पाठ्यक्रम: GS1/ भूगोल
संदर्भ
- हाल ही में किए गए एक विश्लेषण में बताया गया है कि निम्न दाब प्रणालियों (LPS) की लंबे समय तक सक्रियता मानसूनी वर्षा को कुछ विशेष क्षेत्रों में केंद्रित कर रही है। इसके कारण देश में कुल वर्षा की कमी दर्ज होने के बावजूद कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
निम्न दाब प्रणालियों के बारे में
- निम्न दाब प्रणाली वायुमंडल का ऐसा क्षेत्र है, जहाँ आसपास के क्षेत्रों की तुलना में वायुदाब कम होता है।
- इसके कारण वायु एक स्थान पर एकत्रित होकर ऊपर उठती है, जिससे बादलों का निर्माण होता है और पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध होने पर वर्षा भी हो सकती है।
- निम्न दाब प्रणालियाँ बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होती हैं और भारतीय उपमहाद्वीप के आंतरिक भागों की ओर बढ़ती हैं। ये आर्द्रता लाती हैं तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा के स्वरूप को प्रभावित करती हैं।
- इनसे होने वाली वर्षा आर्द्रता की उपलब्धता, वायुमंडलीय अस्थिरता, पवनों की दिशा एवं गति, प्रणाली की गति तथा पर्वतों जैसी भौगोलिक विशेषताओं के साथ उसकी अंतःक्रिया पर निर्भर करती है।
मानसून
- मानसून पवनों की दिशा में होने वाला मौसमी परिवर्तन है। यह स्थल और समुद्र के असमान ताप तथा उनके बीच उत्पन्न वायुदाब के अंतर के कारण होता है।
- आगमन और वापसी: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का मौसम जून के आरंभ में शुरू होकर सितंबर तक रहता है।
- हिंद महासागर से आर्द्रता युक्त वायु लेकर आने वाली दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनों का आगमन मानसून की शुरुआत का संकेत है।
- मानसून की वापसी सामान्यतः अक्टूबर में शुरू होती है।
- अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय रहने वाला उत्तर-पूर्वी मानसून दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा लाता है।
- उत्तर-पूर्वी मानसून तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी, कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा और यानम के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
निम्न दाब प्रणालियों को प्रभावित करने वाले कारक
- मानसूनी परिसंचरण: दक्षिण-पश्चिम मानसून की आर्द्रता हिंद महासागर से भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँचती है।
- मानसूनी परिसंचरण निम्न दाब प्रणालियों की स्थिति, उनके मार्ग और उनसे होने वाली वर्षा की मात्रा निर्धारित करता है।
- अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO): अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भागों के जल के तापमान में होने वाली चक्रीय वृद्धि है।
- यह भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून परिसंचरण को कमजोर कर सकता है।
- हालाँकि, इसका प्रभाव अलग-अलग वर्षों और क्षेत्रों में भिन्न होता है तथा केवल इसके आधार पर वर्षा के परिणामों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
- हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): इसकी सकारात्मक अवस्था में पश्चिमी हिंद महासागर का समुद्री सतही तापमान पूर्वी भूमध्यरेखीय हिंद महासागर की तुलना में अधिक होता है।
- यह कभी-कभी भारतीय मानसूनी वर्षा पर अल नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को कम कर सकता है।
- मैडेन-जूलियन दोलन (MJO): उष्णकटिबंधीय वायुमंडल में संवहन की यह पूर्व दिशा में बढ़ने वाली प्रणाली मानसून की सक्रिय और विराम अवस्थाओं को प्रभावित करती है।
- इससे वर्षा उत्पन्न करने वाली प्रणालियों के अनुकूल परिस्थितियों में परिवर्तन होता है।
- सोमाली जेट: यह भूमध्यरेखा के आर-पार प्रवाहित होने वाली निम्न-स्तरीय तीव्र पवन धारा है, जो आर्द्रता को अरब सागर और भारतीय उपमहाद्वीप की ओर पहुँचाती है।
- इससे मानसूनी परिसंचरण को बल मिलता है।
- पश्चिमी विक्षोभ: ये पूर्व दिशा में बढ़ने वाली उष्णकटिबंधीय क्षेत्र से बाहर की मौसम प्रणालियाँ हैं।
- ये मानसूनी परिसंचरण के साथ अंतःक्रिया करके उत्तर-पश्चिमी भारत में वर्षा को प्रभावित कर सकती हैं, विशेषकर मानसून की वापसी के दौरान।
लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली निम्न दाब प्रणालियों के प्रभाव
- वर्षा का कुछ क्षेत्रों में केंद्रित होना: लगातार सक्रिय रहने वाली निम्न दाब प्रणालियाँ एक ही भौगोलिक क्षेत्र में बार-बार आर्द्रता पहुँचा सकती हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है, जबकि इनके मार्ग से बाहर के क्षेत्र अपेक्षाकृत शुष्क रह सकते हैं।
- कृषि उत्पादकता पर प्रभाव: वर्षा में देरी से बुवाई और फसलों की प्रारंभिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, कम समय में अत्यधिक वर्षा होने से जलभराव, मृदा अपरदन और फसलों को हानि पहुँच सकती है।
- खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: वर्षा का असमान वितरण फसल उत्पादन, कृषि उत्पादों की कीमतों और किसानों की आय को प्रभावित कर सकता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से वर्षा पर निर्भर कृषि वाले क्षेत्रों में अधिक होता है।
- जलविद्युत उत्पादन और जलाशय संचालन में व्यवधान: जलाशयों में अचानक अधिक जल का प्रवाह और गाद का जमाव बाँधों के संचालन को जटिल बना सकता है। इससे जलाशय प्रबंधन पर दबाव बढ़ता है और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- हिमालय के साथ अंतःक्रिया: जब आर्द्रता से युक्त मौसम प्रणालियाँ हिमालय की तलहटी की ओर बढ़ती हैं, तो पर्वतीय ढलानों से टकराकर वायु ऊपर उठती है। इससे वर्षा की तीव्रता बढ़ सकती है तथा भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ का जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष
- भारत में मानसून के प्रति अनुकूलन क्षमता केवल कुल वर्षा की मात्रा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वर्षा के समय, भौगोलिक वितरण और तीव्रता पर भी निर्भर करती है।
- निम्न दाब प्रणालियों की बेहतर समझ, अधिक सटीक मौसम पूर्वानुमान तथा क्षेत्र-विशिष्ट जल और कृषि नियोजन के माध्यम से वर्षा के बढ़ते असमान वितरण से उत्पन्न जोखिमों का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।
स्रोत: DTE
Previous article
आईडीबीआई बैंक की बिक्री और भारत की विनिवेश नीति
Next article
भारत का अंतर्देशीय नौवहन तंत्र