश यात्रा, शिक्षा, चिकित्सा उपचार, रिश्तेदारों के भरण-पोषण तथा विदेशी परिसंपत्तियों में निवेश के लिए धनराशि भेजने की अनुमति है।
- पात्रता: यह योजना केवल भारत में निवास करने वाले व्यक्तियों के लिए उपलब्ध है। कंपनियाँ, हिंदू अविभाजित परिवार (HUFs), साझेदारी फर्म तथा ट्रस्ट इसके अंतर्गत धनराशि नहीं भेज सकते।
- प्रतिबंधित लेन-देन: इस योजना के अंतर्गत लॉटरी टिकटों एवं प्रतिबंधित पत्रिकाओं की खरीद, FATF के मानकों का अनुपालन न करने वाले देशों के साथ लेन-देन तथा किसी अन्य भारतीय निवासी के विदेशी खाते में विदेशी मुद्रा उपहार स्वरूप भेजने जैसे कुछ लेन-देन प्रतिबंधित हैं।
- विदेशी मुद्रा खाते पर प्रतिबंध: यह योजना भारत में रहने वाले व्यक्तियों को देश के अंदर विदेशी मुद्रा खाते खोलने की अनुमति भी नहीं देती है।
हालिया प्रवृति
- विदेश यात्रा का प्रभुत्व: जनवरी से अगस्त 2026 के दौरान विदेश यात्रा के लिए भेजी गई धनराशि 10.96 अरब अमेरिकी डॉलर रही, जो विगत वर्ष की समान अवधि के 10.67 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह राशि 16.438 अरब अमेरिकी डॉलर रही।
- शिक्षा संबंधी विप्रेषण में वृद्धि: शिक्षा के लिए विदेश भेजी जाने वाली धनराशि मार्च 2026 में 450.16 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर अगस्त 2026 में 855.52 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई, जो लगभग दोगुनी वृद्धि को दर्शाती है।
इस वृद्धि का महत्त्व क्यों है?
- बाह्य क्षेत्र पर प्रभाव: विदेशों में अधिक धनराशि भेजे जाने से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है तथा देश से विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह होता है।
- रुपये पर दबाव: निरंतर विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ा सकता है, विशेषकर वैश्विक अनिश्चितता की अवधि में।
- वित्तीय एकीकरण: विदेशों में निवेश से भारतीय निवासियों की वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती भागीदारी का संकेत मिलता है।
- घरेलू व्यय: यात्रा एवं शिक्षा संबंधी विप्रेषण में वृद्धि अंतरराष्ट्रीय आवागमन और व्यय में बढ़ोतरी को दर्शाती है।
प्रमुख चिंताएँ
- निरंतर पूंजी बहिर्वाह से भुगतान संतुलन तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन प्रभावित हो सकता है।
- विदेशों में बड़े पैमाने पर निवेश करने से भारतीय निवासियों को वैश्विक वित्तीय बाजारों के जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
- यात्रा एवं अन्य उद्देश्यों के लिए विदेश भेजी जाने वाली धनराशि में वृद्धि से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ सकती है।
सरकार एवं RBI की प्रतिक्रिया
- स्रोत पर कर संग्रह (TCS): विदेश भेजी जाने वाली धनराशि पर उद्देश्य एवं निर्धारित सीमा के अनुसार TCS लगाया जाता है। यह एक निवारक उपाय के रूप में कार्य करता है तथा लेन-देन की निगरानी एवं पारदर्शिता को बेहतर बनाता है।
- निगरानी व्यवस्था: बैंक LRS के अंतर्गत किए गए लेन-देन की जानकारी रिपोर्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त, स्थायी खाता संख्या (PAN) से जुड़ी निगरानी के माध्यम से बड़े पैमाने पर होने वाले विदेशी मुद्रा बहिर्वाह की पहचान की जाती है।
- घरेलू विकल्पों को बढ़ावा: GIFT सिटी भारत के अंदर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाएँ उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसरों को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य शिक्षा पर होने वाले व्यय को देश के भीतर बनाए रखना है।
आगे की राह
- भारतीय निवासियों को वैश्विक अवसरों तक वैध पहुँच प्रदान करने तथा व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
- LRS के अंतर्गत होने वाले लेन-देन की निगरानी और विदेशी मुद्रा संबंधी नियमों के अनुपालन को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
- विदेशों में निवेश से जुड़े जोखिमों तथा कर संबंधी दायित्वों के प्रति नागरिकों में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।
- यदि विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह बाह्य क्षेत्र पर निरंतर दबाव उत्पन्न करता है, तो आँकड़ों पर आधारित उपयुक्त नीतिगत उपाय अपनाए जाने चाहिए।
स्रोत: IE