पाठ्यक्रम: GS1/समाज; GS2/ सामाजिक न्याय
संदर्भ
- हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक महिला संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। याचिका में तर्क दिया गया है कि NALSA बनाम भारत संघ (2014) के बाद विकसित नियामक व्यवस्था से “जैविक महिलाओं” के अधिकार एवं हित प्रभावित होते हैं।
NALSA व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
- न्यायिक आधार: सर्वोच्च न्यायालय ने NALSA मामले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘तृतीय लिंग’ के रूप में मान्यता प्रदान की। न्यायालय ने माना कि लैंगिक पहचान अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता का अभिन्न अंग है तथा अनुच्छेद 15 और 16 में प्रयुक्त ‘लिंग’ (Sex) शब्द में लैंगिक पहचान भी शामिल है।
- स्व-पहचान का अधिकार: न्यायालय ने शल्य चिकित्सा की अनिवार्यता के बिना व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने के अधिकार को मान्यता दी।
- सकारात्मक कार्रवाई: केंद्र एवं राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के रूप में मान्यता देने तथा उनके कल्याण के लिए योजनाएँ संचालित करने का निर्देश दिया गया।
- वैधानिक ढाँचा: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को परिभाषित करता है, जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी पहचान प्रमाण-पत्र का प्रावधान करता है तथा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद के गठन का प्रावधान करता है।
याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताएँ
- लिंग आधारित संरक्षण के दायरे में कमी: कार्यस्थल पर उत्पीड़न, घरेलू हिंसा एवं यौन अपराधों से संबंधित कानून महिलाओं की शारीरिक संरचना एवं उनकी संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। पहचान की श्रेणी के विस्तार से इन कानूनों के दायरे और प्रभावशीलता को लेकर अस्पष्टता उत्पन्न हो सकती है।
- आरक्षण में संभावित प्रतिस्पर्धा: महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 के अंतर्गत महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। आलोचकों का तर्क है कि लैंगिक पहचान पर आधारित दावों के कारण इन सीटों के लिए जैविक महिलाओं के साथ प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- एकल-लिंग आधारित स्थान एवं खेल: कारागार, आश्रय गृह, छात्रावास, शौचालय तथा महिलाओं की खेल प्रतियोगिताएँ निजता एवं सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों ने निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पात्रता संबंधी नियमों को अधिक कठोर बनाया है।
- सत्यापन की कमजोर व्यवस्था: चिकित्सकीय अथवा वस्तुनिष्ठ जाँच के बिना स्व-पहचान की अनुमति का दुरुपयोग होने की आशंका व्यक्त की गई है, विशेषकर तब जब लैंगिक पहचान से जुड़े लाभों का दायरा बढ़ रहा हो।
- विधायी रिक्तता: न्यायालयों ने न्यायिक व्याख्या के माध्यम से अधिकारों का विस्तार किया है, जबकि संसद ने महिलाओं एवं ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और लाभों के बीच संभावित टकराव को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया है।
प्रतितर्क: यह व्यवस्था क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- संवैधानिक नैतिकता: नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) तथा के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के निर्णयों में पहचान एवं निजता को मूल स्वतंत्रताओं का अभिन्न अंग माना गया है। व्यक्ति की गरिमा केवल उसकी जैविक संरचना के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती।
- बहिष्करण के प्रमाण: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शिक्षा बीच में छोड़ने, बेरोजगारी तथा हिंसा जैसी समस्याओं का उच्च स्तर पर सामना करना पड़ता है। वर्ष 2011 की जनगणना में लगभग 4.8 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गणना की गई थी, जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह संख्या वास्तविक संख्या से कम है।
- क्रियान्वयन का अभाव: आरक्षण के संबंध में NALSA के निर्देशों को अभी तक बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया है। अनेक राज्यों में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर रहे हैं।
- समान संरक्षण: वर्ष 2019 के अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के यौन शोषण के लिए केवल छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। यह महिलाओं के विरुद्ध समान प्रकृति के अपराधों के लिए निर्धारित दंड की तुलना में काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान विधिक ढाँचे में भी असमानता विद्यमान है।
- प्रक्रियागत आलोचना: आलोचकों का कहना है कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पहचान प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया तथा संशोधित प्रमाण-पत्र के लिए शल्य चिकित्सा से जुड़ी शर्तें NALSA के स्व-पहचान के सिद्धांत के विपरीत हैं।
अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम
- यूनाइटेड किंगडम: महिलाओं के लिए स्कॉटलैंड लिमिटेड बनाम स्कॉटिश मिनिस्टर्स (2025) मामले में ब्रिटेन के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि समानता अधिनियम, 2010 के अंतर्गत ‘महिला’ और ‘लिंग’ शब्द जैविक लिंग को संदर्भित करते हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: हालिया न्यायिक घटनाक्रमों में महिलाओं की खेल श्रेणियों में पात्रता निर्धारित करने के लिए जैविक लिंग को आधार बनाने से संबंधित मुद्दों पर विचार किया गया है।
आगे की राह
- संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन: ऐसी नीतियाँ बनाई जानी चाहिए, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गरिमा एवं समानता की रक्षा करने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा से संबंधित वैध चिंताओं का भी समाधान करें।
- संदर्भ-आधारित दृष्टिकोण: खेल, संस्थागत आवास व्यवस्था तथा सार्वजनिक सुविधाओं से संबंधित मुद्दों के लिए उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप अलग-अलग नियम बनाए जाने की आवश्यकता हो सकती है।
- हितधारकों के साथ परामर्श: नीतियों के निर्माण में महिला संगठनों, ट्रांसजेंडर समुदायों, विधि विशेषज्ञों तथा अन्य संबंधित हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2026
- स्व-पहचान के अधिकार की समाप्ति: इस अधिनियम के माध्यम से वर्ष 2019 के अधिनियम में निहित स्वयं की अनुभूत लैंगिक पहचान के अधिकार को संस्थागत एवं चिकित्सकीय सत्यापन की अनिवार्यता से प्रतिस्थापित किया गया है।
- चिकित्सा बोर्ड एवं प्रमाणन: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को संशोधित पहचान प्रमाण-पत्र प्राप्त करना होगा। इसके लिए चिकित्सकीय संस्थान द्वारा उपलब्ध कराए गए चिकित्सा मूल्यांकन संबंधी आँकड़ों के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणन किया जाएगा।
- श्रेणियों में परिवर्तन: विधेयक में अधिनियम के अंतर्गत शामिल निम्नलिखित श्रेणियों को हटा दिया गया है:
- ट्रांस-मैन या ट्रांस-वुमन, चाहे संबंधित व्यक्ति ने लिंग पुनर्निर्धारण शल्य चिकित्सा, हार्मोन थेरेपी, लेजर थेरेपी अथवा इस प्रकार की अन्य चिकित्सा कराई हो या नहीं।
- जेंडरक्वियर व्यक्ति।
- सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान एवं जैविक विविधताओं को बनाए रखना: इसमें किन्नर, हिजड़ा, अरावनी एवं जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों तथा जन्मजात जैविक विविधताओं को शामिल रखा गया है।
स्रोत: TH
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