पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- आईडीबीआई बैंक की 60.72% हिस्सेदारी को फेयरफैक्स फाइनेंशियल को ₹26,544 करोड़ में बेचने के प्रस्ताव से वित्त वर्ष 2026–27 में भारत की विनिवेश प्राप्तियाँ बढ़कर ₹82,301 करोड़ होने की संभावना है। यह ₹80,000 करोड़ के वार्षिक लक्ष्य से अधिक है।
भारत सरकार की विनिवेश नीति
- भारत सरकार की विनिवेश नीति के दो प्रमुख घटक हैं:
- रणनीतिक विनिवेश एवं निजीकरण
- केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री
- रणनीतिक विनिवेश: इसके अंतर्गत किसी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (CPSE) में सरकार की संपूर्ण अथवा पर्याप्त हिस्सेदारी बेचने के साथ उसके प्रबंधन का नियंत्रण भी हस्तांतरित किया जाता है।
- निजीकरण: यह रणनीतिक विनिवेश का एक उपप्रकार है। इसके अंतर्गत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम में सरकार की हिस्सेदारी और प्रबंधन का नियंत्रण किसी निजी रणनीतिक खरीदार को हस्तांतरित किया जाता है।
- अन्य रणनीतिक विनिवेश: कुछ मामलों में सरकारी हिस्सेदारी और प्रबंधन का नियंत्रण किसी अन्य केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम को हस्तांतरित किया जाता है।
- अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री: कुछ केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में प्रबंधन का नियंत्रण हस्तांतरित किए बिना सरकार अपनी आंशिक हिस्सेदारी बेचती है। इसके लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा अनुमोदित विभिन्न विधियों का उपयोग किया जाता है, जैसे—
- प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO)
- बिक्री के लिए प्रस्ताव (OFS)
- शेयरों की पुनर्खरीद आदि।
- ये विधियाँ पूँजी बाजार को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से—
- बेहतर प्रदर्शन करने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के अधिक शेयर बाजार में उपलब्ध होते हैं।
- खुदरा निवेशकों को विभिन्न प्रकार के शेयरों में निवेश करने के अधिक अवसर मिलते हैं।
- पूँजी बाजार की तरलता और गहराई में वृद्धि होती है।
| विनिवेश बनाम लाभांश आयविनिवेश से प्राप्तियाँ:सरकार के स्वामित्व वाले शेयरों की बिक्री से प्राप्त राशि को गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्ति माना जाता है।यह सामान्यतः किसी विशेष बिक्री से प्राप्त होने वाली एकमुश्त आय होती है।लाभांश आय:सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा वितरित लाभ में सरकार के हिस्से को लाभांश आय कहा जाता है।इसे गैर-कर राजस्व प्राप्ति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।जब तक संबंधित उद्यम लाभ अर्जित करते हैं और लाभांश वितरित करते हैं, तब तक यह आय नियमित रूप से प्राप्त हो सकती है।इसलिए विनिवेश का आकलन केवल तत्काल प्राप्त होने वाली बिक्री राशि के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसमें भविष्य में मिलने वाले लाभांश का त्याग, सरकार की शेष हिस्सेदारी का मूल्य तथा निजी स्वामित्व से संभावित दक्षता लाभ भी शामिल होने चाहिए। |
नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति
- आत्मनिर्भर भारत के लिए नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति को रणनीतिक विनिवेश के संबंध में व्यापक दिशा-निर्देश प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2021 में मंत्रिमंडल की स्वीकृति के पश्चात अधिसूचित किया गया था।
- इस नीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सरकार की उपस्थिति को न्यूनतम करना है।
- इसके अंतर्गत निम्नलिखित उद्यम शामिल हैं:
- वर्तमान केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक
- सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियाँ
- नीति के अंतर्गत विनिवेश के लिए क्षेत्रों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
- रणनीतिक क्षेत्र: इन क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की उपस्थिति न्यूनतम आवश्यक स्तर तक सीमित रखी जाएगी। शेष उद्यमों का निजीकरण किया जाएगा, अन्य केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के साथ विलय किया जाएगा, उनकी सहायक कंपनियों के रूप में पुनर्गठन किया जाएगा अथवा उन्हें बंद किया जाएगा।
- इस श्रेणी में चार प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:
- परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा
- परिवहन और दूरसंचार
- विद्युत, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज
- बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ
- गैर-रणनीतिक क्षेत्र: इन क्षेत्रों में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण किया जाएगा। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो संबंधित उद्यमों को बंद किया जा सकता है।
विनिवेश का महत्त्व
- परिचालन दक्षता में सुधार: निजी क्षेत्र की भागीदारी से बेहतर व्यावसायिक प्रोत्साहन, पेशेवर प्रबंधन और अधिक जवाबदेही को बढ़ावा मिल सकता है।
- राजकोषीय भार में कमी: घाटे में चल रहे अथवा कमजोर प्रदर्शन करने वाले उद्यमों को सरकारी सहायता देने की आवश्यकता कम हो सकती है।
- प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: पर्याप्त नियामकीय सुरक्षा उपायों वाले क्षेत्रों में निजी भागीदारी से सेवाओं की गुणवत्ता सुधर सकती है, नवाचार को प्रोत्साहन मिल सकता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
- सार्वजनिक परिसंपत्तियों का बेहतर उपयोग: विनिवेश से सरकारी निवेश का मूल्य प्राप्त करने और उस पूँजी को अन्य सार्वजनिक आवश्यकताओं के लिए उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।
भारत में विनिवेश प्रक्रिया की चुनौतियाँ
- बाजार की अनिश्चित परिस्थितियाँ: निवेशकों की कमजोर धारणा, मूल्यांकन में उतार-चढ़ाव और क्षेत्र-विशिष्ट जोखिमों के कारण विनिवेश की प्रक्रिया में देरी हो सकती है अथवा बिक्री से कम आय प्राप्त हो सकती है।
- मूल्यांकन संबंधी चिंताएँ: सार्वजनिक परिसंपत्तियों को उनके उचित आर्थिक मूल्य से कम कीमत पर बेचने से सरकारी राजकोष को दीर्घकालिक हानि हो सकती है।
- रोजगार संबंधी चिंताएँ: कर्मचारियों के सामने रोजगार की सुरक्षा, सेवा शर्तों और भविष्य में संगठनात्मक पुनर्गठन को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है।
- राजस्व की अनिश्चितता: विनिवेश एकमुश्त आय का स्रोत है। इसलिए यह नियमित कर राजस्व का स्थायी विकल्प नहीं बन सकता।
आगे की राह
- विनिवेश का मार्गदर्शन दीर्घकालिक आर्थिक दक्षता और अर्थव्यवस्था में राज्य की उपयुक्त भूमिका के आधार पर किया जाना चाहिए। इसे केवल वार्षिक राजस्व लक्ष्य पूरा करने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।
- सार्वजनिक परिसंपत्तियों का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न मूल्यांकन विधियों, पारदर्शी बोली प्रक्रिया और पर्याप्त प्रतिस्पर्धा का उपयोग किया जाना चाहिए।
- जहाँ संभव हो, विनिवेश से प्राप्त राशि का उपयोग पूँजी निर्माण और उत्पादक सार्वजनिक निवेश के लिए किया जाना चाहिए, न कि इसे सतत राजकोषीय प्रबंधन के विकल्प के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 16-10-2026